आलोक पुराणिक का प्रपंचतंत्र : सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी
आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का एक और व्यंग्य - “सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी”।स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।
उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफ़ा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई क़ारोबारी दुकान अपने मुनाफ़े के लिए खोलता है, ना कि कस्टमर के मुनाफ़े के लिए।
सेल्ससत्य का मानना था कि आख़िर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फ़ेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ़ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी ज़िंदगी मुनाफ़े कमाये जा सकते हैं।
पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर
एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये। एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया और वह कस्टमर वापस चला गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउण्टर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सेल्ससत्य ने कहा – “हेलो, आप कैसे हैं? ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।”
कस्टमर ने कहा – “मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।”
सेल्ससत्य बोला – “ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक ऑप्शन बताऊँ?”
कस्टमर बोला - “क्या?”
सेल्ससत्य बोला - “देखिये, स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लॉञ्च किया है। इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ़्त में दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला - “पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।”
सेल्ससत्य ने कहा - “कोई बात नहीं। यहाँ पर फाँसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा। बाक़ी की फ़ॉर्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी।”
सो साहब, जो कस्टमर सिर्फ़ पेपर सोप ख़रीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला। उधर फाँसू बैंक के सेल्समैन ने भी क़रीब पाँच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।
स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला - “ग्रेट! ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप ख़रीदने वाले को वीसीडी प्लेयर भी चेंप दे।”
इस पर सत्यसेल्स ने कहा - “वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है। इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है। ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डाँटा - “अबे तू मेरा इंप्लाई है या उस कस्टमर का इंपलाई! जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ़ सेल्समैन बनाता हूँ।
शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ़ सेल्स ऑफ़ीसर सेल्ससत्य बोला - “हे मूरख! बेच, सिर्फ़ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी क़ीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य–ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौक़ा-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयाँ बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के पास आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच, कस्टमर की चिंता मत कर।
सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला - “अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।”
एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल
सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद उसके बेटे - फ़ेयरप्राइज़ को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी। पर फ़ेयरप्राइज़ भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था। एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फ़ेयरप्राइज़ की तरफ़ जाकर बोला - “उस वाले मोबाइल की क्या क़ीमत है?”
“दस हजार रुपये, टैक्स अलग – फ़ेयरप्राइज़ ने बताया।”
“उस वाली मोटरसाइकिल की क्या क़ीमत है” - कस्टमर ने पूछा।
“पचपन हज़ार टैक्स एक्स्ट्रा” - फ़ेयरप्राइज़ ने बताया। फ़ेयरप्राइज़ का कस्टमर वापस भाग गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया। उसे मोबाइल की क़ीमत बतायी गयी - एक रुपया और मोटरसाइकिल की क़ीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत-सा हुआ, तो सेल्ससत्य ने कहा - “पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा – ओके।”
कस्टमर ने लोन के पेपर पर मज़े-मज़े में बिना देखे साइन कर दिये। यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फाँसू बैंक के सेल्समैन ने बताया - “जी आपकी महीने की किश्त चार हज़ार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेज़ों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंज़ूर की है कि अगर आप लोन लेने से इन्कार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फ़ीस और डिफ़ॉल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।”
कस्टमर फंस चुका था, वो बोला - “पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।”
सेल्ससत्य इस पर बोला - “महाराज, मोबाइल की क़ीमत तो एक ही रुपया है। पर 9,999 रुपये उसकी एक्सेसरीज़ के हैं। हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज़ मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ़ दस रुपये की है। पर बाक़ी की रकम हम आफ़्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।”
एक लाख रुपये डिफ़ॉल्ट फ़ीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये। यह पूरा कांड देखकर फ़ेयरप्राइज़ समझ गया और सेल्ससत्य से बोला - “सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा।”
इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएँ मिलती हैं -
1. बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फ़ॉलो करना चाहिए। जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2. समझदार सेल्समैन हेलीकॉप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।
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लेबल: alok puranik, Hindi, satire, व्यंग्य, हिन्दी


1 टिप्पणियाँ:
सही है बॉस!!
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