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सोमवार, 14 मई, 2007

रवीन्द्र त्रिपाठी का व्यंग्य : बुद्धिजीवी जी और टेलीविज़न

पेशे से पत्रकार रविन्द्र त्रिपाठी कई साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। स्टार न्यूज़ के कार्यक्रम पोल खोल के इंचार्ज हैं। हाल ही में टीवी पत्रकारों की लिखी कहानियों के हंस के विशेषांक के सम्पादक भी थे।

बुद्धिजीवी जी बुद्धिजीवी हैं। बुद्धिजीवी होना उनकी पहचान है। अदा है। खासियत है। वे अपने को बुद्धिजीवी कहलाना पसंद करते हैं। इसलिए वे अपने को बुद्धिजीवी दिखाते भी हैं। इसके लिए वे कई तरह के स्टाईल मारते हैं। जैसे, जहां लोग अमूमन शर्ट पैंट पहनकर जाते हैं, वहां वे कुर्ता पायजामा पहनकर जाते हैं-भले ही मौसम सर्दी का हो। औऱ जहां कुर्ता पायजामा वाले ज्यादा हों, वहां वे सूट पहनकर जाते हैं, चाहे मौसम गर्मी का हो।

बुद्धिजीवी जी हर बात बौद्धिक ढंग से कहते हैं। आप सोच रहे होंगे कि ये बौद्धिक ढंग क्या होता है ? तो आपको राज़ की बात बता दें कि बुद्धिजीवी जी के लिए बौद्धिक ढँग का मतलब है फिक्रमंद लगना। इसलिए वे हमेशा फिक्रमंद लगते हैं। बोलते समय भी वे फिक्रमंद लगते हैं और हंसते समय भी। कई बार तो वो हंसते हंसते बीच में इतने फिक्रमंद हो जाते हैं कि अचानक चुप हो जाते हैं। और अगर वे आपको कहीं प्रसन्न मुद्रा में मिलें तो समझ लीजिए कि उस दिन वे बौद्धिक मूड में नहीं हैं।

एक दिन बुद्धिजीवी जी सड़क पर मिले। उस दिन वे कुर्ता पायजमा में थे। मुझे देखते ही बोले कि "ये क्या हो रहा है? आखिर यह कब तक होता रहेगा? पानी सिर से ऊपर होता जा रहा है।"
मैंने पूछा- कहां हो रहा ये? पहले ये तो बताइए।

वे बोले- "मेरा मतलब है टेलीविजन में क्या हो रहा है। चैनलों में क्या हो रहा है। इतनी अश्लीलता, इतनी फूहड़ता। राम-राम। देश का बेड़ा गर्क हो रहा है। नौजवान पीढ़ी बर्बाद हो रही है। सिर्फ अश्लीलता ही अश्लीलता है टीवी में। कोई नैतिकता नहीं बची है। लोगों को भटका रहा है टेलीविजन। सोचने समझने की ताकत खत्म कर रहा है। और सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि इन चैनलों की वजह से बौद्धिकता खतरे में है। क्या समझे?"

मैंने पूछा- "अगर टेलीविजन इतना खराब है तो आप उसे देखते क्यों हैं? हटा दीजिए टीवी सैट अपने घर से। फिर अश्लीलता और अऩैतिकता आपके घर की देहरी के भीतर घुस नहीं पाएगी।"

वे बोले-" देखता कौन है। मैं टेलीविजन कभी नहीं देखता। मेरे पास वक़्त कहां है टीवी देखने का। घर में टेलीविजन जरुर है लेकिन वो सिर्फ बीवी और बच्चों के लिए। मुझे तो सेमीनारों और गोष्ठियों से ही फुर्सत नहीं मिलती। मैं तो वो कह रहा हूं,जो लोग कहते हैं औऱ अखबारों में छपता है। क्या समझे?"

मैंने कहा-"हो सकता है कि अखबार के लोग गलत कह रहे हों।"
वे बड़े तीखे लहजे में बोले- "आपकी बात कैसे मान लूं। देखिए, सेमीनारों में जो भी भाषण देता हूं,उसकी रिपोर्टिंग अखबारों में छपती है। लेकिन,आज तक किसी भी टीवी चैनल ने मेरा भाषण नहीं दिखाया। साफ है कि टेलीविजन चैनलों में बौद्धिकता नहीं बची। टेलीविजन बुद्धिजीवियों की कद्र नहीं करता। सोच विचार की कद्र नहीं करता। और जिस समाज में बुद्धिजीवियों की कद्र नहीं है,वो समाज चेतना शून्य होता है। क्या समझे?"

बुद्धिजीवी जी का चेहरा तमतमा रहा था। वो आगे बोले-" अखबार वाले बुद्धिजीवियों की कद्र करते हैं। वे तो ये भी छाप देते हैं कि अमुक अमुक गोष्ठी में फलां फलां बुद्दिजीवी मौजूद था। क्या समझे?"

ये सब कहते हुए उनका गुस्सा बढ़ता जा रहा था। आवाज़ तेज़ होती जा रही थी। पर मैंने बिना उसकी परवाह किए हुए कहा-" लेकिन इसमें नयी बात क्या है। विदेशों मे तो पहले ही कई बुद्धिजीवी कह चुके हैं कि टेलीविजन विचार का नहीं मनोरंजन का माध्यम है। बौद्रिला ने तो कहा है कि.."

उनके नथुने फूलने लगे थे। अपनी आवाज़ को और ऊँची करते हुए वे लगभग चीखे-"यही तो आप लोगों की मुश्किल है। हर बात पर विदेश की तरफ देखते हैं। अपने देश में बुद्धिजीवी नहीं है क्या? कहां कहां से नाम ले आते हैं। बौद्रिला, फौद्रिला,लाकां,फांका...। अरे,स्वदेशी बुद्धिजीवियों की बात कीजिए। क्या समझे?"

वे इतनी बार क्या समझे पूछ चुके थे कि मुझे अपनी समझदारी पर शक होने लगा। मुझे ये भी लगने लगा कि उऩका पारा जरुरत से ज्यादा गरम हो रहा है और उऩके सामने रहना खतरनाक हो सकता है। इसलिए मैंने विदा के लिए नमस्कार किया। वे बिना जवाब दिए मुड़े और चले गए।

कुछ दिनों के बाद बुद्धिजीवी जी फिर दिखे। उस दिन वे कुर्ता पायजामा में नहीं बल्कि सूट-बूट में थे।साफ था कि व बौद्धिक मूड में नहीं हैं। लेकिन, मुझे ये भी लगा कि उस दिन की बातचीत के बाद जरुर अब तक नाराज़ होंगे, इसलिए उनकी तरफ न देखने का नाटक किया। लेकिन,उन्होंने मुझे देख लिया था। शायद वे खफा भी नहीं थे,इसलिए आवाज़ लगाकर मुझे बुलाया। मैंने नमस्कार किया। देखा उनका चेहरा दमक रहा था। वे फिक्रमंद नहीं बल्कि प्रसन्न नज़र आ रहे थे। बोले- "आज रात नौ बजे क्या कर रहे हो?"

मैंने सोचा किसी दावत का निमंत्रण देने वाले हैं। इसलिए कहा-"कुछ खास नहीं।" वे उत्साह में बोले- "तो जल्दी घर जाइए और रात नौ बजे एवन चैनल देखिए। एक टॉक शो मे आ रहा हूं। और हां, देखने के बाद एसएमएस जरुर कीजिएगा और बताइएगा कि कैसा लगा।"

मैं कुछ जवाब देता कि वे जा चुके थे।

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4 टिप्पणियाँ:

अरुण ने कहा...

रविन्दर जी मतलब यह तो तय हो गया कि आप बुद्धीजिवी नही है हम आपके बारे मे गलत सोचते थे

14 मई, 2007 9:08 अपराह्न  
Shrish ने कहा...

भगवान ऐसे बुद्धिजीवी देश में बनाए रखे। :)

15 मई, 2007 2:37 अपराह्न  
Divine India ने कहा...

श्रीश जी का कहना सही है… :)

16 मई, 2007 1:03 पूर्वाह्न  
naresh ने कहा...

yadi buddhijivi ji yesa sochte hai ki tllevision ko ASHLIL naam ki bimari ho gayee hai to mujhe lagta hai ki vo sahi sochte hai..aap mujhe bhi unhi ki biradri me shamil kar dijiye..lekin ye umeed mat kijiyega ki mai jab talk show me aaunga to apse message karne ke liye kahunga...ek baat aur apko bhi kai kai bar kurte payjame me dekha gaya hai...

3 जुलाई, 2007 6:49 अपराह्न  

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