अरुण अरोड़ा के व्यंग्य दोहे
फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा एक बार फिर हाज़िर हैं "मस्ती की बस्ती" में। इस बार वे सुना रहे हैं आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कबीर और रहीम के दोहे। आप भी इन दोहों का मज़ा लीजिए:
१. "निन्दक नियैरे राखिये,खाय़ पियै सो जाये
ना काहू सै बोल सकै ,ना कोई पंगा पाय"
२. "नेता ऐसो चाहिये, जैसो सूप सुभाय
चंदो सारो गहि धरै, देय रसीद उडाय"
३. "रहिमन निज करमन की गाथा, मन ही राखो गोय
ना सेकेटरी को शामिल करो, ना शिबु सौरेन सी दुर्गति होय"
४. "रहिमन या राजनीति मे, कभी न खुन्दक दिखायै
ना जाने कब कौन से, दल मे शामिल होनो पड जाये"
५. "कबिरा तेरी झोपडी, गर है थाने के पास
करै कोई तू भरैगा, रख ले ये विश्वास"
६. "जब तक कुर्सी संग है, ले शराब मे रंग
पाच बरस के बाद मे, नसीब न होगी भंग"
७. "रहिमन या लीडरन ते, तजो बैर औ प्रीत
काटे चाटे स्वान के, दुहु भाती विपरीत"
८. "या लीडरन के चरित की, गति समझै नही कोई
ज्यो ज्यो डूबे श्याम रंग, त्यो त्यो उज्जल होई"
९. "कबिरा खडा पार्लियामेंट् मे, देवे सब को धौल
जो बोला सो पिटैगा, दुंगा खोपडी खोल"
१०. "रहिमन या संसार मे, मिलियो सब से धाय
न जाने कौन कब, प्रधान मंत्री बन जाये "
११. "रहिमन चमचा राखिये, काम आये वक्त पर
चमचा बिना न उबरे, नेता अभिनेता अफ़सर"
घोटालो एसो करो, काहु हवा न लगने पाय
ना बाटन को मामला, न चैनल खबर बनाय
बाणी एसी बोलिये, वोट-बैंक को हिसाब लगाये
जनता चाहे जलि मरै, चाहे कोर्ट मे चक्कर खाये
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे अमिताभ उसूल
विज्ञापन ते नोट बनाय, बाकी जाये भूल
भला जो देखण मै चला, भला न मिलया कोए
मुझते और मेरे लाल ते जग मे भलो न कोए
"काल लूटॆ सो आज लूट, आज मारे सो अब
जब वोटिंग हो जायेगी, बहूरी करोगे कब."
चाकी चलती देखकर, दिया कबीरा रोये
पीस के सारा खा गई, दियो न रत्ती कोये
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
जब कुरसी छिन जायेगी , कहा करोगे तब."
कछु न छ्डयो रे नेता कछु न छोटो होये
भुसे के घोटलो मै अरबॊ के नॊट होये
१. "निन्दक नियैरे राखिये,खाय़ पियै सो जाये
ना काहू सै बोल सकै ,ना कोई पंगा पाय"
२. "नेता ऐसो चाहिये, जैसो सूप सुभाय
चंदो सारो गहि धरै, देय रसीद उडाय"
३. "रहिमन निज करमन की गाथा, मन ही राखो गोय
ना सेकेटरी को शामिल करो, ना शिबु सौरेन सी दुर्गति होय"
४. "रहिमन या राजनीति मे, कभी न खुन्दक दिखायै
ना जाने कब कौन से, दल मे शामिल होनो पड जाये"
५. "कबिरा तेरी झोपडी, गर है थाने के पास
करै कोई तू भरैगा, रख ले ये विश्वास"
६. "जब तक कुर्सी संग है, ले शराब मे रंग
पाच बरस के बाद मे, नसीब न होगी भंग"
७. "रहिमन या लीडरन ते, तजो बैर औ प्रीत
काटे चाटे स्वान के, दुहु भाती विपरीत"
८. "या लीडरन के चरित की, गति समझै नही कोई
ज्यो ज्यो डूबे श्याम रंग, त्यो त्यो उज्जल होई"
९. "कबिरा खडा पार्लियामेंट् मे, देवे सब को धौल
जो बोला सो पिटैगा, दुंगा खोपडी खोल"
१०. "रहिमन या संसार मे, मिलियो सब से धाय
न जाने कौन कब, प्रधान मंत्री बन जाये "
११. "रहिमन चमचा राखिये, काम आये वक्त पर
चमचा बिना न उबरे, नेता अभिनेता अफ़सर"
घोटालो एसो करो, काहु हवा न लगने पाय
ना बाटन को मामला, न चैनल खबर बनाय
बाणी एसी बोलिये, वोट-बैंक को हिसाब लगाये
जनता चाहे जलि मरै, चाहे कोर्ट मे चक्कर खाये
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे अमिताभ उसूल
विज्ञापन ते नोट बनाय, बाकी जाये भूल
भला जो देखण मै चला, भला न मिलया कोए
मुझते और मेरे लाल ते जग मे भलो न कोए
"काल लूटॆ सो आज लूट, आज मारे सो अब
जब वोटिंग हो जायेगी, बहूरी करोगे कब."
चाकी चलती देखकर, दिया कबीरा रोये
पीस के सारा खा गई, दियो न रत्ती कोये
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
जब कुरसी छिन जायेगी , कहा करोगे तब."
कछु न छ्डयो रे नेता कछु न छोटो होये
भुसे के घोटलो मै अरबॊ के नॊट होये
लेबल: arun arora, Hindi, satire, व्यंग्य, हिन्दी


7 टिप्पणियाँ:
मजेदार दोहे पढ़कर हंसी आ गई।
@ गौरीजी
चिट्ठे के बाईं तरफ का यह विज्ञापन बहुत तकलीफ दे रहा है। पाँच दोहे विज्ञापन में दब गये हैं। उन्हें पढ़ने के लिये टिप्प्णी के कॉलम पर जाकर Show Original Post पर क्लिक करना पड रहा है। यानि इतना लम्बा रास्ता!!
कोशिश करिये कि यह नीचे या दांई तरफ लग जाये ताकि आसानी से पढ़ा जा सके।
॥दस्तक॥
बोले तो, एकदम झकास!
मजेदार, करारा व्यंग्य. सटीक.
हा हा, बहुत जबरदस्त दिया है कवि महोदय:
५. "कबिरा तेरी झोपडी, गर है थाने के पास
करै कोई तू भरैगा, रख ले ये विश्वास"
क्या बात है, जियो!! बधाई!!
रहिमन तुम ऐसेई लिखो, लिखत लिखत थकि जाओ
जब लागे कि थक गयो, नारद पढ कै आओ
मजेदार एक बार फिर पढ़ कर मजा आ गया।
लगे रहिये बस, एक दिन यहि हिन्दि विश्व कि ग्यान वाणि के रुप मे जानि जायेगि .
अब हिन्दि को विश्व कि भाषा बनने से कोइ नहि रोक सक्ता है.
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