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गुरुवार, 31 मई, 2007

आलोक पुराणिक का व्यंग्य : ई-शि और ताज सिंड्रोम

Satirist Alok Puranikआलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक का व्यंग्य दफ़्तरों के लिए इजाद किए गए ख़ास जुमलों पर।



दफ़्तर में काम करने वाले याद नहीं रहते, क़िस्से सुनाने वाले याद रहते हैं। दफ़्तर में जमकर मेहनत करने वाले याद नहीं रहते, जुमलेबाज़ी करने वाले याद रहते हैं। सो वक़्त का तकाज़ा है कि सही से, नये से जुमले पेश किये जायें। सो दफ़्तरार्थियों के लिए कतिपय नये टाइप के जुमले इस प्रकार हैं।

जुमला नंबर वन - ई-शि

ई-शि कर दिया ना।
अरे ई-शि नहीं किया तो बताओ कि कैसे एक्शन किया जा सकता है।

ई-शि समझे ना? नहीं समझे तो समझिये कि इस दौर में माडर्न होने के लिए हर बात के आगे ई लगाना लाज़मी है। जैसे ई-गर्वर्नैंस, ई-मेल,ई-चेकिंग, ई-चैट, ई-चमचागिरी, ई-गपशप।

समझे कि नहीं ई का जलवा। समझिये, यूँ समझिये जैसे आपने किसी सरकारी दफ़्तर में किसी काम के लिए अप्लाई किया, उस पर बाबू ने लिखा - नौट यानी एनओटी एक्सेप्टेड यानी नामंज़ूर। इसके बाद आप एनओटी में एक ई और लगा दीजिये यानी नोट करेंसी वाला नोट। आपकी एप्लीकेशन फ़ौरन मंज़ूर हो जायेगी।

यानी ई को पहले लगाइए या बाद में, झक्कास रिजल्ट देता है। सो साहब ई-शि किया या नहीं? यानी ई-शिकायत की या नहीं। किसी को कोई भी प्राबलम हो, वह कोई शिकायत दर्ज कराना चाहता हो, उसे कहिए कि ई-शि कीजिये यानी ई-मेल के ज़रिये शिकायत कीजिये। यह व्याख्यान दीजिये कि क्योंकि हर शिकायत वाया ई-मेल करना बहुत ज़रुरी है। ई-शि नहीं की, बिल गेट्स बुरा मान जायेंगे। बिल गेट्स बुरा मान गये, तो बहुत दिक़्क़त हो जायेगी। ख़ैर साहब-ई-शि के फायदे इस प्रकार हैं-

1- ई-शि से आधी शिकायतें खुद-ब-खुद ख़त्म हो जाती हैं।
एक ज़माने में मैं जब एक दफ़्तर में काम किया करता था, तो जूनियर आते थे, पैन दे दीजिये, पेंसिल दे दीजिये, काग़ज़ दिलवाईये। स्टेशनरी दिलवाइए। मैंने नियम बनाया कि ई-शि कीजिये, ई-मेल के ज़रिये अपनी प्राबलम बताइए। आधे से ज़्यादा लोग ई-मेल की ज़हमत उठाने के बजाय अपनी जेब से ही पेन-पेंसिल लाने लगे।

बाकी बचे आधे ई-शि कर भी देते थे, तो मैं तीन दिन तक टहलाया करता था कि मुझे आपका ई-मेल मिला नहीं, शायद कंप्यूटर का सर्वर डाऊन है। सर्वर डाऊन है, यह बहाना एक हफ़्ते तक खींचा जा सकता है। बचे आधे में से आधे इस एक हफ़्ते में अपनी जेब से पैन-पेंसिल ख़रीद कर ले आते थे। इसके बाद भी जो बंदे पीछा नहीं छोड़ते थे, वो तो दफ़्तर के पैन-पेंसिल के हक़दार थे ही। ई-शि से दफ़्तर का बहुत ख़र्च बचने लगा।

2- ई-शि से दफ़्तर में पालिटिक्स बहुत कम हो जाती है। एक ज़माने में मैं जब एक दफ़्तर में काम किया करता था, तो शर्माजी वर्माजी के ख़िलाफ़ कुछ कहते थे और वर्माजी शर्माजी के ख़िलाफ़ कुछ कहते थे। मैंने नियम बना दिया कि ऑफ़ दि रिकॉर्ड पॉलिटिक्स नहीं होगी। जो भी होगा, ई-शि के ज़रिये होगा। वर्माजी ई-मेल के जरिये शर्माजी के बारे में बतायेंगे। ई-शि के ज़रिये लोगों ने पालिटिक्स करना छोड़ दिया। दफ्तर में बहुत शांति हो गयी।

3- ई-शि से एक बड़ा फ़ायदा यह होता है कि बास के लिए पालिटिक्स करना बहुत आसान हो जाता है। अब बास जिस कर्मचारी की छवि चमकाना चाहता है, उसके बारे में मीटिंग में सबके सामने कह सकता है कि देखिये इस कर्मचारी ने नयी तकनीक को कैसे आत्मसात किया है। हर बात यह नयी तकनीक के ज़रिये ही कहता है। ऐसी ही कर्मचारियों के बूते कंपनी का नव-निर्माण हो सकता है।

और ई-शि का इस्तेमाल उन कर्मचारियों के खिलाफ भी हो सकता है, जिनसे बास खुंदकायमान हो। जैसे सबके सामने मीटिंग में यह कहा जा सकता है कि देखिये, कैसे वेस्ट हो रही है नयी तकनीक। जिस तकनीक के ज़रिये गंभीर चिंतन होना चाहिए था। गंभीर बातें होनी चाहिए थीं, उसके ज़रिये हमारे कर्मचारी पैन, पेंसिल मांगते हैं। धिक्कार है हम सब पर। हाय बिल गेट्स हम पर हँसता होगा रे।

जुमला नंबर टू - ताज सिंड्रोम

जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि कसे हुए जुमले सबको याद रहते हैं। ताज सिंड्रोम एक नया जुमला है, जो इस ख़ाकसार ने कल ही ईजाद किया है। इसे दफ़्तर में आप अपने प्रतिद्वंदियों को उखाड़ने और अपने बंदों को जमाने के लिए कर सकते हैं। आजकल हर दफ़्तर में पालिटिक्स इतनी नीरस टाइप हो गयी है कि बास लोग उससे परेशान हो गये हैं। आप अपने प्रतिद्वंदी को उखाड़ने के लिए शुरुआत कुछ इस तरह से करें, तो बास निश्चय ही आपको सुनेंगे। मान लीजिये कि आपके प्रतिद्वंदी मिस्टर शर्मा हैं। आप बास से बात की शुरुआत कुछ इस तरह से करें-

बास मिस्टर शर्मा आजकल ताज सिंड्रोम से ग्रस्त हैं।
बास पक्के तौर पर पूछेंगे-ये ताज सिंड्रोम क्या होता है।

ताज सिंड्रोम का मतलब यही होता है कि जिन चीज़ों की ज़रुरत नहीं है, उन पर तो बहुत पैसा ख़र्च किया जाये। और जिनकी ज़रुरत है, उन पर ध्यान नहीं दिया जाये। अब देखिये शाहजहाँ ने जब ताजमहल बनवाया था, तब आगरा में अकाल पड़ा हुआ था। इसके बावजूद शाहजहाँ ने ताजमहल में मोटी रकम लगा दी। इसीलिए तो औरंगजेब नाराज़ हुआ था शाहजहाँ से। मिस्टर शर्मा ने दफ़्तर में हर महीने क्लर्कों को एक के बजाय दो पैन देना शुरु कर दिया है। बताइए ये ताज सिंड्रोम है कि नहीं।
बास आपके ताज सिंड्रोम में डूब कर रह जायेगा।

और अगर किसी को जमाना है, तो ताज सिंड्रोम का इस्तेमाल इस तरह से कीजिये। मान लीजिये आपको मिस्टर वर्मा को जमाना है। बास के पास जाकर कहिये देखिये मिस्टर वर्मा आजकल ताज सिंड्रोम के लपेटे में आ गये हैं। अच्छा है।
बास पूछेगा- ये क्या होता है।
अरे ताज सिंड्रोम नहीं जानते, कैलीफ़ोर्निया जर्नल आफ मैनेजमेंट में इस पर पूरा लेख है। इसमें बंदा बहुत मेहनत से, बहुत लगन से किसी चीज को संवारता है। निखारता है। समय की चिंता नहीं करता है। वर्माजी भी आजकर नये प्रोजेक्ट में ऐसी ही लगे हुए हैं, जैसे ताजमहल बना रहे हों।

समझे कि नहीं, ताज सिंड्रोम? तो लीजिये ई-शि और ताज सिंड्रोम से हमें निम्नलिखित शिक्षाएँ मिलती हैं -
1- काम करने वाले नहीं, धाँसू जुमले देने वाले याद किये जाते हैं।
2- ई-शि से शिकायतें कम हो जाती हैं, दफ़्तर का ख़र्च कम हो जाता है।
3- ताज सिंड्रोम से आप किसी को भी जमा सकते हैं, किसी को भी उखाड़ सकते हैं।

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गुरुवार, 24 मई, 2007

प्रिय रंजन झा का व्यंग्य : क्रिया की कैसी-कैसी प्रतिक्रिया

बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है - लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के विशेष आग्रह पर लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन कर रहे हैं भौतिकी के नियम की नई व्याख्या।

हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है, यह गति का तीसरा नियम है। कहने को तो यह फीजिक्सकी थ्योरी है, लेकिन जिंदगी के हर क्षेत्र में लोग इस थ्योरी को घुसा डालते हैं। या फिर यहकहिए कि इस थ्योरी पर चलना पसंद करते हैं। इसके एकनहीं, तमाम उदाहरण आपको आए दिन देखने को मिल जाएंगे।

गुजरातमें जब खूब दंगे हुए, तो हिंदू हृदय सम्राटों ने कहा कि वे कुछ नहीं करसकते, क्योंकि यहतो क्रिया के विपरीतहुई प्रतिक्रिया है - जो कुछ हुआ, वह गोधरा कांड का रिएक्शन था। ऐसे ही'तुष्टीकरण' के पुरोधा अक्सर यह कहते हैं कि हिंदू मुसलमानों को बहुत डरा रहे हैं, इसलिए मुसलमान कट्टर हो रहे हैं। खैर, ऐसे और भी कई उदाहरण हैं, जिसमें गति के इस नियम को लागू होते देखने में लोग गर्व का अनुभव करते हैं। अजीब तो यह है कि 'क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया' का तर्क अक्सर लोग अपने गलत कामों को सही साबित करने के लिए देते हैं। मेरे एक गुरुजी थे, वे गति के इस नियम को कुछ ज्यादा ही मानते थे। उनका मानना था कि जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ेगी, लोग वैसे-वैसे पीछे हटेंगे। लोग एक तरफ तो इस बात पर गर्व करेंगे कि हम ग्लोबल विलेज में रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे घनघोर क्षेत्रीयतावादी मानसिकता के स्वामी भी होंगे। उनकी बात आज सौ फीसदी सच लगती है। आज फ्रांस से लेकर मुंबई तक यही हाल है। राष्ट्रपति सर्कोजी फ्रांस में विदेशियोंको देखना नहीं चाहते, तो बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक गैरमराठियोंको महाराष्ट्र में नहीं देखना चाहते। अब ठाकरे लोगों को यह कौन बताए कि उनकी ऐसी सोच (क्रिया) की प्रतिक्रियामें अगर दूसरी जगहों पर रह रहे मराठियों को खदेड़ दिया जाए, तो उनका क्याहोगा?

हमारे गुरुजी इस थ्योरी कोसमझाने के लिए वे एक जुमले का इस्तेमाल करते थे - 'जौं जौं मुर्गी मोटानी, तौं तौं दुम सिकुड़ानी।' कहने का मतलब यह कि जब मुर्गियां छोटी होती हैं, तो उनकी दुम (अगर होती है, तो) मोटी होती है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी व मोटी होती जाती हैं, उनकी दुम सिकुड़ती चली जाती है। आजकल के बच्चों को ही लीजिए, समय के साथ मुर्गियों जैसे ही उनकी दुम भी सिकुड़ रही है। नए जमाने के बच्चे अभिमन्यु की तरह गर्भ से हीबहुत कुछ सीखकर आते हैं। आज के तीन-चार साल के बच्चों में जितनी अक्ल होती है, आज से बीस-तीस पहले अगर इस उम्र में इतनी अक्ल होती, तो पता नहीं अपना देश कहां चला गया होता!

खैर, तो हम बात कर रहे थे, दुम सिकुड़ने की। हाल में मेरे एक दोस्त के साथ दिलचस्प वाकिया हुआ। रिक्शा से बाजार जाते हुए कॉन्वेन्टमें पढ़ रहे उसके पांचवर्षीय बेटे ने खुश होते हुए कहा - पापा, वो देखो बकरियां जा रही हैं। इससे पहले कि मेरा दोस्त बकरियों की ओर देखता, रिक्शा वाला हैरान होकर रिक्शा रोककर खड़ा हो चुका था। दरअसल, वह इस बात को लेकर हैरान था कि कंप्यूटर से लेकर हवाई जहाज तक की बात कर रहा यह बच्चा गदहे को भी नहीं पहचानता और उसे बकरी बता रहा है! रिक्शा वाला भले ही हैरान हो, लेकिन मेरी समझ से यह मॉडर्न होने जैसी क्रिया की प्रतिक्रिया है। इसे आप कतई बच्चों की नासमझी न कहें, क्योंकि अगर वह नासमझ होता, तो विंडोज विस्टाऔर कॉन्कर्ड विमानों की बातें कैसे करता?

वैसे, सच यह भी हैकि अगर आपको मॉडर्न दिखना है, तो गदहे को पहचानने से इनकार करना ही होगा, क्योंकि वह बीते जमाने का जानवर है। और बीते जमाने की चीजों का आज क्या काम! यह मॉडर्न होने की प्रतिक्रिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि गदहे को नहीं पहचानने पर भी न तो आपका जीके कमजोर माना जाएगा और न ही इससे आपके पेट पर लात पड़ेगी। बच्चों के लिए यह जमाना राम-कृष्ण और गांधी-सुभाषसे ज्यादा अमिताभ-सलमानऔर बैटमैन-स्पाइडरमैन को जानने का है, क्योंकि इसी तरह के ज्ञान की अब जरूरत पड़ती है - स्कूल-कॉलेज कैंटीन से लेकर टीवी के रियलिटीशो तक में। तो यह है नई पीढ़ी का ज्ञान - इसे आप क्रिया की प्रतिक्रिया कह सकते हैं या फिर बढ़ती मुर्गी की सिकुड़ती दुम भी, लेकिन क्या आप यह बता सकते हैं कि इतनी रामकहानी किस क्रिया की प्रतिक्रिया में लिखी गई है?

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सोमवार, 21 मई, 2007

अरुण अरोड़ा के व्यंग्य दोहे

फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा एक बार फिर हाज़िर हैं "मस्ती की बस्ती" में। इस बार वे सुना रहे हैं आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कबीर और रहीम के दोहे। आप भी इन दोहों का मज़ा लीजिए:

१. "निन्दक नियैरे राखिये,खाय़ पियै सो जाये
ना काहू सै बोल सकै ,ना कोई पंगा पाय"

२. "नेता ऐसो चाहिये, जैसो सूप सुभाय
चंदो सारो गहि धरै, देय रसीद उडाय"

३. "रहिमन निज करमन की गाथा, मन ही राखो गोय
ना सेकेटरी को शामिल करो, ना शिबु सौरेन सी दुर्गति होय"

४. "रहिमन या राजनीति मे, कभी न खुन्दक दिखायै
ना जाने कब कौन से, दल मे शामिल होनो पड जाये"

५. "कबिरा तेरी झोपडी, गर है थाने के पास
करै कोई तू भरैगा, रख ले ये विश्वास"

६. "जब तक कुर्सी संग है, ले शराब मे रंग
पाच बरस के बाद मे, नसीब न होगी भंग"

७. "रहिमन या लीडरन ते, तजो बैर औ प्रीत
काटे चाटे स्वान के, दुहु भाती विपरीत"

८. "या लीडरन के चरित की, गति समझै नही कोई
ज्यो ज्यो डूबे श्याम रंग, त्यो त्यो उज्जल होई"

९. "कबिरा खडा पार्लियामेंट् मे, देवे सब को धौल
जो बोला सो पिटैगा, दुंगा खोपडी खोल"

१०. "रहिमन या संसार मे, मिलियो सब से धाय
न जाने कौन कब, प्रधान मंत्री बन जाये "

११. "रहिमन चमचा राखिये, काम आये वक्त पर
चमचा बिना न उबरे, नेता अभिनेता अफ़सर"

घोटालो एसो करो, काहु हवा न लगने पाय
ना बाटन को मामला, न चैनल खबर बनाय

बाणी एसी बोलिये, वोट-बैंक को हिसाब लगाये
जनता चाहे जलि मरै, चाहे कोर्ट मे चक्कर खाये

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे अमिताभ उसूल
विज्ञापन ते नोट बनाय, बाकी जाये भूल

भला जो देखण मै चला, भला न मिलया कोए
मुझते और मेरे लाल ते जग मे भलो न कोए

"काल लूटॆ सो आज लूट, आज मारे सो अब
जब वोटिंग हो जायेगी, बहूरी करोगे कब."

चाकी चलती देखकर, दिया कबीरा रोये
पीस के सारा खा गई, दियो न रत्ती कोये
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
जब कुरसी छिन जायेगी , कहा करोगे तब."

कछु न छ्डयो रे नेता कछु न छोटो होये
भुसे के घोटलो मै अरबॊ के नॊट होये

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सोमवार, 14 मई, 2007

रवीन्द्र त्रिपाठी का व्यंग्य : बुद्धिजीवी जी और टेलीविज़न

पेशे से पत्रकार रविन्द्र त्रिपाठी कई साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। स्टार न्यूज़ के कार्यक्रम पोल खोल के इंचार्ज हैं। हाल ही में टीवी पत्रकारों की लिखी कहानियों के हंस के विशेषांक के सम्पादक भी थे।

बुद्धिजीवी जी बुद्धिजीवी हैं। बुद्धिजीवी होना उनकी पहचान है। अदा है। खासियत है। वे अपने को बुद्धिजीवी कहलाना पसंद करते हैं। इसलिए वे अपने को बुद्धिजीवी दिखाते भी हैं। इसके लिए वे कई तरह के स्टाईल मारते हैं। जैसे, जहां लोग अमूमन शर्ट पैंट पहनकर जाते हैं, वहां वे कुर्ता पायजामा पहनकर जाते हैं-भले ही मौसम सर्दी का हो। औऱ जहां कुर्ता पायजामा वाले ज्यादा हों, वहां वे सूट पहनकर जाते हैं, चाहे मौसम गर्मी का हो।

बुद्धिजीवी जी हर बात बौद्धिक ढंग से कहते हैं। आप सोच रहे होंगे कि ये बौद्धिक ढंग क्या होता है ? तो आपको राज़ की बात बता दें कि बुद्धिजीवी जी के लिए बौद्धिक ढँग का मतलब है फिक्रमंद लगना। इसलिए वे हमेशा फिक्रमंद लगते हैं। बोलते समय भी वे फिक्रमंद लगते हैं और हंसते समय भी। कई बार तो वो हंसते हंसते बीच में इतने फिक्रमंद हो जाते हैं कि अचानक चुप हो जाते हैं। और अगर वे आपको कहीं प्रसन्न मुद्रा में मिलें तो समझ लीजिए कि उस दिन वे बौद्धिक मूड में नहीं हैं।

एक दिन बुद्धिजीवी जी सड़क पर मिले। उस दिन वे कुर्ता पायजमा में थे। मुझे देखते ही बोले कि "ये क्या हो रहा है? आखिर यह कब तक होता रहेगा? पानी सिर से ऊपर होता जा रहा है।"
मैंने पूछा- कहां हो रहा ये? पहले ये तो बताइए।

वे बोले- "मेरा मतलब है टेलीविजन में क्या हो रहा है। चैनलों में क्या हो रहा है। इतनी अश्लीलता, इतनी फूहड़ता। राम-राम। देश का बेड़ा गर्क हो रहा है। नौजवान पीढ़ी बर्बाद हो रही है। सिर्फ अश्लीलता ही अश्लीलता है टीवी में। कोई नैतिकता नहीं बची है। लोगों को भटका रहा है टेलीविजन। सोचने समझने की ताकत खत्म कर रहा है। और सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि इन चैनलों की वजह से बौद्धिकता खतरे में है। क्या समझे?"

मैंने पूछा- "अगर टेलीविजन इतना खराब है तो आप उसे देखते क्यों हैं? हटा दीजिए टीवी सैट अपने घर से। फिर अश्लीलता और अऩैतिकता आपके घर की देहरी के भीतर घुस नहीं पाएगी।"

वे बोले-" देखता कौन है। मैं टेलीविजन कभी नहीं देखता। मेरे पास वक़्त कहां है टीवी देखने का। घर में टेलीविजन जरुर है लेकिन वो सिर्फ बीवी और बच्चों के लिए। मुझे तो सेमीनारों और गोष्ठियों से ही फुर्सत नहीं मिलती। मैं तो वो कह रहा हूं,जो लोग कहते हैं औऱ अखबारों में छपता है। क्या समझे?"

मैंने कहा-"हो सकता है कि अखबार के लोग गलत कह रहे हों।"
वे बड़े तीखे लहजे में बोले- "आपकी बात कैसे मान लूं। देखिए, सेमीनारों में जो भी भाषण देता हूं,उसकी रिपोर्टिंग अखबारों में छपती है। लेकिन,आज तक किसी भी टीवी चैनल ने मेरा भाषण नहीं दिखाया। साफ है कि टेलीविजन चैनलों में बौद्धिकता नहीं बची। टेलीविजन बुद्धिजीवियों की कद्र नहीं करता। सोच विचार की कद्र नहीं करता। और जिस समाज में बुद्धिजीवियों की कद्र नहीं है,वो समाज चेतना शून्य होता है। क्या समझे?"

बुद्धिजीवी जी का चेहरा तमतमा रहा था। वो आगे बोले-" अखबार वाले बुद्धिजीवियों की कद्र करते हैं। वे तो ये भी छाप देते हैं कि अमुक अमुक गोष्ठी में फलां फलां बुद्दिजीवी मौजूद था। क्या समझे?"

ये सब कहते हुए उनका गुस्सा बढ़ता जा रहा था। आवाज़ तेज़ होती जा रही थी। पर मैंने बिना उसकी परवाह किए हुए कहा-" लेकिन इसमें नयी बात क्या है। विदेशों मे तो पहले ही कई बुद्धिजीवी कह चुके हैं कि टेलीविजन विचार का नहीं मनोरंजन का माध्यम है। बौद्रिला ने तो कहा है कि.."

उनके नथुने फूलने लगे थे। अपनी आवाज़ को और ऊँची करते हुए वे लगभग चीखे-"यही तो आप लोगों की मुश्किल है। हर बात पर विदेश की तरफ देखते हैं। अपने देश में बुद्धिजीवी नहीं है क्या? कहां कहां से नाम ले आते हैं। बौद्रिला, फौद्रिला,लाकां,फांका...। अरे,स्वदेशी बुद्धिजीवियों की बात कीजिए। क्या समझे?"

वे इतनी बार क्या समझे पूछ चुके थे कि मुझे अपनी समझदारी पर शक होने लगा। मुझे ये भी लगने लगा कि उऩका पारा जरुरत से ज्यादा गरम हो रहा है और उऩके सामने रहना खतरनाक हो सकता है। इसलिए मैंने विदा के लिए नमस्कार किया। वे बिना जवाब दिए मुड़े और चले गए।

कुछ दिनों के बाद बुद्धिजीवी जी फिर दिखे। उस दिन वे कुर्ता पायजामा में नहीं बल्कि सूट-बूट में थे।साफ था कि व बौद्धिक मूड में नहीं हैं। लेकिन, मुझे ये भी लगा कि उस दिन की बातचीत के बाद जरुर अब तक नाराज़ होंगे, इसलिए उनकी तरफ न देखने का नाटक किया। लेकिन,उन्होंने मुझे देख लिया था। शायद वे खफा भी नहीं थे,इसलिए आवाज़ लगाकर मुझे बुलाया। मैंने नमस्कार किया। देखा उनका चेहरा दमक रहा था। वे फिक्रमंद नहीं बल्कि प्रसन्न नज़र आ रहे थे। बोले- "आज रात नौ बजे क्या कर रहे हो?"

मैंने सोचा किसी दावत का निमंत्रण देने वाले हैं। इसलिए कहा-"कुछ खास नहीं।" वे उत्साह में बोले- "तो जल्दी घर जाइए और रात नौ बजे एवन चैनल देखिए। एक टॉक शो मे आ रहा हूं। और हां, देखने के बाद एसएमएस जरुर कीजिएगा और बताइएगा कि कैसा लगा।"

मैं कुछ जवाब देता कि वे जा चुके थे।

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रविवार, 13 मई, 2007

अरुण अरोड़ा की व्यंग्य कविता : मुलायम की चिट्ठी माया के नाम

फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर चुटकी ली है। आप भी इसका मज़ा लीजिए मुलायम की इस चिट्ठी का, जो लिखी गयी है माया के नाम।

पीर मेरी प्यार बन जा
है भगे मेरे गधे कुछ
है भगे तेरे गधे कुछ
आजा मिलकर जीते चुनाव
साइकल रखले हाथी पर, तू गले का हार बनजा
पीर मेरी प्यार बनजा
सवर्णो को भी माफ़ किया जब
मै भी हूँ इतना बुरा कब
मै बनूंगा मुख्यमंत्री, तू मेरी सरकार बनजा
पीर मेरी प्यार बन जा
अमर सिंह से बात कर ले
शर्ते सारी साफ़ कर ले
अम्बानी की गारन्टी दूंगा
तू गरल से छार बन जा, पीर मेरी प्यार बन जा
देश की चिन्ता तुझे कब
देश की चिन्ता मुझे कब
लूटन में उत्तर प्रदेश को, तू मेरी मददगार बन जा
पीर मेरी प्यार बन जा
मै अमर का हूँ मुलायम
तू भी है काशी की माया
आधा ले लेना मुझसे
पिछले सालों जो कमाया
मिल बाट कर खालेंगे अब, तू मेरी हमराह बन जा
पीर मेरी प्यार बनजा
अम्बानी को बांट लेंगे
अमिताभ को साथ लेंगे
गुण्डे तेरे साथ भी हैं
गुण्डे मेरे पास भी हैं
जुर्म घटाने मे युपी के, तू भी जुम्मेदार बन जा
पीर मेरी प्यार बन जा

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मंगलवार, 8 मई, 2007

राजेंद्र त्यागी का व्यंग्य : बुद्धिजीवी बनाम बुद्धूजीवी

राजेन्द्र त्यागी पेशे से क़लम के सिपाही हैं। नुक्ताचीनी में माहिर हैं, सो व्यंग्य लिखने की मौलिक प्रतिभा उनमें होनी ही थी। नए प्रतीकों और रुपकों के ज़रिए अपनी बात कहने का उनका अलग अंदाज़ है। त्यागी जी के तीन व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं।

हमारे एक मित्र हैं, निर्मल चंद उदास। उदास उनका तख़ल्लुस है, स्वभाव से निर्मल हैं। निर्मल और उदास दोनों ही धाराएँ उनके व्यक्तित्व में ऐसे समाहित हैं जैसे इलाहाबाद में गंगा-यमुना का संगम। लेखन में रुचि रखते हैं। कई ग्रंथ लिख चुके हैं मगर अभी तक वे अपनी गिनती न तो साहित्यकारों में करा पाए हैं और न ही बुद्धिजीवियों में। उनका सारा लिखा-पढ़ा काग़ज़ काले करना ही साबित हुआ। हाँ, जिस प्रकाशक के यहाँ वे प्रूफ रीडरी कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं, उसकी गिनती अवश्य बुद्धिजीवियों में होती है। प्रकाशक महोदय साहित्य के क्षेत्र में भी दो-एक पुरस्कार हथियाने में सफल हो गए हैं। शायद उदास साहब की उदासी का यही प्रमुख कारण है।

एक अन्य मित्र हैं, हँसमुख लाल जी। इस मिथ्या जगत में उनका पदार्पण रोते हुए नहीं मुस्कुराते हुए ही हुआ था। यही वजह है कि उनका मूल नाम ही हँसमुख रख दिया गया। आज वह प्रौढ़ावस्था को प्राप्त हैं, लेकिन हँसमुख स्वभाव आज भी बरक़रार है। जानने वालों का कहना है कि वह अपने ऊपर कम दूसरों के ऊपर ज़्यादा हँसते हैं। कभी-कभी यह स्थिति परचित्तानुरंजन तक पहुँच जाती है। इसे हम भाग्य का खेल मानते हैं, कुछ लोग दूसरों पर हँसने के ही लिए पैदा होते हैं और कुछ हँसी का पात्र बनने के लिए।

हँसमुख लाल जी साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर हाथ साफ़ कर चुके हैं। विभिन्न विधाओं में अपने नाम से दो-एक ग्रंथों की भी रचना करा चुके हैं। फलस्वरूप साहित्य के लगभग सभी अलंकरण उनके ड्राइंग रूम को शोभायमान कर रहे हैं। उन्हें बुद्धिजीवियों की भी प्रथम पंक्ति में स्थान प्राप्त है। अत: राष्ट्र नेता के नाम का सदुपयोग करते हुए उन्हीं के नाम से काग़ज़ों पर एक विश्वविद्यालय भी बाक़ायदा चला रहे हैं। फ़िलहाल उनके क़दम संसद की तरफ़ रुख़ किए हैं। देर-सबेर सांसद भी बन ही जाएंगे।

एक लंबे अर्से से हम इसी उधेड़-बुन में थे कि आख़िर बुद्धिजीवी होने का फ़ण्डा क्या है? बैठे-ठाले एक दिन इस गुत्थी को सुलझाया हमारे पौत्र ने। खेल-खेल में उसने हमारी तरफ़ निशाना साधा और एक सवाल दाग दिया, 'डैडी, अकबर बुद्धिजीवी था या बीरबल?'

सवाल सुन हमने सोचा आज फिर उसे कोई बौद्धिक ख़ुराफ़ात सूझी है। शारीरिक ख़ुराफ़ात के साथ-साथ वह ऐसी ख़ुराफ़ात अक्सर कर बैठता है। मगर जब उसे ख़ुराफ़ाती दौरा उठता है तो हमारी तरह ज़मीन पर लक़ीरें नहीं, मशीन के आविष्कर्ता लियॉनार्ददा विंचीकी तरह काग़ज़ पर यांत्रिक आकृति बनाता है। वह हमारी तरह रेत के घर बना कर भी नहीं तर्क-वितर्क के ताने-बाने में घर के अन्य सदस्यों को फँसा कर अपना मन बहलाता है। यह उसके बुद्धिजीवी होने का प्रमाण है।

ख़ैर, उसका सवाल हमने सहज भाव से लिया और सहज भाव से ही उसका जवाब दिया, 'बेटे, दोनों ही बुद्धिजीवी थे, बीरबल भी और अकबर भी।'
पौत्र के चेहरे पर बुद्धिजीवियों के समान गंभीर मुस्कराहट के भाव उतर आए और अक्षरों को शब्दों की लंबाई तक खींचते हुए वह बोला, 'डैऽऽऽडी, दोनों कैसे हो सकते हैं? एक साथ दो बुद्धिजीवी, वह भी प्रेम भाव के साथ, असंभव!'

पौत्र के तेवर देख हम समझ गए कि आज सहज भाव के आधार पर सहज ही पीछा छूटने वाला नहीं है, जवाब देना ही होगा। अत: हमने हनुमान चालीसा की तरह अकबर-बीरबल के क़िस्सों का मनन किया और बुद्धि पर जैक लगाते हुए जवाब दिया, 'बीरबल!'

हमारा जवाब सुन वह खिल-खिलाकर हँस दिया और इस बार शब्दों को अक्षरों के आकार तक सीमित करते हुए बोला, 'बुद्धू! अच्छा डैड, बताओ शेर ताक़तवर होता है या रिंग मास्टर?'

रिंग मास्टर-शेर, अकबर-बीरबल! उसकी पहेली अब हमारी बुद्धि के चोर दरवाज़े से बाहर झांकने लगी थी। फिर भी बुद्धि के सभी खिड़की-दरवाज़े बंद किए और दोनों जीवों की ताक़त का अनुमान लगाते हुए नतीजे पर पहुँचे की ताक़तवर तो शेर ही होता है, आदमी की क्या बिसात? इसी अनुमान के आधार पर हमने शेर के सीने पर ताक़तवर होने का तमगा जड़ अपना जवाब उसकी तरफ धकेल-सा दिया।

हमारे इस बौद्धिक जवाब से ख़ुश हो कर उसने 'नासमझ' होने का गोल्ड मेडल हमारे सीने पर चस्पा कर दिया और अभिनेता नाना पाटेकर के लहज़े में टेढ़ी उंगली से अपनी बुद्धि खटखटाते हुए बोला, 'डैड, ताक़त यहाँ होती है, बाँहों में नहीं। शेर यदि ताक़तवर होता तो उसके इशारे पर रिंग मास्टर डांस करता, रिंग मास्टर के इशारे पर शेर नहीं। कुछ समझे, डैड!'
अब हम सहज भाव के साथ पूरी तरह फँस चुके थे। अत: आत्मसमर्पण भाव से बोले, 'समझ गए, पुत्र!'

'समझे! तो बताओ, अकबर व बीरबल में कौन बुद्धिजीवी था।' उसने सवाल फिर दोहराया।
इस स्तर तक आते-आते हम समझ गए थे कि पौत्र की निगाह में बुद्धिजीवी कौन है। मगर डैडी होने के अहम् भाव के कारण हम अकबर को बुद्धिजीवी कहने में अपनी हिमाकत समझ रहे थे। हम यह भी जानते थे कि पौत्र का जवाब हमारे अहम् को घायल कर देगा, मगर महसूस यह भी कर रहे थे कि पौत्र के अनुकूल सही जवाब अपने मुख से देने पर तो हमारा अहम् मृत्यु को ही प्राप्त हो जाएगा। अत: सुगढ़ व्यापारी की तरह नफ़े-नुक़सान का आकलन करते हुए हमने विनीत भाव से कहा, 'तुम्हीं बताओ पुत्र।'

विजय भाव से उसने जवाब दिया, 'डैडी, बुद्धिजीवी तो अकबर ही था, बीरबल नहीं।'
पराजित घायल राजा के समान कराहते हुए हम बोले, 'वह कैसे?'
शांत व शालीन भाव से वह बोला, 'बीरबल यदि बुद्धिजीवी होता तो वही महान कहलाता, अकबर नहीं। हिंदुस्तान का बादशाह बीरबल होता, अकबर नहीं। यह ठीक है कि बुद्धि बीरबल के पास भी थी, मगर नवरत्नों की बुद्धि का दोहन करने वाली बुद्धि किसके पास थी? अकबर के ना!
तो बुद्धि का कौन खा रहा था, अकबर ना! फिर बुद्धिजीवी कौन हुआ डैडी, अकबर या बीरबल, अकबर ना!'

बौद्धिक रूप से अब हम पूरी तरह मात खा चुके थे। डेढ़ बालीस्तके पैदनेसे छोरे ने हमारी बुद्धि का दिवाला निकाल हमारी हथेली पर जो रख दिया था। मात खाने के बाद हमने उससे पूछा 'फिर बीरबल किस श्रेणी का जीव था।'
वह शरम-लिहाज़ त्याग बोला, 'बुद्धूजीवी'।

अब हम पूरी तरह शिष्यत्व अवस्था को प्राप्त हो चुके थे और उसी अवस्था की व्यवस्था का पालन करते हुए हमने पूछा, 'बेटे! मंत्री बुद्धिजीवी होता है या आईएएस अफ़सर?'

उसका जवाब था, 'डैडी, बुद्धिजीवी होने के लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं है।' उसने हमारे सवाल की गहराई नाप ली थी। हमारा अगला सवाल था, 'देश में बुद्धिजीवी शिरोमणि किसे मानते हो?'

वह बोला, 'पहले नंबर पर ठग सम्राट दादा नटवर लाल। ज़िन्दगी भर बुद्धि का चमत्कार दिखाता रहा और अपनी जीविका चलाता रहा। वह यदि इस देश का विदेश मंत्री भी होता तो मियाँ मुशर्रफ़ के हस्ताक्षर से पाकिस्तान की बिल्टी भारत के नाम कटा देता और अखंड भारत का सपना साकार हो जाता। डैडी! दूसरे नंबर का बुद्धिजीवी था, चचा हर्षद मेहता। वह भी पूरी उम्र बुद्धि का ही खाता रहा। वह यदि वित्तमंत्री होता तो विश्व बैंक भारत में गिरवी रखा होता।'

अब हमारे पास न कहने के लिए कुछ बचा था और न पूछने के लिए। इलेक्ट्रानिक पीढ़ी के सामने चर्खा पीढ़ी पूरी तरह नतमस्तक थी।

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रविवार, 6 मई, 2007

आलोक पुराणिक का व्यंग्य : मैं मूल्यवान लेखक हूँ

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक का ज़बरदस्त आत्मसाक्षात्कार, जिसमें वे बता रहे हैं अपने मूल्यवान लेखक होने की वजह।



ब्रह्मांड के सबसे धांसू रचनाकार आलोक पुराणिक (आलोकजी ब्रह्मांड के सबसे धांसू रचनाकार कैसे हैं, यह जानने के लिए प्रतीक्षा करें आलोकजी की आगामी पुस्तक की - स्मार्ट झूठ कैसे बोलें। इसमें आलोकजी ने विस्तार से समझाया है कि उन्हे ब्रह्मांड का सबसे धांसू रचनाकार कैसे माना गया है)

आलोक पुराणिक ने काफी कुछ लेखन बर्नार्ड शा, आस्कर वाइल्ड के नाम से भी किया है। दरअसल पूर्वजन्म में आलोक पुराणिक यही थे। जिन्हे इस बयान पर आपत्ति हो, वे सबूत पेश करें कि आलोकजी ये नहीं थे।

आलोक पुराणिक पिछले क़रीब बीस सालों से पत्रकारिता की और दस सालों से व्यंग्य लिख कर हिंदी व्यंग्य की सेवा कर रहे थे। इससे पहले अपनी उम्र के क़रीब तीस साल आलोकजी ने व्यंग्य न लिखकर भी हिंदी व्यंग्य सेवा की है, ऐसा कई जानकार लोग बताते हैं। बल्कि कई तो यह भी मानते हैं कि न लिखकर जो सेवा उन्होनें की थी, वह ज़्यादा सार्थक थी।

आलोक पुराणिक का यह आत्मसाक्षात्कार है।

सवाल- आप व्यंग्यकार कैसे बने?
जवाब- देखिये, सबसे पहले मैंने कविता के इलाक़े में ज़ोर आज़माया। हिंदी के एक वरिष्ठ कवि एक जगह कविता पढ़ रहे थे -

चिड़िया से उठता है धुआँ
धुएँ की एक लकीर से निकलती हो तुम
तुम हम, हम तुम,
तुम ही तुम तुम ही तुम

बाद में एक आलोचक ने बताया कि यह तो विकट कालजयी कविता है। इसमें समकालीन मसलों से लेकर प्रेम के आयाम मौजूद हैं। धुएँ की एक लकीर से निकलती हो तुम, यानी कवि अपनी प्रेमिका को संबोधित कर रहा है - हे प्रिये तुम धुएँ की लकीर से निकलती हो। यानी भारी प्रदूषण हैं, कवि इस तरह से समकालीन संदर्भों से जुड़ रहा है। स्त्री विमर्श भी है इसमें, धुआँ विमर्श भी है। कविता की आख़िरी पंक्ति है - तुम ही तुम यानी कवि उसके इश्क़ में डूबने की बात कर रहा है, जो शरीरी प्रेम से परे है। यह प्रेम की आख़िरी पराकाष्ठा है।

आलोचक की इस व्याख्या से मुझे लगा कि मेरे अंदर भी भारी कवि बनने के लक्षण हैं। और मैं कवि बन गया, बहूत हिट कविताएँ लिखीं (हिट उन आलोचक की नज़र में, यह तब की बात है जब मैं आलोचकजी को अपने वाहन पर उनके इच्छित स्थानों पर ले जाया करता था, उनके विरोधियों के ख़िलाफ़ प्रचार किया करता था आदि आदि)। बाद में मेरी व्यस्तता अन्यत्र बढ़ने लगी, और मैं कविता को ज़्यादा और आलोचक महोदय को कम समय देने लगा, तो मैंने पाया कि आलोचक महोदय ने यह कहना शुरु कर दिया कि अब तुम्हारी कविता में वह बात नहीं रही।

सो साहब कविता छूट गयी। फिर मैं शायरी की तरफ मुड़ा। शायरी में उस्ताद बनाने पड़ते हैं। मेरे उस्ताद ने कहा - बेटे पहले कुछ पढ़-लिख कर आओ। इससे आशय मैंने यह लगाया कि औरों की पढ़ो और फिर लिखो। साहब दो ही दिनों बाद मैं पहुँच गया कुछ नये शेर लेकर -

जिनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
देखिये पाते हैं उश्शाक बुतों से क्या फ़ैज़, एक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

उस्ताद कुछ चौंक कर बोले - ये शेर तो लगता है कि चोरी का है।
मैंने कहा - हो सकता है कि ग़ालिब ने मेरा चुरा लिया हो। मैं भी ठीक यही बात कहना चाहता था, उन्होने पहले ही मेरी बात चुराकर कह दी।

उस्ताद बिगड़े और बोले - क्या मतलब? ग़ालिब तुमसे बहुत पहले पैदा हुए हैं, वो चोरी कैसे कर सकते हैं?
मैंने समझाया कि ये क्या बात हुई कि जो मुझसे पहले पैदा हुए हैं, वो चोरी नहीं कर सकते। एक से एक नायाब चोर मुझसे पहले पैदा हुए हैं। नटवरलाल मुझसे पहले पैदा हुए हैं।

उस्ताद बोले - तुम बात बिलकुल लौजिकल कर रहे हो। पर उर्दू वाले इतने समझदार नहीं है कि तुम्हारा लाजिक समझ पायें।
सो साहब इस तरह से शेर कहना छूटा।

फिर एक दिन मैं एक अख़बार के दफ़्तर में बैठा था। एक मित्र झींकते हुए बोले - व्यंग्य के नाम पर इधर कूड़ा भेज रहे हैं लोग। छापना पडता है। मैंने इजाज़त मांगी कि अगर वह चाहें, तो कुछ फ़्रेश क़िस्म का, अपनी तरह का कूड़ा मैं भी देना शुरु करुँ। वह सहमत हो गये। सो साहब चल निकला मामला, मैं कूड़ा समझ कर भेजता रहा, वह व्यंग्य समझकर छापते रहे। जब तक बाक़ी के व्यंग्यकार गुटबाज़ी करके मुझे उखाड़ने की जुगाड़ कर पाते, तब तक मैं जम चुका था।

सवाल- लोग कहते हैं कि आप सिर्फ़ रुपयों के लिखते हैं।
जवाब- ग़लत कहते हैं कि मैं सिर्फ़ रुपयों के लिए लिखता हूँ। मौक़ा दें, मैं डालरों और पौंडों के लिए भी लिखना चाहता हूँ।

सवाल- आप अख़बारों के लिए लिखते हैं, पत्रिकाओं औऱ किताबों की शक्ल में आपका योगदान कम है, क्यों?
जवाब- मैं जनता का लेखक हूँ। जनता के काम आने वाला लेखक हूँ। ये जो आप केले ख़रीद कर लाये हैं, इनके लिफ़ाफ़ों का अख़बार देखिये। इसमें मेरा लेख है। जनता के काम आना और किसे कहते हैं जी। अभी भोपाल जा रहा था, एक अख़बार ख़रीदा। एक अख़बार में मेरा व्यंग्य था। कुछ देर बाद सामने की बर्थ की महिला के छोटे बच्चे ने लघुशंका कर दी। महिला ने मुझसे कहा कि अख़बार तो आप पढ़ ही चुके हैं, लाइए मैं इसे इस्तेमाल कर लूँ। व्यंग्यकार समाज की गंदगी साफ़ करता है, इस मुहावरे को सिर्फ़ अख़बार में लिखकर ही सार्थक किया जा सकता है। ऐसा गौरव पत्रिकाओ, और किताबों के लेखकों को नही मिलता। फिर मैं मूल्यवान लेखक हूँ, अख़बार की रद्दी छ: रुपये किलो बिकती है। पत्रिकाओं की रद्दी चार रुपये किलो बिकती है। किताबों की मुश्किल से दो रुपये किलो बिकती है। मैंने पहले ही साफ़ किया है कि मैं मूल्यवान लेखक हूँ।

सवाल- आपको लिखने की प्रेरणा कहां से मिलती है?
जवाब- प्रणव जैन, बलीराम सेकसरिया और रानू श्रीवास्तव से।

सवाल- पर इन लोगों के नाम बतौर लेखक तो मैंने नहीं सुने।
जवाब- मैंने भी नहीं सुने, क्योंकि ये लेखक हैं ही नहीं। ये उन अख़बारों के एकाउटेंट हैं, जो मेरे लेखों के पारिश्रमिक के चेक बनाते हैं। सारी प्रेरणा यहीं से मिलती है।

सवाल- अपने समकालीन व्यंग्यकारों के बारे में क्या कहना चाहते हैं।
जवाब- सारे बहुत ही बढ़िया हैं। वाह-वाह क्या कहने।

सवाल- सब कुछ बढ़िया ही है, कुछ भी ख़राब नहीं है क्या?
जवाब- देखिये, व्यंग्यकार बहुत तरह के हैं। एक तो जिनके लेख चलते हैं। दूसरे, जिनके स्थापित पुरस्कार, सम्मान वगैरह बाज़ार में चलते हैं। कईयों का कुछ नहीं चलता, पर वे तमाम किस्म की कमेटियों में चलते हैं, वे पुरस्कार, सम्मान, फ़ैलोशिप वगैरह के फ़ैसले करते हैं। मुझे अभी तक कोई पुरस्कार वगैरह नहीं मिला है। अभी बहुत पुरस्कार झटकने हैं। किसी को बुरा क्यों बताना। इस धरती पर सभी कुछ अपनी जगह ठीक है। मैं कौन हूँ किसी को बुरा बताने वाला। ना काहू से बैर के फ़्ण्डे पर चल कर ही सर्वत्र सैटिंग कर पाता है। वही मुझे करनी है।

सवाल- आपको अभी तक कोई पुरस्कार कोई नहीं मिला?
जवाब- देखिये इस संबंध में थोड़ा प्रोफ़ेशनल हूँ। पुरस्कार खेंचों प्रक्रिया में कास्ट-बेनिफ़िट एनालिसिस करता हूँ। अभी दिल्ली में एक अकादमी में ग्यारह हज़ार रुपये के पुरस्कार के लिए चक्कर चलाने के लिए किसी ने प्रोत्साहित किया। मैंने कैलकुलेशन किया कि दो निर्णायकों को सैट करने में छह शाम, ट्रांसपोर्ट ख़र्च, और महंगी वाली शराब की क़रीब बाईस बोतलें ख़र्च होंगी। ख़र्चा ज़्यादा हुआ जा रहा था, पुरस्कार कम का था। सो मैंने खट से बयान दिया कि मैं ऐसा लेखक हूँ कि जो अपनी प्रतिबद्धता को पुरस्कार के लिए नहीं बेचता। हाँ यह पुरस्कार अगर ज़्यादा रक़म का होता, तो मैं बयान देता कि पुरस्कार से ही तो प्रतिभा का मूल्यांकन होता है। एकाध लाख का पुरस्कार हो, तब मारधाड़ की जाये। कॉस्ट रिकवर हो जाये, कुछ मुनाफ़ा हो जाये, तब पुरस्कार में ध्यान लगाना चाहिए।

सवाल- तो क्या मतलब आपके हिसाब से ये सारे पुरस्कार रैकेटबाज़ी के तहत दिये जाते हैं?
जवाब- जो पुरस्कार मुझे दिये जायेंगे, वे इस बयान के अपवाद होंगे।

सवाल- आप इतनी गुंताड़ेबाज़ी करने की सोचते हैं। यह तो लेखकीय संवेदना नहीं है।
जवाब- देखिये, लेखन तीन प्रकार का होता है। कालजयी, शालजयी और मालजयी। कालजयी लेखन यह होता है - जैसे कोई लिखे कि नींबू का कब्ज़ निवारण में योगदान, ननद से संबंध कैसे सुधारें, कपड़ों पर लगे दाग़ों को कैसे छुड़ायें। ये लेखन कालजीय लेखन है। अक़बर के टाइम में भी इस तरह के लेखन की ज़रुरत थी और अब से पाँच हज़ार सालों बाद भी इस तरह के लेखन की डिमाण्ड होगी। दूसरे तरह का लेखन होता है शालजयी। इस किस्म के लेखन वाले लेखक साल छह महीनों में कोई बुलाकर शाल दे देता है। तीसरे किस्म का लेखन होता है मालजयी लेखन। सब तरफ से माल आने दो। फैलोशिप आने दो। पुरस्कार आने दो। अपनी दिलचस्पी मालजयी लेखन में है।

सवाल- अपने को किस स्तर का लेखक मानते हैं?
जवाब- कबीरदास, सूरदास और तुलसीदास के स्तर का। इनमें और मुझमें बहुत समानता है। इनमें से किसी को साहित्य का नोबल पुरस्कार नहीं मिला है। मुझे भी अभी तक नहीं मिला है। अगर मिल गया, तो फिर मेरा स्तर गिर जायेगा।

सवाब- आप पढ़ते क्या हैं?
जवाब- पढऩे की क्या ज़रुरत है। पढ़ने में लगा रह जाऊँगा, तो लिखूंगा कब।

सवाल- प्रशंसकों के लिए क्या संदेश है?
जवाब- देखिये मैं ऐसे ही किसी फ़ोकटी में प्रशंसक नहीं मानता। प्रशंसकों के लिए संदेश यह है कि अगर कोई आलोक पुराणिक राहत समिति या आलोक पुराणिक ग़रीबी निवारण समिति या आलोक पुराणिक कैंसर सहायतार्थ कोष में आपसे रुपये मांगे तो अवश्य दें। ऐसी कई समितियाँ मेरे निर्देशन में काम करती हैं। और तो और आलोक पुराणिक मृत्योपरांत परिवार सहायता समिति वाले आपसे चंदा मांगने आयें, तो उन्हे भी भरपूर योगदान दें।

पर प्रशंसक होने के लिए इतना भर काफी नहीं है। इस सारी चंदेबाज़ी के बाद अगर मैं आपको कहीं जीवित, स्वस्थ और सानंद दिख जाऊं, फिर भी आप नाराज न हों, और दोबारा आलोक पुराणिक सहायतार्थ कोष में योगदान देने को तत्पर दिखें, तब ही मानूंगा कि आप मेरे प्रशंसक हैं।

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बुधवार, 2 मई, 2007

व्यंग्य : कबूतर और कबूतरबाज

इन दिनों मामला बड़ा अजीब हो गया है। जिसे जो समझो वह वो नहीं निकलता। मुहल्ले के पढ़ाकू लड़के को इंटेलीजेंट समझो तो वह दूसरे मुहल्ले की लड़कियों की हिट लिस्ट का पहला निशाना निकलता है। पुलिसवाला गुंडा नंबर वन निकलता है, खिलाड़ी मॉडल बन कर संवरता है और मुहल्ले का गुंडा युवजन सभा का अध्यक्ष निकलता है। 'आइडेंटिटी क्राइसेस' का यह मामला बड़ा पेचीदा हो गया है। यहाँ तक कि खेल भी जो दिखायी देते हैं,वे नहीं होते। अब देखिए, संसद के प्रिय खेल कबड्डी में हर बात पर कबड्डी-कबड्डी चिल्लाने वाले नेता कबूतरबाज निकल रहे हैं।

क्राइम ब्रांच की मानें तो अपने बाबू भाई राजनेता कम कबूतरबाजी के मास्टर ब्लास्टर खिलाड़ी ज्यादा हैं। उन्होंने पता नहीं कितने मोटे-मोटे कबूतर देश के बाहर उड़ा दिए लेकिन जनाब मजाल है कि किसी को कभी इसकी भनक भी लगी हो।

एक समय था जब पुराने शहरों के पुराने इलाकों में कबूतरबाजी का खेल बड़े चाव के साथ खेला जाता था। फुर्र फुर्र करके लोग अपनी छतों से अपने अपने कबूतरों को उंचा और दूर तक उड़ाने का कंपटीशन लगाते थे। कबूतर उंचे उड़ें, इसके लिए कबूतरों की खास सेवा की जाती थी। अच्छा खाना-पीना कबूतरों को दिया जाता था। कबूतर बीमार हो जाए तो उसकी दवा दारू का विशेष प्रबंध किया जाता था। सिर्फ कबूतरबाजी के खेल में अपने मुहल्ले, अपने शहर में नाम कमाने के लिए लोग कबूतरों पर अच्छा खासा रूपया खर्च करते थे। लेकिन बाबू भाई ने तो कमाल कर दिस्सा । कबूतरबाजी का शौक भी फरमाया और कबूतरों का चुग्गा भी खा डाला। इतना ही नहीं, भाई साहब ने अपने कुछ साथियों को भी इस खेल का महारथी बना दिया।

बाबू भाई काफी वक्त से कबूतर उड़ा रहे थे-लेकिन इस बार एक कबूतरी उड़ाते वक्त धर दबोचे गए। धर लिए गए तो उनकी इस महान प्रतिभा को दुनिया ने जान लिया। इतना महान कबूतरबाज ज्यादा दिनों तक खाली नहीं बैठ सकता। आखिर, ये कबूतरबाज- देश के बाजों का साथी हैं। पुलिस उसे लेकर इधर-उधर घूम भले रही हो-लेकिन कुछ कर पाएगी-ऐसा लगता नहीं है। जब अपने देश में असली मगरमच्छ पालने वालों और मगरमच्छों के आगें अपने विरोधियों को जिंदा फेंक कर मजे देखने वालों का पुलिस कुछ नहीं कर पाती तो कबूतर उड़ाने वालों का क्या कर लेगी? आप गारंटी ले लें-पिंजरे में बंद रहने के बावजूद अपना यह कबूतरबाज ऐश करेगा और थोड़े दिन बाद हरे-हरे नोटो का दाना खिलाकर फिर कबूतर उड़ाएगा।

वैसे, देश में कबूतरों की भी कोई कमी नहीं है। आज देश का हर कबूतर अमेरिकी मैकडोनाल्ड का चुग्गा चुगना चाहता है। कबूतरबाज तो कबूतर उडाएंगे ही। कोई शक नहीं कि आने वाले दिनों में आपके अपने भाई-बहन या पड़ोसी को आप एक पुराने कथित कबूतरबाज के इस गाने पर थिरकते हुए देखें कि 'साढ़े नाल रहोगे तो ऐश करोगे, कबूतरों तुम दुनिया भर की सैर करोगे। उड़ने का ले ले मजा डरने की क्या बात है, गिरने से जो तू डरा तो कबूतर क्या खाक है। ना ना ना ना ना रे ना रे ना रे..........

-पीयूष

मंगलवार, 1 मई, 2007

राजेंद्र त्यागी का व्यंग्य : नेता का विराट स्वरूप

Rajendra Tyagiराजेन्द्र त्यागी पेशे से क़लम के सिपाही हैं। नुक्ताचीनी में माहिर हैं, सो व्यंग्य लिखने की मौलिक प्रतिभा उनमें होनी ही थी। नए प्रतीकों और रुपकों के ज़रिए अपनी बात कहने का उनका अलग अंदाज़ है। त्यागी जी के तीन व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं।

मौसम में ठण्डक थी। मगर उम्मीदवारों के मुँह से निकलती आश्वासन व वायदों की गरम हवाएँ, मौसम की सर्द हवाओं से रह-रह कर टकरा रहीं थी। इसलिए सर्द मौसम के बावजूद माहौल में गर्मी थी। चुनावी नारे आकाश में ट्रैफ़िक जाम की सी स्थिति पैदा किए हुए थे। जल-वायु, पृथ्वी-आकाश सभी चुनावाग्निसे तापायमान थे। जब संपूर्ण वायुमंडल ही चुनाव की बू से ओतप्रोत हो तो भला महामंडलेश्वर स्वामी अद्भूतानन्दजी महाराज व उनके भक्तगण ही उससे अछूते कैसे रह पाते। अत: भक्तजनों के आग्रह पर स्वामीजी ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करते-करते नेता के स्वरूप का बखान करने लगे। भक्तजनों के आग्रह स्वरों श्रोत्रेद्रियों में प्रवेश करते ही स्वामीजीके मुखारबिंदु से निकला, नेता! 'नेति-नेति' अर्थात यह भी नहीं यह भी नहीं। फिर स्वामीजी बोले जिसका उद्भव ही 'नृ' धातु से हुआ हो उसका वर्णन शब्दों में करना दुष्कर कार्य है। शब्द ज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं और नेता असीम है। फिर भी हे भक्तजनों! सीमित शब्दावली में ही मैं नेता के असीम स्वरूप का वर्णन करने का प्रयास करता हूँ।

"जुगाड़" की तरह अपने प्रवचन को आगे खींचते हुए स्वामीजी बोले - हे भक्तजनों! नेता सर्वव्यापी है, सर्वाकार है, निर्विवाद है, सद्चिदानंद है, जुगाड़ी है अर्थात सभी जुगाड़ों का स्रोत है।

नेता के विराट स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन करने के बाद स्वामीजी ने उसके एक-एक गुण का विस्तृत वर्णन कुछ इस प्रकार किया :

हे भक्तजनों! नेता सर्वव्यापी है, वह राष्ट्र के कण-कण में व्याप्त है। राजधानी से लेकर गाँव-देहात तक की गली-मौहल्ले की हर ईंट के नीचे वह विद्यमान है। हृदय निर्मल होना चाहिए घट-घट में नेता के दर्शन संभव हैं।

भक्तजनों, अब मैं नेता के सर्व-विवादित गुण का बखान करता हूँ। सर्व-विवादित यह गुण है उसका स्वरूप। आदिकाल अर्थात जब से सृष्टि में नेता नाम के जीव का उद्भव हुआ है, तभी से उसके स्वरूप को लेकर विवाद है। कहा जा सकता है कि नेता और उसका स्वरूप विवाद, दोनों का उद्भव व विकास साथ-साथ ही हुआ है।

हे भक्तजनों! विवादों के पार यदि देखा जाए तो नेता सर्वाकार है, बहुरूपी है। कभी-कभी उसे बहुरूपिया कह कर भी संबोधित किया जाता है। क्योंकि नेता लीलामय है, इसलिए भक्त ने उसके जिस रूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की नेता ने उसे उसी रूप में दर्शन दिये। उसके विभिन्न स्वरूप भक्त की भावना पर भी निर्भर करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है -
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देख तिन तैसी"
बहुरूपिया होने के बावजूद शास्त्रों में मूलतया उसके दो स्वरूपों का वर्णन प्रमुखता से मिलता है। आज के प्रवचनों में हम मुख्य रूप से इन्हीं दो रूपों की चर्चा करेंगे।

हे भक्तजनों! शास्त्रों को घोट कर यदि निचोड़ा जाए तो नेता का मूल स्वरूप निराकार ही साबित होता है। निराकार है, तभी तो जल-वायु और आकाश की तरह वह पात्र के अनुरूप आकार धारण कर लेता है, रंग बदल लेता है। निराकार है तभी तो वह घट-घट का वासी है और आड़ी-तिरछी उसकी टांग का आभस तभी तो प्रत्येक क्षेत्र में हो जाता है। स्नेह के वशीभूत भक्तजन कभी-कभी उसे घाट-घाट का जल ग्रहण कर्ता भी कहते हैं। दर्शन देकर नेता अक़्सर अंतर्ध्यान हो जाता है, हवा हो जाता है, इसलिए ही उसका एक नाम हवाबाज़ भी है। ये सभी लक्षण उसके निराकार स्वरूप का वर्णन करते हैं।

नेता के निराकार स्वरूप का वर्णन कर अद्भूतानन्दजी महाराज ने अपने प्रवचन पर अर्ध विराम लगाया। भक्तों ने अगला प्रश्न उठाया, "नेता जब निराकार है, तो दर्शन किसके?"
चिलम में दम लगाने की माफ़िक महाराज ने लंबी सांस खींची और फिर बोले, "प्रश्न महत्वपूर्ण है।"

हे भक्तजनों! नेता निराकार ही है। मगर जब-जब चुनाव सन्निकट होते हैं, भक्तों के आग्रह पर वह उम्मीदवार बनकर साकार रूप में अवतरित होता है। भक्तजनों यही कारण है कि चुनाव संपन्न हो जाने के बाद नेता अंतर्ध्यान हो जाता है। वास्तव में तब वह अपने निराकार रूप में चला जाता है। इसलिए तुच्छ जन को उसके दर्शन नहीं होते। मगर जो प्राणी भक्ति-भाव (पांव-पान-पूजा) के साथ उसके विराट स्वरूप के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं, ऐसे भक्तों को वह निराकार स्वरूप में भी दर्शन देता है।

भक्तजनों, सभी जुगाड़ों का आदि स्रोत होने के कारण नेता को जुगाड़ी भी कहा गया है। जुगाड़ उसकी प्रकृति है, उसकी माया है। सृष्टि के तमाम जुगाड़ उसी के जुगाड़ से संचालित हैं। जिसके सहारे वह संपूर्ण राजनैतिक सृष्टि का निर्माण करता है।

स्वामीजी! और यह भ्रष्टाचार?
अच्छाऽऽऽ, भ्रष्टाचार!
भक्तजनों, भ्रष्टाचार भी उसी शक्ति पुंज जुगाड़ का एक अंश है। हे भक्तजनों! जिस प्रकार जल से भरा कुंभ यदि जल ही में फूट जाए तो दोनों जल एक दूसरे में समा जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं। उसी प्रकार की गति जुगाड़ व भ्रष्टाचार की है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि भ्रष्टाचार जुगाड़ है और जुगाड़ भ्रष्टाचार। नेता प्रथम भ्रष्टाचार के लिए जुगाड़ करता है, फिर भ्रष्टाचार के सहारे चुनाव के लिए धन का जुगाड़ करता है और फिर उसके सहारे चुनाव में विजयश्री प्राप्त करने का जुगाड़। विजयश्री प्राप्त हो जाने के बाद सरकार बनाने के जुगाड़ में व्यस्त हो जाता है। ये सभी उसकी लीलाएँ हैं। ऐसी ही लीलाओं के माध्यम से संपूर्ण राजनैतिक सृष्टि की संरचना का जुगाड़ फिट हो जाता है। यह जुगाड़ ही की माया है कि नेता कभी नहीं हारता, हमेशा जनता ही हारती है।

नेता निर्विवाद है। दुनिया के संपूर्ण प्रपंच उसकी माया है, लीला है। मर्यादा स्थापना हेतु प्रपंच करना उसका परम कर्तव्य है। प्रपंच के माध्यम से वह लोकतंत्र वासियों को उनके कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराता है। क्योंक