आलोक पुराणिक का व्यंग्य : ई-शि और ताज सिंड्रोम
आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक का व्यंग्य दफ़्तरों के लिए इजाद किए गए ख़ास जुमलों पर।दफ़्तर में काम करने वाले याद नहीं रहते, क़िस्से सुनाने वाले याद रहते हैं। दफ़्तर में जमकर मेहनत करने वाले याद नहीं रहते, जुमलेबाज़ी करने वाले याद रहते हैं। सो वक़्त का तकाज़ा है कि सही से, नये से जुमले पेश किये जायें। सो दफ़्तरार्थियों के लिए कतिपय नये टाइप के जुमले इस प्रकार हैं।
जुमला नंबर वन - ई-शि
ई-शि कर दिया ना।
अरे ई-शि नहीं किया तो बताओ कि कैसे एक्शन किया जा सकता है।
ई-शि समझे ना? नहीं समझे तो समझिये कि इस दौर में माडर्न होने के लिए हर बात के आगे ई लगाना लाज़मी है। जैसे ई-गर्वर्नैंस, ई-मेल,ई-चेकिंग, ई-चैट, ई-चमचागिरी, ई-गपशप।
समझे कि नहीं ई का जलवा। समझिये, यूँ समझिये जैसे आपने किसी सरकारी दफ़्तर में किसी काम के लिए अप्लाई किया, उस पर बाबू ने लिखा - नौट यानी एनओटी एक्सेप्टेड यानी नामंज़ूर। इसके बाद आप एनओटी में एक ई और लगा दीजिये यानी नोट करेंसी वाला नोट। आपकी एप्लीकेशन फ़ौरन मंज़ूर हो जायेगी।
यानी ई को पहले लगाइए या बाद में, झक्कास रिजल्ट देता है। सो साहब ई-शि किया या नहीं? यानी ई-शिकायत की या नहीं। किसी को कोई भी प्राबलम हो, वह कोई शिकायत दर्ज कराना चाहता हो, उसे कहिए कि ई-शि कीजिये यानी ई-मेल के ज़रिये शिकायत कीजिये। यह व्याख्यान दीजिये कि क्योंकि हर शिकायत वाया ई-मेल करना बहुत ज़रुरी है। ई-शि नहीं की, बिल गेट्स बुरा मान जायेंगे। बिल गेट्स बुरा मान गये, तो बहुत दिक़्क़त हो जायेगी। ख़ैर साहब-ई-शि के फायदे इस प्रकार हैं-
1- ई-शि से आधी शिकायतें खुद-ब-खुद ख़त्म हो जाती हैं।
एक ज़माने में मैं जब एक दफ़्तर में काम किया करता था, तो जूनियर आते थे, पैन दे दीजिये, पेंसिल दे दीजिये, काग़ज़ दिलवाईये। स्टेशनरी दिलवाइए। मैंने नियम बनाया कि ई-शि कीजिये, ई-मेल के ज़रिये अपनी प्राबलम बताइए। आधे से ज़्यादा लोग ई-मेल की ज़हमत उठाने के बजाय अपनी जेब से ही पेन-पेंसिल लाने लगे।
बाकी बचे आधे ई-शि कर भी देते थे, तो मैं तीन दिन तक टहलाया करता था कि मुझे आपका ई-मेल मिला नहीं, शायद कंप्यूटर का सर्वर डाऊन है। सर्वर डाऊन है, यह बहाना एक हफ़्ते तक खींचा जा सकता है। बचे आधे में से आधे इस एक हफ़्ते में अपनी जेब से पैन-पेंसिल ख़रीद कर ले आते थे। इसके बाद भी जो बंदे पीछा नहीं छोड़ते थे, वो तो दफ़्तर के पैन-पेंसिल के हक़दार थे ही। ई-शि से दफ़्तर का बहुत ख़र्च बचने लगा।
2- ई-शि से दफ़्तर में पालिटिक्स बहुत कम हो जाती है। एक ज़माने में मैं जब एक दफ़्तर में काम किया करता था, तो शर्माजी वर्माजी के ख़िलाफ़ कुछ कहते थे और वर्माजी शर्माजी के ख़िलाफ़ कुछ कहते थे। मैंने नियम बना दिया कि ऑफ़ दि रिकॉर्ड पॉलिटिक्स नहीं होगी। जो भी होगा, ई-शि के ज़रिये होगा। वर्माजी ई-मेल के जरिये शर्माजी के बारे में बतायेंगे। ई-शि के ज़रिये लोगों ने पालिटिक्स करना छोड़ दिया। दफ्तर में बहुत शांति हो गयी।
3- ई-शि से एक बड़ा फ़ायदा यह होता है कि बास के लिए पालिटिक्स करना बहुत आसान हो जाता है। अब बास जिस कर्मचारी की छवि चमकाना चाहता है, उसके बारे में मीटिंग में सबके सामने कह सकता है कि देखिये इस कर्मचारी ने नयी तकनीक को कैसे आत्मसात किया है। हर बात यह नयी तकनीक के ज़रिये ही कहता है। ऐसी ही कर्मचारियों के बूते कंपनी का नव-निर्माण हो सकता है।
और ई-शि का इस्तेमाल उन कर्मचारियों के खिलाफ भी हो सकता है, जिनसे बास खुंदकायमान हो। जैसे सबके सामने मीटिंग में यह कहा जा सकता है कि देखिये, कैसे वेस्ट हो रही है नयी तकनीक। जिस तकनीक के ज़रिये गंभीर चिंतन होना चाहिए था। गंभीर बातें होनी चाहिए थीं, उसके ज़रिये हमारे कर्मचारी पैन, पेंसिल मांगते हैं। धिक्कार है हम सब पर। हाय बिल गेट्स हम पर हँसता होगा रे।
जुमला नंबर टू - ताज सिंड्रोम
जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि कसे हुए जुमले सबको याद रहते हैं। ताज सिंड्रोम एक नया जुमला है, जो इस ख़ाकसार ने कल ही ईजाद किया है। इसे दफ़्तर में आप अपने प्रतिद्वंदियों को उखाड़ने और अपने बंदों को जमाने के लिए कर सकते हैं। आजकल हर दफ़्तर में पालिटिक्स इतनी नीरस टाइप हो गयी है कि बास लोग उससे परेशान हो गये हैं। आप अपने प्रतिद्वंदी को उखाड़ने के लिए शुरुआत कुछ इस तरह से करें, तो बास निश्चय ही आपको सुनेंगे। मान लीजिये कि आपके प्रतिद्वंदी मिस्टर शर्मा हैं। आप बास से बात की शुरुआत कुछ इस तरह से करें-
बास मिस्टर शर्मा आजकल ताज सिंड्रोम से ग्रस्त हैं।
बास पक्के तौर पर पूछेंगे-ये ताज सिंड्रोम क्या होता है।
ताज सिंड्रोम का मतलब यही होता है कि जिन चीज़ों की ज़रुरत नहीं है, उन पर तो बहुत पैसा ख़र्च किया जाये। और जिनकी ज़रुरत है, उन पर ध्यान नहीं दिया जाये। अब देखिये शाहजहाँ ने जब ताजमहल बनवाया था, तब आगरा में अकाल पड़ा हुआ था। इसके बावजूद शाहजहाँ ने ताजमहल में मोटी रकम लगा दी। इसीलिए तो औरंगजेब नाराज़ हुआ था शाहजहाँ से। मिस्टर शर्मा ने दफ़्तर में हर महीने क्लर्कों को एक के बजाय दो पैन देना शुरु कर दिया है। बताइए ये ताज सिंड्रोम है कि नहीं।
बास आपके ताज सिंड्रोम में डूब कर रह जायेगा।
और अगर किसी को जमाना है, तो ताज सिंड्रोम का इस्तेमाल इस तरह से कीजिये। मान लीजिये आपको मिस्टर वर्मा को जमाना है। बास के पास जाकर कहिये देखिये मिस्टर वर्मा आजकल ताज सिंड्रोम के लपेटे में आ गये हैं। अच्छा है।
बास पूछेगा- ये क्या होता है।
अरे ताज सिंड्रोम नहीं जानते, कैलीफ़ोर्निया जर्नल आफ मैनेजमेंट में इस पर पूरा लेख है। इसमें बंदा बहुत मेहनत से, बहुत लगन से किसी चीज को संवारता है। निखारता है। समय की चिंता नहीं करता है। वर्माजी भी आजकर नये प्रोजेक्ट में ऐसी ही लगे हुए हैं, जैसे ताजमहल बना रहे हों।
समझे कि नहीं, ताज सिंड्रोम? तो लीजिये ई-शि और ताज सिंड्रोम से हमें निम्नलिखित शिक्षाएँ मिलती हैं -
1- काम करने वाले नहीं, धाँसू जुमले देने वाले याद किये जाते हैं।
2- ई-शि से शिकायतें कम हो जाती हैं, दफ़्तर का ख़र्च कम हो जाता है।
3- ताज सिंड्रोम से आप किसी को भी जमा सकते हैं, किसी को भी उखाड़ सकते हैं।
लेबल: alok puranik, Hindi, satire, व्यंग्य, हिन्दी


4 टिप्पणियाँ:
kyaa baat hai aapko bhI taaj sindrom ho gaya hai,yabhi din me do do posT aa rahi hai
ताज सिन्ड्रोम दिन में दो का होता तो भी ठीक...एक ही पोस्ट में दो दो जुमले... :)
--बहुत भयंकर रुप से ग्रसित दिख रहे हो ताज सिंड्रोम से..हा हा!!!
बढ़िया है.
बढिया है।
हेहे आपको तो पक्का ताज सिंड्रोम हो गया है। अब कौन से वाला ये हम नहीं बताने वाले।
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