प्रपंचतंत्र : ऐबों के सुपरिणाम की कहानी
आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का व्यंग्य - "ऐबों के सुपरिणाम की कहानी"।जंगलपुरम् नाम शहर में तमाम कंपनियों के हेडक्वार्टर थे। हेडक्वार्टर में होता यह था जो कि भी अपने बास को क्वार्टर पहुंचाया करता था, वह हेड हो जाया करता था। इस तरह से कई बंदे प्रोग्रेस की राह पर आगे बढ़ रहे थे।
एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में शेर सिंह नाम का बास था, उसके दो जूनियर थे। एक का नाम था सियार सिंह और दूसरे का नाम था टाइगरप्रसाद। टाइगरप्रसाद दूर के रिश्ते के हिसाब से शेर सिंह का रिश्तेदार लगता था। टाइगरप्रसाद अपने नाम के अनुरुप गुणों से युक्त था। वह हमेशा सच बोलता था। वह सिगरेट, शऱाब से परहेज करता था। कैबरे-डिस्को से दूर रहता था। और तो और, वह झूठ तक नहीं बोलता था।
सियार सिंह मौके की नजाकत समझता था और तदनुरुप आचरण करता था। दो अक्तूबर यानी गांधी जयंती वाले दिन वह सत्य और नैतिकता पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार पाया करता था। पर इस पुरस्कार से प्राप्त राशि से वह निर्णायकों को क्वार्टर या अद्धा पिलाया करता था। इस तरह से जब सत्य में फायदा होता था, तो वह सत्य–सत्य करने लगता था। जब उसे लगता था कि फायदा अन्य गतिविधियों में है, तो वह अन्य गतिविधियों पर उतर जाता था।
उसका मानना था कि गतिशीलता में ही जीवन है। सवाल सत्संग का नहीं है, सवाल कुसंग का नहीं है। सवाल फायदे के संग का है। सियार सिंह ने तमाम संतों के प्रवचन स्थलों पर कैसेटों-किताबों के स्टाल लगाकर भी कमाया था और दारु की ब्लेक करके भी कमाया था। सियार सिंह कैबरे के ठिकानों को भी जानता था और यह भी जानता था कि शहर के श्रेष्ठ मंदिर कहां पर है। इस तरह से चौतरफा कार्रवाई करके वह प्रसन्न रहा करता था।
टाइगरप्रसाद का मामला एकतरफा था। वह सिर्फ और सिर्फ सत्य नैतिकता की बात करता था और अपने बास शेर सिंह को भी इसी तरह की बातें बताया करता था। शेर सिंह टाइगरप्रसाद से थोड़ा खुटका वैसे भी खाया करते थे क्योंकि वह जानते थे कि रिश्तेदारों से भले की उम्मीद कुछ इस तरह की है, जैसे गंजों के मुहल्ले में कोई कंघे की दुकान से मुनाफा कमाने की उम्मीद करे।
खैर, साहब कंपनी बहुराष्ट्रीय थी। रुस और ब्रिटेन नामक देशों से दो प्रतिनिधिमंडल आये। दोनों के हाथों में करोड़ों के आर्डर थे। शेर सिंह ने एक डेलीगेशन को मैनेज करने का जिम्मा टाइगर प्रसाद को सौंपा और दूसरे को मैनेज करने का जिम्मा सियार सिंह को सौंपा।
रुस वाले प्रतिनिधिमंडल को भारतीयता से परिचित कराने के उद्देश्य से टाइगरप्रसाद ने दिन में उन्हे तमाम मंदिरों का दौरा कराया और शाम को उन्हे वो कीर्तन में ले गया।
अगले दिन रुस वालों को टाइगरप्रसाद एक लोकल बाबा के प्रवचन सुनवाने ले गया। रुस वाले बोर हो गये और तीन दिन में टाइगर प्रसाद की कंपनी से फूट लिये और फिर कभी नहीं पलटे।
उधर सियार सिंह ने किया यह कि दिन में तो उसने ब्रिटेन वालों को मंदिर दिखाये। पर शाम होते होते सियार सिंह ने विदेशी अफसरों से कहा - भारतीय संस्कृति समग्रता की संस्कृति है। इसमें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की बात हमारी संस्कृति करती है। इसलिए धर्म के बाद काम और अर्थ की बात करनी भी जरुरी है। अंगरेज समझ नहीं पाये। सियार सिंह फिर अंगरेज अफसरों को एक डिस्को में ले गया, जहां बहुत ही शानदार कैबरे नृत्य हो रहे थे। अंगरेज बम बम हो गये। फिर अति ही सुंदर सुरा अंगरेज अफसरों को पेश की गयी। अंगरेज अफसर घबराये, बोले, इट इज रांग।
सियार सिंह बोले - देखिये गलत बात तब होती, जब यह शऱाब होती। ना, यह तो अमृततुल्य प्रसाद है। भारत में कई देवताओं को इसे बतौर प्रसाद चढ़ाया जाता है और हमारे यहां कहा जाता है, अतिथि देवो भव। अर्थात अतिथि देवता होता है। आप हमारे देवता है, आपको अगर हमने यह प्रसाद नहीं चढ़ाया, तो हम पर पाप लगेगा। इस पाप का भागी होने से बेहतर है कि होटल की पांचवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर लूं। मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं क्योंकि मुझे आप मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं -ऐसा कहता हुआ सियारसिंह छत की सीढ़ियों की ओर लपका।
अंगरेज अफसरों ने घबराकर उसे रोका और फिर अंगरेज दारु गटक गये। तत्पश्चात सियार सिंह ने कहा अर्थ को हमारे यहां बहुत बड़ा पुरुषार्थ माना गया है, इसलिए आपको पचास हजार रुपये का अर्थ पेशगी मंजूर करना पड़ेगा, बाकी का दस परसेंट हम आपको आर्डर मिलने के बाद दे देंगे। प्लीज अर्थ को स्वीकार कर लीजिये। वरना इसका मतलब होगा कि आप मुझे मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं - सियार सिंह ने फिर कहा। इस बार एक अंगरेज अफसर अपराध भावना से भरकर बोला - बट यह तो रिश्वत है।
“नहीं यह रिश्वत नहीं है, यह तो पुरुषार्थ है जो आप कर रहे हैं। अर्थ का पुरुषार्थ। पैसा हाथ का मैल है। समझिये कि हम अपना मैल आपको दे रहे हैं। आप तो हमें कृतार्थ कर रहे है कि हम से मैल स्वीकार कर रहे हैं। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मैं समझूंगा कि आप हमे अपने धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं” - सियारसिंह ने कहा। अंगरेज धर्म का पालन करने पर विवश हो गये।
अंगरेज अफसरों ने वापस जाते ही पचास करोड़ के आर्डर दिलवाये। रुसी अफसरों ने वापस जाते ही शेर सिंह को डांटा कि आपने जो आदमी हमें मैनेज करने के लिए रखा था, वह बहुत ही बोरिंग था। सिर्फ सत्य, नैतिकता की बातें करता था।
शेर सिंह ने टाइगरप्रसाद को नौकरी से डिसमिस कर दिया और सियार सिंह का प्रमोशन हो गया। तत्पश्चात इंस्टीट्यूट आफ बिजनेस ग्रोथ में रिश्वत देने के तरीके-विषय भाषण देते हुए सियार सिंह ने कहा -
1- सवाल सत्संग या कुसंग के बीच चुनने का नहीं है। सच यह है कि सत्संग से नोट मिलें, तो सत्संग करना चाहिए और कुसंग से नोट मिलें, तो कुंसंग कर लेना चाहिए। असली सवाल नोटों के संग का है।
2- रिश्वत को रिश्वत की तरह से नहीं देना चाहिए। उसे इस तरह से देना चाहिए मानो आप अपने धर्म का पालन कर रहे हैं और लेने वाला स्वीकार करके अपने धर्म का पालन कर रहा है।
3- तमाम किस्म के ऐबों को फिलोसोफिकल जाम पहना दिया जाये, तो मामला बहुत आसान हो जाता है।
4- बदमाश किस्म के अफसर सिर्फ इंडिया में ही नहीं होते, रुस और ब्रिटेन में भी पाये जाते हैं।
लेबल: alok puranik, Hindi, satire, व्यंग्य, हिन्दी


4 टिप्पणियाँ:
आलोक जी आप जैसे लेखक के लिये टिप्पणी लिखते हुये मेरे हाथ काँप रहे हैं लेकिन आपने जो लिखा है वो निःसन्देह अतुलनीय है ।इस नाचीज को अपने दल में शामिल करें आपकोअ कोई शिकायत का मौका नहीं दूंगा।
बहुत उम्दा सर...
प्रपंचतंत्र की अगली कड़ी की प्रतीक्षा में
-राहुल
वाह अब जाकर हमारी मांग पूरी हुई। प्रपंचतंत्र की यह कहानी पहले भी पढ़ी थी, फिर से पढ़कर मजा आ गया। आलोक जी से निवेदन है कि इस सीरीज की कहानियाँ आगे भी देते रहें।
aj is kalyug me chahun oor prapanch ka hi bolbala hai;and ap hame isse parichit karate hai thankyou
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