प्रिय रंजन झा का व्यंग्य : क्रिया की कैसी-कैसी प्रतिक्रिया
बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है - लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के विशेष आग्रह पर लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन कर रहे हैं भौतिकी के नियम की नई व्याख्या।
हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है, यह गति का तीसरा नियम है। कहने को तो यह फीजिक्सकी थ्योरी है, लेकिन जिंदगी के हर क्षेत्र में लोग इस थ्योरी को घुसा डालते हैं। या फिर यहकहिए कि इस थ्योरी पर चलना पसंद करते हैं। इसके एकनहीं, तमाम उदाहरण आपको आए दिन देखने को मिल जाएंगे।
गुजरातमें जब खूब दंगे हुए, तो हिंदू हृदय सम्राटों ने कहा कि वे कुछ नहीं करसकते, क्योंकि यहतो क्रिया के विपरीतहुई प्रतिक्रिया है - जो कुछ हुआ, वह गोधरा कांड का रिएक्शन था। ऐसे ही'तुष्टीकरण' के पुरोधा अक्सर यह कहते हैं कि हिंदू मुसलमानों को बहुत डरा रहे हैं, इसलिए मुसलमान कट्टर हो रहे हैं। खैर, ऐसे और भी कई उदाहरण हैं, जिसमें गति के इस नियम को लागू होते देखने में लोग गर्व का अनुभव करते हैं। अजीब तो यह है कि 'क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया' का तर्क अक्सर लोग अपने गलत कामों को सही साबित करने के लिए देते हैं। मेरे एक गुरुजी थे, वे गति के इस नियम को कुछ ज्यादा ही मानते थे। उनका मानना था कि जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ेगी, लोग वैसे-वैसे पीछे हटेंगे। लोग एक तरफ तो इस बात पर गर्व करेंगे कि हम ग्लोबल विलेज में रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे घनघोर क्षेत्रीयतावादी मानसिकता के स्वामी भी होंगे। उनकी बात आज सौ फीसदी सच लगती है। आज फ्रांस से लेकर मुंबई तक यही हाल है। राष्ट्रपति सर्कोजी फ्रांस में विदेशियोंको देखना नहीं चाहते, तो बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक गैरमराठियोंको महाराष्ट्र में नहीं देखना चाहते। अब ठाकरे लोगों को यह कौन बताए कि उनकी ऐसी सोच (क्रिया) की प्रतिक्रियामें अगर दूसरी जगहों पर रह रहे मराठियों को खदेड़ दिया जाए, तो उनका क्याहोगा?
हमारे गुरुजी इस थ्योरी कोसमझाने के लिए वे एक जुमले का इस्तेमाल करते थे - 'जौं जौं मुर्गी मोटानी, तौं तौं दुम सिकुड़ानी।' कहने का मतलब यह कि जब मुर्गियां छोटी होती हैं, तो उनकी दुम (अगर होती है, तो) मोटी होती है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी व मोटी होती जाती हैं, उनकी दुम सिकुड़ती चली जाती है। आजकल के बच्चों को ही लीजिए, समय के साथ मुर्गियों जैसे ही उनकी दुम भी सिकुड़ रही है। नए जमाने के बच्चे अभिमन्यु की तरह गर्भ से हीबहुत कुछ सीखकर आते हैं। आज के तीन-चार साल के बच्चों में जितनी अक्ल होती है, आज से बीस-तीस पहले अगर इस उम्र में इतनी अक्ल होती, तो पता नहीं अपना देश कहां चला गया होता!
खैर, तो हम बात कर रहे थे, दुम सिकुड़ने की। हाल में मेरे एक दोस्त के साथ दिलचस्प वाकिया हुआ। रिक्शा से बाजार जाते हुए कॉन्वेन्टमें पढ़ रहे उसके पांचवर्षीय बेटे ने खुश होते हुए कहा - पापा, वो देखो बकरियां जा रही हैं। इससे पहले कि मेरा दोस्त बकरियों की ओर देखता, रिक्शा वाला हैरान होकर रिक्शा रोककर खड़ा हो चुका था। दरअसल, वह इस बात को लेकर हैरान था कि कंप्यूटर से लेकर हवाई जहाज तक की बात कर रहा यह बच्चा गदहे को भी नहीं पहचानता और उसे बकरी बता रहा है! रिक्शा वाला भले ही हैरान हो, लेकिन मेरी समझ से यह मॉडर्न होने जैसी क्रिया की प्रतिक्रिया है। इसे आप कतई बच्चों की नासमझी न कहें, क्योंकि अगर वह नासमझ होता, तो विंडोज विस्टाऔर कॉन्कर्ड विमानों की बातें कैसे करता?
वैसे, सच यह भी हैकि अगर आपको मॉडर्न दिखना है, तो गदहे को पहचानने से इनकार करना ही होगा, क्योंकि वह बीते जमाने का जानवर है। और बीते जमाने की चीजों का आज क्या काम! यह मॉडर्न होने की प्रतिक्रिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि गदहे को नहीं पहचानने पर भी न तो आपका जीके कमजोर माना जाएगा और न ही इससे आपके पेट पर लात पड़ेगी। बच्चों के लिए यह जमाना राम-कृष्ण और गांधी-सुभाषसे ज्यादा अमिताभ-सलमानऔर बैटमैन-स्पाइडरमैन को जानने का है, क्योंकि इसी तरह के ज्ञान की अब जरूरत पड़ती है - स्कूल-कॉलेज कैंटीन से लेकर टीवी के रियलिटीशो तक में। तो यह है नई पीढ़ी का ज्ञान - इसे आप क्रिया की प्रतिक्रिया कह सकते हैं या फिर बढ़ती मुर्गी की सिकुड़ती दुम भी, लेकिन क्या आप यह बता सकते हैं कि इतनी रामकहानी किस क्रिया की प्रतिक्रिया में लिखी गई है?
हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है, यह गति का तीसरा नियम है। कहने को तो यह फीजिक्सकी थ्योरी है, लेकिन जिंदगी के हर क्षेत्र में लोग इस थ्योरी को घुसा डालते हैं। या फिर यहकहिए कि इस थ्योरी पर चलना पसंद करते हैं। इसके एकनहीं, तमाम उदाहरण आपको आए दिन देखने को मिल जाएंगे।
गुजरातमें जब खूब दंगे हुए, तो हिंदू हृदय सम्राटों ने कहा कि वे कुछ नहीं करसकते, क्योंकि यहतो क्रिया के विपरीतहुई प्रतिक्रिया है - जो कुछ हुआ, वह गोधरा कांड का रिएक्शन था। ऐसे ही'तुष्टीकरण' के पुरोधा अक्सर यह कहते हैं कि हिंदू मुसलमानों को बहुत डरा रहे हैं, इसलिए मुसलमान कट्टर हो रहे हैं। खैर, ऐसे और भी कई उदाहरण हैं, जिसमें गति के इस नियम को लागू होते देखने में लोग गर्व का अनुभव करते हैं। अजीब तो यह है कि 'क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया' का तर्क अक्सर लोग अपने गलत कामों को सही साबित करने के लिए देते हैं। मेरे एक गुरुजी थे, वे गति के इस नियम को कुछ ज्यादा ही मानते थे। उनका मानना था कि जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ेगी, लोग वैसे-वैसे पीछे हटेंगे। लोग एक तरफ तो इस बात पर गर्व करेंगे कि हम ग्लोबल विलेज में रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे घनघोर क्षेत्रीयतावादी मानसिकता के स्वामी भी होंगे। उनकी बात आज सौ फीसदी सच लगती है। आज फ्रांस से लेकर मुंबई तक यही हाल है। राष्ट्रपति सर्कोजी फ्रांस में विदेशियोंको देखना नहीं चाहते, तो बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक गैरमराठियोंको महाराष्ट्र में नहीं देखना चाहते। अब ठाकरे लोगों को यह कौन बताए कि उनकी ऐसी सोच (क्रिया) की प्रतिक्रियामें अगर दूसरी जगहों पर रह रहे मराठियों को खदेड़ दिया जाए, तो उनका क्याहोगा?
हमारे गुरुजी इस थ्योरी कोसमझाने के लिए वे एक जुमले का इस्तेमाल करते थे - 'जौं जौं मुर्गी मोटानी, तौं तौं दुम सिकुड़ानी।' कहने का मतलब यह कि जब मुर्गियां छोटी होती हैं, तो उनकी दुम (अगर होती है, तो) मोटी होती है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी व मोटी होती जाती हैं, उनकी दुम सिकुड़ती चली जाती है। आजकल के बच्चों को ही लीजिए, समय के साथ मुर्गियों जैसे ही उनकी दुम भी सिकुड़ रही है। नए जमाने के बच्चे अभिमन्यु की तरह गर्भ से हीबहुत कुछ सीखकर आते हैं। आज के तीन-चार साल के बच्चों में जितनी अक्ल होती है, आज से बीस-तीस पहले अगर इस उम्र में इतनी अक्ल होती, तो पता नहीं अपना देश कहां चला गया होता!
खैर, तो हम बात कर रहे थे, दुम सिकुड़ने की। हाल में मेरे एक दोस्त के साथ दिलचस्प वाकिया हुआ। रिक्शा से बाजार जाते हुए कॉन्वेन्टमें पढ़ रहे उसके पांचवर्षीय बेटे ने खुश होते हुए कहा - पापा, वो देखो बकरियां जा रही हैं। इससे पहले कि मेरा दोस्त बकरियों की ओर देखता, रिक्शा वाला हैरान होकर रिक्शा रोककर खड़ा हो चुका था। दरअसल, वह इस बात को लेकर हैरान था कि कंप्यूटर से लेकर हवाई जहाज तक की बात कर रहा यह बच्चा गदहे को भी नहीं पहचानता और उसे बकरी बता रहा है! रिक्शा वाला भले ही हैरान हो, लेकिन मेरी समझ से यह मॉडर्न होने जैसी क्रिया की प्रतिक्रिया है। इसे आप कतई बच्चों की नासमझी न कहें, क्योंकि अगर वह नासमझ होता, तो विंडोज विस्टाऔर कॉन्कर्ड विमानों की बातें कैसे करता?
वैसे, सच यह भी हैकि अगर आपको मॉडर्न दिखना है, तो गदहे को पहचानने से इनकार करना ही होगा, क्योंकि वह बीते जमाने का जानवर है। और बीते जमाने की चीजों का आज क्या काम! यह मॉडर्न होने की प्रतिक्रिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि गदहे को नहीं पहचानने पर भी न तो आपका जीके कमजोर माना जाएगा और न ही इससे आपके पेट पर लात पड़ेगी। बच्चों के लिए यह जमाना राम-कृष्ण और गांधी-सुभाषसे ज्यादा अमिताभ-सलमानऔर बैटमैन-स्पाइडरमैन को जानने का है, क्योंकि इसी तरह के ज्ञान की अब जरूरत पड़ती है - स्कूल-कॉलेज कैंटीन से लेकर टीवी के रियलिटीशो तक में। तो यह है नई पीढ़ी का ज्ञान - इसे आप क्रिया की प्रतिक्रिया कह सकते हैं या फिर बढ़ती मुर्गी की सिकुड़ती दुम भी, लेकिन क्या आप यह बता सकते हैं कि इतनी रामकहानी किस क्रिया की प्रतिक्रिया में लिखी गई है?
लेबल: Hindi, priya ranjan jha, satire, व्यंग्य, हिन्दी


4 टिप्पणियाँ:
अच्छा व्यंग्य.
राजेश कुमार
मुझे भी लगता है कि बकरी और गदहे में फर्क कर सकने की लोगों की क्षमता बेहद कम होती जा रही है.
झा बाबू को बधाई प्रेषित की जाय। बढ़िया व्यंग्य लिखे हैं। शैली की विविधता से भी मज़ा आया।
अब हम ये तो नहीँ कह सकते कि यह लेख किस प्रतिक्रिया में लिखा गया है, पर यह अवश्य हौ कि इस लेख की प्रतिक्रिया तो हो ही गयी। देखिये प्रतिक्रिया में ही तो हम सभी लोग टिप्पणी दिये हैं।
बहुत अच्छा लिखा है झाजी!
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