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शुक्रवार, 22 जून, 2007

राकेश कायस्थ का व्यंग्य : साधु भूखा भाव का

वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के नज़रिए और बोलने के अंदाज़ में ही व्यंग्य है - लिहाज़ा उनका व्यंग्य लिखने का अपना अलग अंदाज़ है। अमर उजाला से लेकर दैनिक ट्रिब्यून तक कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उनके १५० से ज़्यादा व्यंग्य प्रकाशित हो चुके हैं। व्यंग्य की किताब जल्द बाज़ार में आने को है।

कॉलबेल की आवाज़ इतनी कर्कश थी कि बिस्तर से उठकर सीधा दरवाज़े की तरफ भागा। दरवाज़ा खोला तो सामने धर्म साक्षात खड़ा था। दैवदीप्तिमान व्यक्तित्व, ललाट पर त्रिपुंड, एक हाथ में कमंडल, दूसरे में मोबाइल और साथ चंदे की रसीद। पल भर को लगा कि गलती से चैनल तो नहीं बदल गया और एफटीवी की जगह संस्कार लग गया। दरअसल रात को एफटीवी देखते ही आंख लगी थी। ` साधु महाराज द्वार पर खड़े हैं और तुम अभी तक शयन कर रहे हो, जागो बच्चा, अपने कर्तव्य का निर्वाह करो।`

बाबाजी के आदेश से तंद्रा टूटी, जानना चाहा, धर्म-कर्म से रहित व्यक्ति की कोठरी में आने का कष्ट कैसे किया। बाबाजी ने कहा कि कारण विशेष है,लेकिन साधु महाराज पहले जलपान करेंगे, प्रयोजन बाद में बताएंगे। मैंने कहा- इस तुच्छ प्राणी की कुटिया में कुछ भी ऐसा नहीं कि बाबाजी भोग लगा सके। बाबाजी हंसकर शुभ वचन बोले— साधु तो भाव का भूखा होता है, बच्चा प्रेम से जो दे देगा, वही भोग लगा लेंगे।

अनजाने में बाबाजी ने मुझे सूत्र वाक्य दे दिया। सचमुच सारे साधु भाव के ही भूखे होते हैं। भाव ना मिले तो दुर्वासा हो जाते हैं। आडवाणी जी ने भाव नहीं दिया विश्व हिंदू परिषद के सारे साधु कमंडल का जल छिड़कने दौड़े। संघ के महात्माओं ने भी यही कहा कि अगर साधु संतों को भाव नहीं दिया तो बेभाव की ही पड़ेगी। थके-हारे आडवाणी जी वानप्रस्थ की तैयारी करने लगे। एनडीए का राज बदला, लेकिन भाव के भूखे साधु का क्रोध कम नहीं हुआ। नई सरकार में आरजेडी के आठ-आठ मंत्री बने, लेकिन साधु इस बात पर बिलखते रहे कि उनका नंबर नहीं आया।

.. निठल्ले चिंतन में मैं यह भूल ही गया था कि द्वार पर सचमुच के साधु महाराज बैठे हैं। बियर की बोतलें करीने से हटाने के बाद मैंने पूछा—मैगी खाएंगे क्या, मैं पिछले तीन दिन से यही खा रहा हूं। बाबाजी ने स्वीकृति में सिर हिलाया और मैं दो मिनट में मैगी बना लाया। भाव के भूखे साधु महाराज सचमुच के भी भूखे थे। विजातीय भोज्य पदार्थ पर टूट पड़े। जलपान समाप्त करके प्रयोजन बताया—चौराहे पर जो नया मंदिर बना है, उसकी प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसी के लिए सहयोग चाहिए। प्राण प्रतिष्ठा क्या होती है?`देवताओं का आह्ववान किया जाएगा, देवता आएंगे और प्रतिमाओं में प्रतिष्ठित हो जाएंगे`। साधु महाराज ने प्रकाश डाला। लेकिन मैं तो मनुष्य हूं, मैं क्या सहयोग कर सकता हूं? बहुत दिमाग़ दौड़ाने के बाद लगा शायद साधु महाराज प्राणी मात्र में ईश्वर को देखते हैं, शायद इसी लिए मेरे पास आये हैं। कलयुग में ऐसे महात्मा मिलते ही कहां हैं। धन्य हो साधु महाराज।

बाबाजी की महानता पर मन ही मन मुदित हो रहा था कि उन्होने बताया- सहयोग तुम्हे भंडारे और छज्जू चौबे एंड पार्टी की भजन संध्या के लिए करना है। कुछ समझ पाता इससे पहले बाबाजी ने चंदे की रसीद निकाली और 1100 रुपये लिख डाले। ` लेकिन बाबाजी यह रकम तो मेरे कमरे के किराये जितनी है।`

` अच्छा चलो 501 ही दे दो।` भाव का भूखा साधु मोल भाव पर आ गया।

`लेकिन बाबाजी इतने पैसे अगर आपको दे दिये, तो बिजली का बिल कहां से दूंगा, मोबाइल कैसे रिचार्ज कराउंगा।`

भोग विलास के लिए धन है, लेकिन धर्म के लिए नहीं। इसलिए तो हिंदू समाज का पतन हो रहा है। ठीक है, 201 रुपये ही दे दो।

बस का किराया कहां से चुकाउंगा, आपके जैसे महात्मा आ गये उन्हें क्या खिलाउंगा। साधु द्वार से भूखा जाएगा, तो पाप का भागी मैं ही बनूंगा ना। मैंने कातर होकर कहा। फिर अत्यंत श्रद्धा से 21 रुपये निकालकर बाबाजी के कर कमलों में रखे और दोनों हाथ जोड़ दिये—बस इतना ही सामर्थ्य महाराज। बाबाजी ने आग्नेय नेत्रों से देखा और बोले- तो यही है, तुम्हारी आस्था। डेढ़ घंटे ख़राब करके 21 रुपये दे रहो हो, पहले मालूम होता कि इतने कृपण हो, तो आता ही नहीं। बाबाजी का रौद्र रूप देखकर लगा कि मुझ जैसे कड़के की भेंट कतई स्वीकार नहीं करेंगे। दुखी मन से 21 रुपये वापस लेने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन भाव के भूखे साधु ने क्रोध से मुट्ठी बंद कर ली और इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता कमंडल थामकर मेरी गली पार कर गया।

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7 टिप्पणियाँ:

अरुण ने कहा...

बुरी बात है इतना वक्त खराब कर बस २१ रुपये
"दैवदीप्तिमान व्यक्तित्व, ललाट पर त्रिपुंड, एक हाथ में कमंडल, दूसरे में मोबाइल और साथ चंदे की रसीद।"
भाइ समय की कीमत समझिये आपके समय की कीमत नही पर उसके तो थी
:)

22 जून, 2007 2:37 अपराह्न  
अनूप शुक्ला ने कहा...

सही है। २१ रुपये देने के लिये एक रुपये का छुट्टा कैसे मिला?

22 जून, 2007 9:56 अपराह्न  
Shrish ने कहा...

हम्म यह भी खूब रही, शुक्र है बाबाजी श्राप नहीं दे गए। :)

22 जून, 2007 10:40 अपराह्न  
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने कहा...

राकेश जी, बधाई हो। भाव के भूखे बाबाओं के बहाने कई लोगों की अच्छी ख़बर ली है। अच्छा व्यंग्य है।

23 जून, 2007 7:44 पूर्वाह्न  
naresh ने कहा...

GALTI SAADHU BABA KI NAHI SIR AAPKI HAI..DARASAL SABERE SABERE SADHU BABA KO MAHNGI MAGGI JO KHILA DI..BABA KO BHI MANIA HO GAYA ..VERNA SADHU KI KYA MAJAL JO 501 KI RASEED KAT DETA...VAISE SIR YE DER RAT TAK FAISHON TV NIHARNE KA KYA MATLAB..TELEVISION KE ITIHAS ME KUCH NAYA DHAMAKA KARNE KE MOOD ME HAI KYA..DASMUNSHI KA DHYAN TO HAI NA..SIR LAGTA HAI YE VAKYA KAFI PURNA HAI..KYONKI KAMRE KA KIRAYA AUR YE BUS KI SAWARI TO BEETE JAMANE KI BAAT LAGTI HAI..KYA SIR SAHI HAI HAI NA...MASSAALLA AB TO..DTC KI BUS ME SAFAR KARNA ULTI AUR DUST KO DAWAT DENA JAISA HAI....KHAIR BAAA KE BARE ME SOCH RAHA HOON KAHI MERE GHAR NA DASTAK DE DE..DIYA TO RAT KA KHILA KE HI DAM LUNGA..TAB DEKHNA...ULTE PAISE DEKAR NAHI GAYA TO KAHNA....NARESH BISEN

30 जून, 2007 10:12 अपराह्न  
रवीन्द्र रंजन ने कहा...

शुक्र है धर्म के ठेकेदार बाबाजी ने महज २१ रुपये में ही आपका पीछा छोड़ दिया। वैसे हम होते तो शायद ११ रुपये में ही उन जनाब से पीछा छुड़ा लेते। अब इसके लिये आप हमें कंजूस समझें या फिर वो साहब नास्तिक और अधर्मी जैसे विशेषणों से नवाजें, हमें परवाह नहीं। एक सुझाव (बिल्कुल मुफ्त) अपने घर के मुख्य दरवाजे पर एक बारीक सा छिद्र बनवा लें और उसके जरिये आने वाले मेहमान का जायजा लेने के बाद ही दरवाजा खोलें। अगली बार के लिए बेस्ट आफ लक।

2 जुलाई, 2007 6:03 अपराह्न  
pandit ji ने कहा...

ऐसे पाखंडियों की सेवा-पानी के लिये हमारे हरियाणा में स्वामी मुगदरानंद महाराज की मदद ली जाती हैं। पूरे ऋद्धा भाव से दो हाथ पड़े नहीं कि चंदा मांगने वाला बंदा बन जाता है। फिर वो दक्षिणा लेकर नहीं, देकर जाएगा। चाहें तो अगली बार ये नुस्खा आजमाकर देख लें...

2 जुलाई, 2007 7:41 अपराह्न  

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