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रविवार, 6 मई, 2007

आलोक पुराणिक का व्यंग्य : मैं मूल्यवान लेखक हूँ

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक का ज़बरदस्त आत्मसाक्षात्कार, जिसमें वे बता रहे हैं अपने मूल्यवान लेखक होने की वजह।



ब्रह्मांड के सबसे धांसू रचनाकार आलोक पुराणिक (आलोकजी ब्रह्मांड के सबसे धांसू रचनाकार कैसे हैं, यह जानने के लिए प्रतीक्षा करें आलोकजी की आगामी पुस्तक की - स्मार्ट झूठ कैसे बोलें। इसमें आलोकजी ने विस्तार से समझाया है कि उन्हे ब्रह्मांड का सबसे धांसू रचनाकार कैसे माना गया है)

आलोक पुराणिक ने काफी कुछ लेखन बर्नार्ड शा, आस्कर वाइल्ड के नाम से भी किया है। दरअसल पूर्वजन्म में आलोक पुराणिक यही थे। जिन्हे इस बयान पर आपत्ति हो, वे सबूत पेश करें कि आलोकजी ये नहीं थे।

आलोक पुराणिक पिछले क़रीब बीस सालों से पत्रकारिता की और दस सालों से व्यंग्य लिख कर हिंदी व्यंग्य की सेवा कर रहे थे। इससे पहले अपनी उम्र के क़रीब तीस साल आलोकजी ने व्यंग्य न लिखकर भी हिंदी व्यंग्य सेवा की है, ऐसा कई जानकार लोग बताते हैं। बल्कि कई तो यह भी मानते हैं कि न लिखकर जो सेवा उन्होनें की थी, वह ज़्यादा सार्थक थी।

आलोक पुराणिक का यह आत्मसाक्षात्कार है।

सवाल- आप व्यंग्यकार कैसे बने?
जवाब- देखिये, सबसे पहले मैंने कविता के इलाक़े में ज़ोर आज़माया। हिंदी के एक वरिष्ठ कवि एक जगह कविता पढ़ रहे थे -

चिड़िया से उठता है धुआँ
धुएँ की एक लकीर से निकलती हो तुम
तुम हम, हम तुम,
तुम ही तुम तुम ही तुम

बाद में एक आलोचक ने बताया कि यह तो विकट कालजयी कविता है। इसमें समकालीन मसलों से लेकर प्रेम के आयाम मौजूद हैं। धुएँ की एक लकीर से निकलती हो तुम, यानी कवि अपनी प्रेमिका को संबोधित कर रहा है - हे प्रिये तुम धुएँ की लकीर से निकलती हो। यानी भारी प्रदूषण हैं, कवि इस तरह से समकालीन संदर्भों से जुड़ रहा है। स्त्री विमर्श भी है इसमें, धुआँ विमर्श भी है। कविता की आख़िरी पंक्ति है - तुम ही तुम यानी कवि उसके इश्क़ में डूबने की बात कर रहा है, जो शरीरी प्रेम से परे है। यह प्रेम की आख़िरी पराकाष्ठा है।

आलोचक की इस व्याख्या से मुझे लगा कि मेरे अंदर भी भारी कवि बनने के लक्षण हैं। और मैं कवि बन गया, बहूत हिट कविताएँ लिखीं (हिट उन आलोचक की नज़र में, यह तब की बात है जब मैं आलोचकजी को अपने वाहन पर उनके इच्छित स्थानों पर ले जाया करता था, उनके विरोधियों के ख़िलाफ़ प्रचार किया करता था आदि आदि)। बाद में मेरी व्यस्तता अन्यत्र बढ़ने लगी, और मैं कविता को ज़्यादा और आलोचक महोदय को कम समय देने लगा, तो मैंने पाया कि आलोचक महोदय ने यह कहना शुरु कर दिया कि अब तुम्हारी कविता में वह बात नहीं रही।

सो साहब कविता छूट गयी। फिर मैं शायरी की तरफ मुड़ा। शायरी में उस्ताद बनाने पड़ते हैं। मेरे उस्ताद ने कहा - बेटे पहले कुछ पढ़-लिख कर आओ। इससे आशय मैंने यह लगाया कि औरों की पढ़ो और फिर लिखो। साहब दो ही दिनों बाद मैं पहुँच गया कुछ नये शेर लेकर -

जिनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
देखिये पाते हैं उश्शाक बुतों से क्या फ़ैज़, एक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

उस्ताद कुछ चौंक कर बोले - ये शेर तो लगता है कि चोरी का है।
मैंने कहा - हो सकता है कि ग़ालिब ने मेरा चुरा लिया हो। मैं भी ठीक यही बात कहना चाहता था, उन्होने पहले ही मेरी बात चुराकर कह दी।

उस्ताद बिगड़े और बोले - क्या मतलब? ग़ालिब तुमसे बहुत पहले पैदा हुए हैं, वो चोरी कैसे कर सकते हैं?
मैंने समझाया कि ये क्या बात हुई कि जो मुझसे पहले पैदा हुए हैं, वो चोरी नहीं कर सकते। एक से एक नायाब चोर मुझसे पहले पैदा हुए हैं। नटवरलाल मुझसे पहले पैदा हुए हैं।

उस्ताद बोले - तुम बात बिलकुल लौजिकल कर रहे हो। पर उर्दू वाले इतने समझदार नहीं है कि तुम्हारा लाजिक समझ पायें।
सो साहब इस तरह से शेर कहना छूटा।

फिर एक दिन मैं एक अख़बार के दफ़्तर में बैठा था। एक मित्र झींकते हुए बोले - व्यंग्य के नाम पर इधर कूड़ा भेज रहे हैं लोग। छापना पडता है। मैंने इजाज़त मांगी कि अगर वह चाहें, तो कुछ फ़्रेश क़िस्म का, अपनी तरह का कूड़ा मैं भी देना शुरु करुँ। वह सहमत हो गये। सो साहब चल निकला मामला, मैं कूड़ा समझ कर भेजता रहा, वह व्यंग्य समझकर छापते रहे। जब तक बाक़ी के व्यंग्यकार गुटबाज़ी करके मुझे उखाड़ने की जुगाड़ कर पाते, तब तक मैं जम चुका था।

सवाल- लोग कहते हैं कि आप सिर्फ़ रुपयों के लिखते हैं।
जवाब- ग़लत कहते हैं कि मैं सिर्फ़ रुपयों के लिए लिखता हूँ। मौक़ा दें, मैं डालरों और पौंडों के लिए भी लिखना चाहता हूँ।

सवाल- आप अख़बारों के लिए लिखते हैं, पत्रिकाओं औऱ किताबों की शक्ल में आपका योगदान कम है, क्यों?
जवाब- मैं जनता का लेखक हूँ। जनता के काम आने वाला लेखक हूँ। ये जो आप केले ख़रीद कर लाये हैं, इनके लिफ़ाफ़ों का अख़बार देखिये। इसमें मेरा लेख है। जनता के काम आना और किसे कहते हैं जी। अभी भोपाल जा रहा था, एक अख़बार ख़रीदा। एक अख़बार में मेरा व्यंग्य था। कुछ देर बाद सामने की बर्थ की महिला के छोटे बच्चे ने लघुशंका कर दी। महिला ने मुझसे कहा कि अख़बार तो आप पढ़ ही चुके हैं, लाइए मैं इसे इस्तेमाल कर लूँ। व्यंग्यकार समाज की गंदगी साफ़ करता है, इस मुहावरे को सिर्फ़ अख़बार में लिखकर ही सार्थक किया जा सकता है। ऐसा गौरव पत्रिकाओ, और किताबों के लेखकों को नही मिलता। फिर मैं मूल्यवान लेखक हूँ, अख़बार की रद्दी छ: रुपये किलो बिकती है। पत्रिकाओं की रद्दी चार रुपये किलो बिकती है। किताबों की मुश्किल से दो रुपये किलो बिकती है। मैंने पहले ही साफ़ किया है कि मैं मूल्यवान लेखक हूँ।

सवाल- आपको लिखने की प्रेरणा कहां से मिलती है?
जवाब- प्रणव जैन, बलीराम सेकसरिया और रानू श्रीवास्तव से।

सवाल- पर इन लोगों के नाम बतौर लेखक तो मैंने नहीं सुने।
जवाब- मैंने भी नहीं सुने, क्योंकि ये लेखक हैं ही नहीं। ये उन अख़बारों के एकाउटेंट हैं, जो मेरे लेखों के पारिश्रमिक के चेक बनाते हैं। सारी प्रेरणा यहीं से मिलती है।

सवाल- अपने समकालीन व्यंग्यकारों के बारे में क्या कहना चाहते हैं।
जवाब- सारे बहुत ही बढ़िया हैं। वाह-वाह क्या कहने।

सवाल- सब कुछ बढ़िया ही है, कुछ भी ख़राब नहीं है क्या?
जवाब- देखिये, व्यंग्यकार बहुत तरह के हैं। एक तो जिनके लेख चलते हैं। दूसरे, जिनके स्थापित पुरस्कार, सम्मान वगैरह बाज़ार में चलते हैं। कईयों का कुछ नहीं चलता, पर वे तमाम किस्म की कमेटियों में चलते हैं, वे पुरस्कार, सम्मान, फ़ैलोशिप वगैरह के फ़ैसले करते हैं। मुझे अभी तक कोई पुरस्कार वगैरह नहीं मिला है। अभी बहुत पुरस्कार झटकने हैं। किसी को बुरा क्यों बताना। इस धरती पर सभी कुछ अपनी जगह ठीक है। मैं कौन हूँ किसी को बुरा बताने वाला। ना काहू से बैर के फ़्ण्डे पर चल कर ही सर्वत्र सैटिंग कर पाता है। वही मुझे करनी है।

सवाल- आपको अभी तक कोई पुरस्कार कोई नहीं मिला?
जवाब- देखिये इस संबंध में थोड़ा प्रोफ़ेशनल हूँ। पुरस्कार खेंचों प्रक्रिया में कास्ट-बेनिफ़िट एनालिसिस करता हूँ। अभी दिल्ली में एक अकादमी में ग्यारह हज़ार रुपये के पुरस्कार के लिए चक्कर चलाने के लिए किसी ने प्रोत्साहित किया। मैंने कैलकुलेशन किया कि दो निर्णायकों को सैट करने में छह शाम, ट्रांसपोर्ट ख़र्च, और महंगी वाली शराब की क़रीब बाईस बोतलें ख़र्च होंगी। ख़र्चा ज़्यादा हुआ जा रहा था, पुरस्कार कम का था। सो मैंने खट से बयान दिया कि मैं ऐसा लेखक हूँ कि जो अपनी प्रतिबद्धता को पुरस्कार के लिए नहीं बेचता। हाँ यह पुरस्कार अगर ज़्यादा रक़म का होता, तो मैं बयान देता कि पुरस्कार से ही तो प्रतिभा का मूल्यांकन होता है। एकाध लाख का पुरस्कार हो, तब मारधाड़ की जाये। कॉस्ट रिकवर हो जाये, कुछ मुनाफ़ा हो जाये, तब पुरस्कार में ध्यान लगाना चाहिए।

सवाल- तो क्या मतलब आपके हिसाब से ये सारे पुरस्कार रैकेटबाज़ी के तहत दिये जाते हैं?
जवाब- जो पुरस्कार मुझे दिये जायेंगे, वे इस बयान के अपवाद होंगे।

सवाल- आप इतनी गुंताड़ेबाज़ी करने की सोचते हैं। यह तो लेखकीय संवेदना नहीं है।
जवाब- देखिये, लेखन तीन प्रकार का होता है। कालजयी, शालजयी और मालजयी। कालजयी लेखन यह होता है - जैसे कोई लिखे कि नींबू का कब्ज़ निवारण में योगदान, ननद से संबंध कैसे सुधारें, कपड़ों पर लगे दाग़ों को कैसे छुड़ायें। ये लेखन कालजीय लेखन है। अक़बर के टाइम में भी इस तरह के लेखन की ज़रुरत थी और अब से पाँच हज़ार सालों बाद भी इस तरह के लेखन की डिमाण्ड होगी। दूसरे तरह का लेखन होता है शालजयी। इस किस्म के लेखन वाले लेखक साल छह महीनों में कोई बुलाकर शाल दे देता है। तीसरे किस्म का लेखन होता है मालजयी लेखन। सब तरफ से माल आने दो। फैलोशिप आने दो। पुरस्कार आने दो। अपनी दिलचस्पी मालजयी लेखन में है।

सवाल- अपने को किस स्तर का लेखक मानते हैं?
जवाब- कबीरदास, सूरदास और तुलसीदास के स्तर का। इनमें और मुझमें बहुत समानता है। इनमें से किसी को साहित्य का नोबल पुरस्कार नहीं मिला है। मुझे भी अभी तक नहीं मिला है। अगर मिल गया, तो फिर मेरा स्तर गिर जायेगा।

सवाब- आप पढ़ते क्या हैं?
जवाब- पढऩे की क्या ज़रुरत है। पढ़ने में लगा रह जाऊँगा, तो लिखूंगा कब।

सवाल- प्रशंसकों के लिए क्या संदेश है?
जवाब- देखिये मैं ऐसे ही किसी फ़ोकटी में प्रशंसक नहीं मानता। प्रशंसकों के लिए संदेश यह है कि अगर कोई आलोक पुराणिक राहत समिति या आलोक पुराणिक ग़रीबी निवारण समिति या आलोक पुराणिक कैंसर सहायतार्थ कोष में आपसे रुपये मांगे तो अवश्य दें। ऐसी कई समितियाँ मेरे निर्देशन में काम करती हैं। और तो और आलोक पुराणिक मृत्योपरांत परिवार सहायता समिति वाले आपसे चंदा मांगने आयें, तो उन्हे भी भरपूर योगदान दें।

पर प्रशंसक होने के लिए इतना भर काफी नहीं है। इस सारी चंदेबाज़ी के बाद अगर मैं आपको कहीं जीवित, स्वस्थ और सानंद दिख जाऊं, फिर भी आप नाराज न हों, और दोबारा आलोक पुराणिक सहायतार्थ कोष में योगदान देने को तत्पर दिखें, तब ही मानूंगा कि आप मेरे प्रशंसक हैं।

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8 टिप्पणियाँ:

Shrish ने कहा...

हाय रे हँसा हँसा कर मार डाला। बहुत ही उम्दा और बेहतरीन व्यंग्य। डिलीशियस पर टैग कर लिया हूँ।

इस लेख को पढ़कर मुझे घोर प्रेरणा हो रही है कि मैं
मूल्यवान और श्रेष्ठ चिट्ठाकार हूँ। तभी मुझे कोई पुरुस्कार नहीं मिला और मेरा लिखा जरुर सब को समझ नहीं आता तभी कम टिप्पणियाँ आती हैं। :)

आपकी आगामी पुस्तक - "स्मार्ट झूठ कैसे बोलें" का इंतजार है।

6 मई, 2007 4:11 अपराह्न  
Punit Pandey ने कहा...

चकाचक, बहुत खूब। इसे पढ़कर सभी पाठकों को व्यंग्यकार बनने की प्रेरणा एवं आत्मविश्वास मिलेगा।

6 मई, 2007 4:11 अपराह्न  
अरुण ने कहा...

दो बाते समझ मे आई
१. आलोचक पर ज्यादा ध्यान दो वही तो कर रहा हू
२. पढने की जरुरत नही है पहले क्यो नही लिखा
खामखा इतना सारा पढवा दिया अब आप खुद ही टिपीया लीजीयेगा हम चले अपनी लिखाई करने बताने के लिये धन्यवाद

6 मई, 2007 5:36 अपराह्न  
Udan Tashtari ने कहा...

बहुत बेहतरीन!!

मजा आ गया, वाह वाह!! चंदा दिया जायेगा.

6 मई, 2007 6:37 अपराह्न  
काकेश ने कहा...

इतने अच्छे ज्ञान के लिये टिप्पणी के साथ एक करोड़ एक का चंदा भेज रहे हैं .

6 मई, 2007 7:38 अपराह्न  
bhuvnesh ने कहा...

आलोकजी जब से मैंने आपके पहले लेख को पढ़ा आपका प्रशंसक हो गया
आशा है आगे भी इसी तरह के अच्छे लेख पढ़ने को मिलेंगे

6 मई, 2007 9:04 अपराह्न  
बेनाम ने कहा...

aap anmol hain.
alka pathak

18 मई, 2007 12:17 अपराह्न  
रवीन्द्र रंजन ने कहा...

आलोक जी हमें वाकई आप जैसे महान व्यंग्यकार पर गर्व है।

2 जुलाई, 2007 6:10 अपराह्न  

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