अरुण अरोड़ा के व्यंग्यात्मक दोहे
फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा एक बार फिर हाज़िर हैं "मस्ती की बस्ती" में। इस बार वे सुना रहे हैं गुरू पर दोहे, लेकिन ज़रा नए अन्दाज़ में। आप भी इन दोहों का मज़ा लीजिए:
१. गुरु गोविंद दोनो खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने कुर्सी दई दिवाय॥
भावार्थ:- असमंजस मे पडा चेले के सामने सतगुरु और भगवान दोनो खडे है, चेला दुविधा में है कि मै पहले किसके पाँव पड़ूँ।
हे गुरु! मै आप पर बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे कुर्सी दिलादी।
अर्थात् जो काम आये वही बडा है
२. बलिहारी गुरु आपने दिखा दियो जो बार।
दो पगन के लगत ही दिखन लगत है चार॥
भावार्थ:- कलियुगी सतगुरु आपने चेले को बार दिखा कर जीवन सफल कर दिया है, जहाँ दो पैग लगाते ही चार दिखाई देने लगते है।
अर्थात् सच्चा गुरु वही है जो मस्त रहना सिखाए।
३. संसद मंज़िल गुंडई नाव है बाक़ी सब बेकार।
जिस दिन तुम पा जाओगे, सारे दुखडे पार॥
भावार्थ:- प्रिय चेले, नाव रूपी तेरी गुंडागिरी ही तुझे संसद रूपी मंज़िल तक ले जायेगी। बाक़ी सब कुछ मिथ्या है। जिस दिन तुम अपनी मंज़िल पर पहुँच जाओगे, सारे दुःख और पाप समाप्त हो जायेंगे।
अर्थात् मंज़िल तक पहुँचना ही मुख्य उद्देश्य होना चाहिये, चाहे मार्ग कैसा भी हो।
४. गुरु सारे माल समेटिये, चेले को बस नाम।
मन राखि संतोषिये, घूम फिरत सब गाम॥
भावार्थ:- कलयुगी सतगुरु ने मुझे अपना नाम देकर सारा माल समेट लिया है। अब मैं मन में संतोष लिये गाँव-गाँव भटकता फिर रहा हूँ।
अर्थात् गुरु माल समेटे उस से पहले आप गुरु का माल समेट कर कल्टी हो लो, यही सत्य है।
५. सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
जब तक माल बटोरो, कियो प्रेम व्यवहार॥
माया सारी निखस गई, दियो सरक पे डार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार॥
भावार्थ:- अन्त नहीं है कलयुग के सतगुरु की महिमा का, अन्त नहीं है उनके द्वारा किये गये उपकारों का। जब तक खीसे मे माल था, गुरुदेव ने अत्यंत प्रेम पूर्वक व्यवहार किया, पर जब मैं माया से मुक्त हो गया, मुझे सड़क पर डाल दिया।
गुरु के इस कार्य ने मेरे लोचन अर्थात् नेत्र खोल दिये, जिससे मैं अब निरंतर अनंत देख पा रहा हूँ।
अर्थात् मुझ निपट अज्ञानी को गुरु ने ज्ञान देकर गुरु बनाने की बहुत कोशिश की पर मेरी अज्ञानता को अब गुरु ने दूर कर दिया है।
६. अच्छा सतगुरु मिल गया अच्छी मिल गई सीख।
गुरु तो खावै माल पुये, मैं घर-घर मांगू भीख॥
भावार्थ:- मुझे अच्छा सतगुरु मिल गया, अच्छी सीख भी मिल गई। अब मैं चिंताओ से मुक्त होकर घर-घर भीख मांगता हूँ और सतगुरु माल पुये खाते हैं।
अर्थात् चेले से गुरु बनना ज़्यादा सुखदाई है।
७. जा तन विष की बेलरी, नोट है सुख की खान।
सिर फोड़े जो नोट मिले तो भी ससता जान॥
भावार्थ:- यह तन नश्वर है, संसार असार है, बस नोट ही सुख देने वाले हैं – इस मिथ्या जगत में, अगर किसी का सिर फोड़कर भी नोटों की प्राप्ति होती है तो वह सस्ती है। क्योंकि नोट होने से तू हर पाप से मुक्ती का मार्ग निकाल सकता है।
अर्थात् इस मिथ्या संसार मे नोट से बढ़कर कुछ नहीं।
८. अब तो तू अधिकारी है लूट सके जो लूट।
रिटायर्मेंट के बाद में नसीब ना होगी फूट॥
भावार्थ:- अभी तू सरकारी अधिकारी है, जो माल बना सकता हो बना। रिटायर होने के बाद तुझे फूट (खरीफ़ की फ़सल में मक्का के साथ मे होने वाला एक छोटा-सा फल) भी खाने को नहीं मिलेगी।
अर्थात् आज और अभी माल बना, कल की योजना मत सोच।
९. कबिरा बास रिझाइ ले मुख अमृत गुण गाय।
मार्च माह है सर पर, कहीं प्रमोशन ना रह जाय॥
भावार्थ:- कबीर दास कहते हैं मुख मे अमृत जैसी मीठी वाणी लेकर बॉस के गुण गाने का समय है। मार्च का महीना चल रहा है, कहीं प्रमोशन ना रह जाय।
अर्थात् काम चाहे मत करो, पर बॉस को मक्खन लगाना मत भूलो
१०. कबिरा नोट ख़र्च करो, गिफ़्ट लो एक मंगाय।
वापे बोस को नाय लिखो, उसे घर पे दे के आय॥
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कुछ पैसा ख़र्च कर एक अच्छा सा गिफ़्ट मंगा कर बास के घर जाकर खुद देकर आओ।
अर्थात् बॉस को ख़ुश करने का कोई मौक़ा मार्च माह में हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।
१. गुरु गोविंद दोनो खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने कुर्सी दई दिवाय॥
भावार्थ:- असमंजस मे पडा चेले के सामने सतगुरु और भगवान दोनो खडे है, चेला दुविधा में है कि मै पहले किसके पाँव पड़ूँ।
हे गुरु! मै आप पर बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे कुर्सी दिलादी।
अर्थात् जो काम आये वही बडा है
२. बलिहारी गुरु आपने दिखा दियो जो बार।
दो पगन के लगत ही दिखन लगत है चार॥
भावार्थ:- कलियुगी सतगुरु आपने चेले को बार दिखा कर जीवन सफल कर दिया है, जहाँ दो पैग लगाते ही चार दिखाई देने लगते है।
अर्थात् सच्चा गुरु वही है जो मस्त रहना सिखाए।
३. संसद मंज़िल गुंडई नाव है बाक़ी सब बेकार।
जिस दिन तुम पा जाओगे, सारे दुखडे पार॥
भावार्थ:- प्रिय चेले, नाव रूपी तेरी गुंडागिरी ही तुझे संसद रूपी मंज़िल तक ले जायेगी। बाक़ी सब कुछ मिथ्या है। जिस दिन तुम अपनी मंज़िल पर पहुँच जाओगे, सारे दुःख और पाप समाप्त हो जायेंगे।
अर्थात् मंज़िल तक पहुँचना ही मुख्य उद्देश्य होना चाहिये, चाहे मार्ग कैसा भी हो।
४. गुरु सारे माल समेटिये, चेले को बस नाम।
मन राखि संतोषिये, घूम फिरत सब गाम॥
भावार्थ:- कलयुगी सतगुरु ने मुझे अपना नाम देकर सारा माल समेट लिया है। अब मैं मन में संतोष लिये गाँव-गाँव भटकता फिर रहा हूँ।
अर्थात् गुरु माल समेटे उस से पहले आप गुरु का माल समेट कर कल्टी हो लो, यही सत्य है।
५. सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
जब तक माल बटोरो, कियो प्रेम व्यवहार॥
माया सारी निखस गई, दियो सरक पे डार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार॥
भावार्थ:- अन्त नहीं है कलयुग के सतगुरु की महिमा का, अन्त नहीं है उनके द्वारा किये गये उपकारों का। जब तक खीसे मे माल था, गुरुदेव ने अत्यंत प्रेम पूर्वक व्यवहार किया, पर जब मैं माया से मुक्त हो गया, मुझे सड़क पर डाल दिया।
गुरु के इस कार्य ने मेरे लोचन अर्थात् नेत्र खोल दिये, जिससे मैं अब निरंतर अनंत देख पा रहा हूँ।
अर्थात् मुझ निपट अज्ञानी को गुरु ने ज्ञान देकर गुरु बनाने की बहुत कोशिश की पर मेरी अज्ञानता को अब गुरु ने दूर कर दिया है।
६. अच्छा सतगुरु मिल गया अच्छी मिल गई सीख।
गुरु तो खावै माल पुये, मैं घर-घर मांगू भीख॥
भावार्थ:- मुझे अच्छा सतगुरु मिल गया, अच्छी सीख भी मिल गई। अब मैं चिंताओ से मुक्त होकर घर-घर भीख मांगता हूँ और सतगुरु माल पुये खाते हैं।
अर्थात् चेले से गुरु बनना ज़्यादा सुखदाई है।
७. जा तन विष की बेलरी, नोट है सुख की खान।
सिर फोड़े जो नोट मिले तो भी ससता जान॥
भावार्थ:- यह तन नश्वर है, संसार असार है, बस नोट ही सुख देने वाले हैं – इस मिथ्या जगत में, अगर किसी का सिर फोड़कर भी नोटों की प्राप्ति होती है तो वह सस्ती है। क्योंकि नोट होने से तू हर पाप से मुक्ती का मार्ग निकाल सकता है।
अर्थात् इस मिथ्या संसार मे नोट से बढ़कर कुछ नहीं।
८. अब तो तू अधिकारी है लूट सके जो लूट।
रिटायर्मेंट के बाद में नसीब ना होगी फूट॥
भावार्थ:- अभी तू सरकारी अधिकारी है, जो माल बना सकता हो बना। रिटायर होने के बाद तुझे फूट (खरीफ़ की फ़सल में मक्का के साथ मे होने वाला एक छोटा-सा फल) भी खाने को नहीं मिलेगी।
अर्थात् आज और अभी माल बना, कल की योजना मत सोच।
९. कबिरा बास रिझाइ ले मुख अमृत गुण गाय।
मार्च माह है सर पर, कहीं प्रमोशन ना रह जाय॥
भावार्थ:- कबीर दास कहते हैं मुख मे अमृत जैसी मीठी वाणी लेकर बॉस के गुण गाने का समय है। मार्च का महीना चल रहा है, कहीं प्रमोशन ना रह जाय।
अर्थात् काम चाहे मत करो, पर बॉस को मक्खन लगाना मत भूलो
१०. कबिरा नोट ख़र्च करो, गिफ़्ट लो एक मंगाय।
वापे बोस को नाय लिखो, उसे घर पे दे के आय॥
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कुछ पैसा ख़र्च कर एक अच्छा सा गिफ़्ट मंगा कर बास के घर जाकर खुद देकर आओ।
अर्थात् बॉस को ख़ुश करने का कोई मौक़ा मार्च माह में हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।
लेबल: arun arora, Hindi, satire, व्यंग्य, हिन्दी


6 टिप्पणियाँ:
बहुत खूब!! काफी दिन जंगल रह आये दिखता है, बहुत ज्ञान गंगा बह निकली है:
अच्छा सतगुरु मिल गया अच्छी मिल गई सीख।
गुरु तो खावै माल पुये, मैं घर-घर मांगू भीख॥
भावार्थ:- मुझे अच्छा सतगुरु मिल गया, अच्छी सीख भी मिल गई। अब मैं चिंताओ से मुक्त होकर घर-घर भीख मांगता हूँ और सतगुरु माल पुये खाते हैं।
अर्थात् चेले से गुरु बनना ज़्यादा सुखदाई है।
--अटल सत्य!! सारी सुक्तियाँ कमरे में चिपका दी गई हैं, रोज पाठ किया जायेगा.
-अब आप अगली खोज के लिये पुनः जंगल जाने को स्वतंत्र हैं, शुभकामनायें.
अच्छा एक से बढ़कर एक
अरुणजी दोहे और लिखिये।
आप आजकल इतने कवि कैसे होते जा रहे हैं जरा ध्यान रखिए यह रोग ठीक नहीं;)
ओह! पंगेबाज की पर्सनालिटी का यह पक्ष तो पता ही नहीं था!
बधाई पंगेबाज, आप तो कबीरदास जी की टक्कर की उलटबांसियां लिखते हैं. अगली बार तुकाराम जी के अभंग से टक्कर लेना! :)
दोहे नाविक के तीर जैसे घाव करनेवाले हैं
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