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बुधवार, 11 जुलाई, 2007

मुरली मनोहर श्रीवास्तव का व्यंग्य : गुरु शिष्य दोऊ खड़े काके लागू पाय

मूलतः इलाहाबाद के रहने वाले श्री मुरली मनोहर श्रीवास्तव पेशे से इंजीनियर हैं। व्यंग्य विधा पर उनकी अच्छी पकड़ है और नियमित तौर पर कई अख़बारों में लिखते रहते हैं। श्रीवास्तवजी का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। पेश है “मस्ती की बस्ती” के पाठकों के लिए उनका मज़ेदार व्यंग्य।

यह गद्य अंश उस शोध विद्यार्थी की थीसिस का हिस्सा है, जिसने अभी-अभी आधुनिक शिक्षा मे कबीर की प्रासंगिकता विषय पर डॉक्टरेट प्राप्त की है। वह लिखता है कि कबीर को आज मात्र गुरु और गोविन्द के सन्दर्भ तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। वस्तुत: आज गुरु और गोविन्द की तुलना का कोई अर्थ नहीं रहा, क्योंकि गोविन्द को लोग मात्र एक चमत्कार करने वाले के रूप मे देख उसका मज़ाक उड़ाने लगे हैं। बच्चे भी कहते हैं कि गणेश जी के लिये शीतल पेय ट्राई करें क्या? गर्मी बहुत पड़ रही है, मिल्क का मूड न हो क्या पता? या फिर यदि समुद्र का पानी मीठा हो सकता है, तो मेरे पूजा करने से मेरा होमवर्क भी पूरा हो जायेगा।

ऐसे में गुरु के महत्व की तुलना करने के लिये शिष्य की आवश्यकता है। जैसा की सर्वविदित है, गुरु गुड़ ही रहता है और चेला शक्कर हो जाता है। फिर भी कबीर दास की प्रासंगिकता इसी में है कि वे कहते हैं - भले ही चेला शक्कर हो जाये , गुरु का महत्व कम नहीं होता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिष्य की मांग आज के समाज में गुरु से अधिक है और शिष्य गुरु से महान भी है, परन्तु गुरु के बड़प्पन को नकारा नहीं जा सकता।

जिन्हें शिष्य के महान होने के विषय मे शंका हो, उनके लिये मैं आगे लिखता हूँ कि जिस गुरुकुल मे होनहार शिष्य जाते हैं, पैसे वाले शिष्य जिस गुरु से कोचिङ्ग लेते हैं, वह गुरु अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। कहने को तो शिक्षा का दान दिया जाता है, परन्तु आज के समाज मे दान का महत्व नहीं रह गया है। लोग दान को भिक्षा की तरह समझने लगे हैं। जिसका नतीजा है कि जिन स्कूलों और विद्यालयों में अनुदान के माध्यम से नाम मात्र को फ़ीस लेकर शिक्षा प्रदान की जाती है, वहाँ के विद्यार्थी नेता बनने के अतिरिक्त अपना कोई भविष्य नही देखते और ऐसे में जब कोई गुरु शिष्य के भविष्य से खिलवाड़ करता है, तो शिष्य यह ज़रूर बता देता है कि महान और महत्वपूर्ण वही है गुरु नहीं।

वैसे गुरु को आज के ज़माने में भी कम समझना कभी-कभी भारी पड़ सकता है। जैसा कि अनेक विश्वविद्यालयों में सामने आया है कि ऐसे गुरु शिष्य के सामने अपना महत्व बनाये रखने कि लिये घर-परिवार को तिलांजलि दे कर अपनी शिष्याओं से प्रेमालाप करते हैं और एक तीर से दो शिकार करते हैं। वैसे अनचाहे ही शिकार तो कई हो जाते हैं, जैसे कि गुरु का उद्देश्य मात्र यह दिखाना होता है - हे शिष्य, मैं किसी भी मामले मे तुमसे कम नहीं हूँ और जिस शिष्या के तुम सपने देखते हो वह मेरे प्रेम में पागल है। इसके दो शिकार यह हुये कि शिष्य गुरु को उस सीमित समय के लिये अपने से बड़ा स्वीकार कर लेता है और गुरु को इस प्रसंग से प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ने का आधार मिल जाता है।

तब उसकी किसी ज़माने मे लिखी और खुद के पैसे से छपवायी हुई पुस्तक की मांग बढ़ जाती है। साथ ही लोग उसे साहित्यकार भी स्वीकार करने लगते हैं। उसके लिखे शोध पत्र अनेक सेमीनारों मे पढ़े जाने लगते हैं और अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ाने के लिये इस बखेड़े को मीडिया नये रूप से पेश करता है जैसे - शिक्षक, शिष्या और पत्नी। तब दर्शक यह देखकर रोमांचित हो उठते हैं कि किस तरह एक भारतीय नारी अपने पति के अलौकिक प्रेम में रोड़ा बनते हुये अपनी सौत के बाल खींच-खींच कर पीट रही है।

इस घटना से बहुत से शिष्य इस कलियुग में महान होकर भी गुरु की शरण में आते हैं और कहते हैं - गुरुदेव, मैं आपके अनुभवों के सामने बच्चा हूँ। मेरे लिये अभी यह दो नावों की सवारी का अनुभव अपरिचित है। अरे! दो क्या हम तो एक नाव पर भी सवारी नहीं कर पाये और आपको देख कर लग रहा है कि हमारा विद्यार्थी जीवन नष्ट हो गया । मार-पीट में अव्वल न होने के कारण न तो हम नेता बन पाये और न ही नेता बनने की चाहत रखने के कारण रोमियो। ऐसे में यदि इस वर्ष हमें कॉलेज छोड़ना पड़ा तो इस स्वर्णिम काल की कौन-सी स्मृति मैं जीवन में सहेज कर रख पाऊंगा। सो हे गुरुदेव! मैं भले ही आज साधन-सम्पन्न हूँ और महत्वपूर्ण भी, किन्तु आपकी महानता के आगे हार मानता हूँ।

इस भक्ति पूर्ण वाक्य को सुन कर गुरु का हृदय पिघले बिना नहीं रह पाता और वह अपने शिष्य को ज्ञान का दान देने को तत्पर हो जाता है।

लेकिन भारत देश मे पुराना नियम है, जब तक समस्या में बाहरी हस्तक्षेप न हो मज़ा नहीं आता। तो यह समस्या (कौन सी सम्स्या?) यही गुरु शिष्य में से कौन महान है इस बात का निर्णय करने की। हाँ, तो यह समस्या अपने असली रूप में तब आती है जब गुरु-शिष्य महानता विवाद मे पुराने विद्यार्थी जो यहाँ से कोचिंग ले कर आज स्थापित नेता हो चुके हैं, कूद पड़ते हैं। वे बताते हैं कि हे गुरुदेव, आज यदि आप क्लास मे पढ़ा पा रहे हैं तो यह मेरी बदौलत, यदि इस विद्यालय से आपके परिवार का पालन-पोषण हो रहा है तो हमारे जैसे ही पूर्व विद्यार्थियों के अनुदान की बदौलत। सो आपसे अनुरोध है कि आप अपनी महानता के झूठे आवरण को चुपचाप ओढ़े रहिये और वे जो नये विद्यार्थी कॉलेज मे चुनाव नुमा खेल खेल रहे हैं, उन्हें खेलने दीजिये।

असली घपला यही होता है, वस्तुत: गुरु अपने आपको हर क्षेत्र मे महान समझता है और वह शिष्य के इस राजनीतिक चैलेंज को समझ नहीं पाता। वह रोमांस की तरह उस राजनीति में भी चुनौती देने का प्रयास करता है और मात खा जाता है।

आगे यह विद्यार्थी लिखता है कि अभी वह यह फ़ैसला नहीं कर पाया है कि गुरु और शिष्य साथ-साथ खड़े हों तो वह किसके पांव पहले छूये और यही इस शोध-ग्रन्थ की सफलता का राज़ भी है। क्योंकि उसे लग रहा है कि इस शोध के बाद वह महान साहित्यकार की श्रेणी मे आ जायेगा और पूरे राष्ट्र में इस विषय पर नयी बहस छिड़ जायेगी, जिसके केन्द्र में वही रहने वाला है। आप तो जानते ही हैं आजकल किसी भी क्षेत्र मे विवादित बने रहना कुछ पूरा कर दिखाने से ज़्यादा फ़ायदेमन्द है। सो जब तक यह गुरु-शिष्य विवाद चलेगा, मेरा अस्तित्व बना रहेगा। मैं इस शोध विद्यार्थी को एक सफल शोधकर्ता की उपाधि देना चाहता हूँ, आगे जैसा आप चाहें।

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1 टिप्पणियाँ:

Anonymous बेनामी ने कहा…

बहुत बढ़िया श्रीवास्तव जी,
अभी तक अखबार में पढ़ते थे, ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है-
दीपक कुमार

12 जुलाई, 2007 12:06 पूर्वाह्न  

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