राजेंद्र त्यागी का व्यंग्य : नेता का विराट स्वरूप
राजेन्द्र त्यागी पेशे से क़लम के सिपाही हैं। नुक्ताचीनी में माहिर हैं, सो व्यंग्य लिखने की मौलिक प्रतिभा उनमें होनी ही थी। नए प्रतीकों और रुपकों के ज़रिए अपनी बात कहने का उनका अलग अंदाज़ है। त्यागी जी के तीन व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं।मौसम में ठण्डक थी। मगर उम्मीदवारों के मुँह से निकलती आश्वासन व वायदों की गरम हवाएँ, मौसम की सर्द हवाओं से रह-रह कर टकरा रहीं थी। इसलिए सर्द मौसम के बावजूद माहौल में गर्मी थी। चुनावी नारे आकाश में ट्रैफ़िक जाम की सी स्थिति पैदा किए हुए थे। जल-वायु, पृथ्वी-आकाश सभी चुनावाग्निसे तापायमान थे। जब संपूर्ण वायुमंडल ही चुनाव की बू से ओतप्रोत हो तो भला महामंडलेश्वर स्वामी अद्भूतानन्दजी महाराज व उनके भक्तगण ही उससे अछूते कैसे रह पाते। अत: भक्तजनों के आग्रह पर स्वामीजी ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करते-करते नेता के स्वरूप का बखान करने लगे। भक्तजनों के आग्रह स्वरों श्रोत्रेद्रियों में प्रवेश करते ही स्वामीजीके मुखारबिंदु से निकला, नेता! 'नेति-नेति' अर्थात यह भी नहीं यह भी नहीं। फिर स्वामीजी बोले जिसका उद्भव ही 'नृ' धातु से हुआ हो उसका वर्णन शब्दों में करना दुष्कर कार्य है। शब्द ज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं और नेता असीम है। फिर भी हे भक्तजनों! सीमित शब्दावली में ही मैं नेता के असीम स्वरूप का वर्णन करने का प्रयास करता हूँ।
"जुगाड़" की तरह अपने प्रवचन को आगे खींचते हुए स्वामीजी बोले - हे भक्तजनों! नेता सर्वव्यापी है, सर्वाकार है, निर्विवाद है, सद्चिदानंद है, जुगाड़ी है अर्थात सभी जुगाड़ों का स्रोत है।
नेता के विराट स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन करने के बाद स्वामीजी ने उसके एक-एक गुण का विस्तृत वर्णन कुछ इस प्रकार किया :
हे भक्तजनों! नेता सर्वव्यापी है, वह राष्ट्र के कण-कण में व्याप्त है। राजधानी से लेकर गाँव-देहात तक की गली-मौहल्ले की हर ईंट के नीचे वह विद्यमान है। हृदय निर्मल होना चाहिए घट-घट में नेता के दर्शन संभव हैं।
भक्तजनों, अब मैं नेता के सर्व-विवादित गुण का बखान करता हूँ। सर्व-विवादित यह गुण है उसका स्वरूप। आदिकाल अर्थात जब से सृष्टि में नेता नाम के जीव का उद्भव हुआ है, तभी से उसके स्वरूप को लेकर विवाद है। कहा जा सकता है कि नेता और उसका स्वरूप विवाद, दोनों का उद्भव व विकास साथ-साथ ही हुआ है।
हे भक्तजनों! विवादों के पार यदि देखा जाए तो नेता सर्वाकार है, बहुरूपी है। कभी-कभी उसे बहुरूपिया कह कर भी संबोधित किया जाता है। क्योंकि नेता लीलामय है, इसलिए भक्त ने उसके जिस रूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की नेता ने उसे उसी रूप में दर्शन दिये। उसके विभिन्न स्वरूप भक्त की भावना पर भी निर्भर करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है -
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देख तिन तैसी"
बहुरूपिया होने के बावजूद शास्त्रों में मूलतया उसके दो स्वरूपों का वर्णन प्रमुखता से मिलता है। आज के प्रवचनों में हम मुख्य रूप से इन्हीं दो रूपों की चर्चा करेंगे।
हे भक्तजनों! शास्त्रों को घोट कर यदि निचोड़ा जाए तो नेता का मूल स्वरूप निराकार ही साबित होता है। निराकार है, तभी तो जल-वायु और आकाश की तरह वह पात्र के अनुरूप आकार धारण कर लेता है, रंग बदल लेता है। निराकार है तभी तो वह घट-घट का वासी है और आड़ी-तिरछी उसकी टांग का आभस तभी तो प्रत्येक क्षेत्र में हो जाता है। स्नेह के वशीभूत भक्तजन कभी-कभी उसे घाट-घाट का जल ग्रहण कर्ता भी कहते हैं। दर्शन देकर नेता अक़्सर अंतर्ध्यान हो जाता है, हवा हो जाता है, इसलिए ही उसका एक नाम हवाबाज़ भी है। ये सभी लक्षण उसके निराकार स्वरूप का वर्णन करते हैं।
नेता के निराकार स्वरूप का वर्णन कर अद्भूतानन्दजी महाराज ने अपने प्रवचन पर अर्ध विराम लगाया। भक्तों ने अगला प्रश्न उठाया, "नेता जब निराकार है, तो दर्शन किसके?"
चिलम में दम लगाने की माफ़िक महाराज ने लंबी सांस खींची और फिर बोले, "प्रश्न महत्वपूर्ण है।"
हे भक्तजनों! नेता निराकार ही है। मगर जब-जब चुनाव सन्निकट होते हैं, भक्तों के आग्रह पर वह उम्मीदवार बनकर साकार रूप में अवतरित होता है। भक्तजनों यही कारण है कि चुनाव संपन्न हो जाने के बाद नेता अंतर्ध्यान हो जाता है। वास्तव में तब वह अपने निराकार रूप में चला जाता है। इसलिए तुच्छ जन को उसके दर्शन नहीं होते। मगर जो प्राणी भक्ति-भाव (पांव-पान-पूजा) के साथ उसके विराट स्वरूप के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं, ऐसे भक्तों को वह निराकार स्वरूप में भी दर्शन देता है।
भक्तजनों, सभी जुगाड़ों का आदि स्रोत होने के कारण नेता को जुगाड़ी भी कहा गया है। जुगाड़ उसकी प्रकृति है, उसकी माया है। सृष्टि के तमाम जुगाड़ उसी के जुगाड़ से संचालित हैं। जिसके सहारे वह संपूर्ण राजनैतिक सृष्टि का निर्माण करता है।
स्वामीजी! और यह भ्रष्टाचार?
अच्छाऽऽऽ, भ्रष्टाचार!
भक्तजनों, भ्रष्टाचार भी उसी शक्ति पुंज जुगाड़ का एक अंश है। हे भक्तजनों! जिस प्रकार जल से भरा कुंभ यदि जल ही में फूट जाए तो दोनों जल एक दूसरे में समा जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं। उसी प्रकार की गति जुगाड़ व भ्रष्टाचार की है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि भ्रष्टाचार जुगाड़ है और जुगाड़ भ्रष्टाचार। नेता प्रथम भ्रष्टाचार के लिए जुगाड़ करता है, फिर भ्रष्टाचार के सहारे चुनाव के लिए धन का जुगाड़ करता है और फिर उसके सहारे चुनाव में विजयश्री प्राप्त करने का जुगाड़। विजयश्री प्राप्त हो जाने के बाद सरकार बनाने के जुगाड़ में व्यस्त हो जाता है। ये सभी उसकी लीलाएँ हैं। ऐसी ही लीलाओं के माध्यम से संपूर्ण राजनैतिक सृष्टि की संरचना का जुगाड़ फिट हो जाता है। यह जुगाड़ ही की माया है कि नेता कभी नहीं हारता, हमेशा जनता ही हारती है।
नेता निर्विवाद है। दुनिया के संपूर्ण प्रपंच उसकी माया है, लीला है। मर्यादा स्थापना हेतु प्रपंच करना उसका परम कर्तव्य है। प्रपंच के माध्यम से वह लोकतंत्र वासियों को उनके कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराता है। क्योंकि वह कीचड़ में कमल की भांति, प्रपंच करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता। वह प्रपंच कर्म भी सहज भाव से करता है, इसलिए निर्विकारी है, निर्विवाद है, सभी विवादों से परे हैं।
नेता का असत्य भी सत्य हैं, क्योंकि सत्य के मानदंड, सत्य की परिभाषा परिवर्तनशील हैं, इसलिये समय के अनुरूप नेता ही सत्य के मानदंड व परिभाषा तय करता है। इसलिये ही शास्त्रों में नेता को सत् और जनता को असत् कहा गया है।
नेता चित् स्वरूप भी है। राजनीति की समस्त चेतना नेता ही से प्रवाहित है। नेता को शक्ति पुंज कहा गया है। लोकतंत्र के लोक और तंत्र दोनों ही का चेतना स्रोत नेता ही है। लोकतंत्र रूपी सृष्टि के संपूर्ण चक्र-कुचक्र नेता की ही माया से संचालित हैं। लोकतंत्र का जुगाड़ उसी की चेतना से गतिशील है। क्योंकि वह सत् है, चित् है, इसलिए वह आनंद स्वरूप है। वह आनंद स्वरूप है, इसलिए ही जनता दुखानंद रूप है। जनता का दुख ही नेता का आनंद है और उसका आनंद जनता का दुख है। यही लोकतंत्र का नियम है।
भक्तजनों क्योंकि नेता सत् है, चित्त है, आनंद है, इसलिये उसे सद्चिदानंद भी कहा गया है। इसके साथ ही हे भक्तजनों, आज के प्रवचनों पर अब विराम लगाते हैं। भक्तजनों, आओ अब नेता के उस विराट स्वरूप की आरती उतारे। धन्य-धन्य के सुर के साथ भक्तजन अपने-अपने स्थान पर खड़े हो कर आरती गुनगुनाने लगते हैं।
लेबल: Hindi, rajendra tyagi, satire, व्यंग्य, हिन्दी


8 टिप्पणियाँ:
ये हुई न बात...बेहतरीन व्यंग्य पर ढेर सारी बधाई
चण्डीदत्त शुक्ल
"जुगाड़" की तरह अपने प्रवचन को आगे खींचते हुए स्वामीजी बोले - हे भक्तजनों! नेता सर्वव्यापी है, सर्वाकार है, निर्विवाद है, सद्चिदानंद है, जुगाड़ी है अर्थात सभी जुगाड़ों का स्रोत है।
:) :) बहुत बढ़िया.. करारा कटाक्ष. भई अपन पहली बार मस्ती की बस्ती मे आए हैं. अब तो आते ही रहेंगे. बहुत खूब रचनाएं हैं यहां. शुभकामनाएं.
भई त्यागीजी, हमें आपसे ऐसी उम्मीद न थी। अगर आपका ओरिजिनल लिखा हुआ है, तो बधाई। अगर कहीं से मारा हुआ है, तो उत्कृष्ट चोरी के लिए बधाई। त्यागीजी की जय हो।
फोटू अच्छा है, लेख खराब है। फोटू भले ही खराब कर लें, पर लेख तो अच्छा होना चाहिए।
बहुत बड़ा व्यंग हुआ है…मजा आ गया॥ धन्यवाद!!
बहुत बेहतरीन, मजा आ गया.
धन्य हुए गुरुवर आपके मुखारविंद से नेता नामक तत्व का रहस्य जानकर। बहुत खूब!
भई वाह त्यागीजी क्या लिखा है। बहुत खूब। ऊंची कल्पना शक्ति और सशक्त भाषा का नमूना
आलोक पुराणिक
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