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गुरुवार, 28 जून, 2007

प्रपंचतंत्र : ऐबों के सुपरिणाम की कहानी

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का व्यंग्य - "ऐबों के सुपरिणाम की कहानी"।



जंगलपुरम् नाम शहर में तमाम कंपनियों के हेडक्वार्टर थे। हेडक्वार्टर में होता यह था जो कि भी अपने बास को क्वार्टर पहुंचाया करता था, वह हेड हो जाया करता था। इस तरह से कई बंदे प्रोग्रेस की राह पर आगे बढ़ रहे थे।

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में शेर सिंह नाम का बास था, उसके दो जूनियर थे। एक का नाम था सियार सिंह और दूसरे का नाम था टाइगरप्रसाद। टाइगरप्रसाद दूर के रिश्ते के हिसाब से शेर सिंह का रिश्तेदार लगता था। टाइगरप्रसाद अपने नाम के अनुरुप गुणों से युक्त था। वह हमेशा सच बोलता था। वह सिगरेट, शऱाब से परहेज करता था। कैबरे-डिस्को से दूर रहता था। और तो और, वह झूठ तक नहीं बोलता था।

सियार सिंह मौके की नजाकत समझता था और तदनुरुप आचरण करता था। दो अक्तूबर यानी गांधी जयंती वाले दिन वह सत्य और नैतिकता पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार पाया करता था। पर इस पुरस्कार से प्राप्त राशि से वह निर्णायकों को क्वार्टर या अद्धा पिलाया करता था। इस तरह से जब सत्य में फायदा होता था, तो वह सत्य–सत्य करने लगता था। जब उसे लगता था कि फायदा अन्य गतिविधियों में है, तो वह अन्य गतिविधियों पर उतर जाता था।

उसका मानना था कि गतिशीलता में ही जीवन है। सवाल सत्संग का नहीं है, सवाल कुसंग का नहीं है। सवाल फायदे के संग का है। सियार सिंह ने तमाम संतों के प्रवचन स्थलों पर कैसेटों-किताबों के स्टाल लगाकर भी कमाया था और दारु की ब्लेक करके भी कमाया था। सियार सिंह कैबरे के ठिकानों को भी जानता था और यह भी जानता था कि शहर के श्रेष्ठ मंदिर कहां पर है। इस तरह से चौतरफा कार्रवाई करके वह प्रसन्न रहा करता था।

टाइगरप्रसाद का मामला एकतरफा था। वह सिर्फ और सिर्फ सत्य नैतिकता की बात करता था और अपने बास शेर सिंह को भी इसी तरह की बातें बताया करता था। शेर सिंह टाइगरप्रसाद से थोड़ा खुटका वैसे भी खाया करते थे क्योंकि वह जानते थे कि रिश्तेदारों से भले की उम्मीद कुछ इस तरह की है, जैसे गंजों के मुहल्ले में कोई कंघे की दुकान से मुनाफा कमाने की उम्मीद करे।

खैर, साहब कंपनी बहुराष्ट्रीय थी। रुस और ब्रिटेन नामक देशों से दो प्रतिनिधिमंडल आये। दोनों के हाथों में करोड़ों के आर्डर थे। शेर सिंह ने एक डेलीगेशन को मैनेज करने का जिम्मा टाइगर प्रसाद को सौंपा और दूसरे को मैनेज करने का जिम्मा सियार सिंह को सौंपा।

रुस वाले प्रतिनिधिमंडल को भारतीयता से परिचित कराने के उद्देश्य से टाइगरप्रसाद ने दिन में उन्हे तमाम मंदिरों का दौरा कराया और शाम को उन्हे वो कीर्तन में ले गया।
अगले दिन रुस वालों को टाइगरप्रसाद एक लोकल बाबा के प्रवचन सुनवाने ले गया। रुस वाले बोर हो गये और तीन दिन में टाइगर प्रसाद की कंपनी से फूट लिये और फिर कभी नहीं पलटे।

उधर सियार सिंह ने किया यह कि दिन में तो उसने ब्रिटेन वालों को मंदिर दिखाये। पर शाम होते होते सियार सिंह ने विदेशी अफसरों से कहा - भारतीय संस्कृति समग्रता की संस्कृति है। इसमें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की बात हमारी संस्कृति करती है। इसलिए धर्म के बाद काम और अर्थ की बात करनी भी जरुरी है। अंगरेज समझ नहीं पाये। सियार सिंह फिर अंगरेज अफसरों को एक डिस्को में ले गया, जहां बहुत ही शानदार कैबरे नृत्य हो रहे थे। अंगरेज बम बम हो गये। फिर अति ही सुंदर सुरा अंगरेज अफसरों को पेश की गयी। अंगरेज अफसर घबराये, बोले, इट इज रांग।

सियार सिंह बोले - देखिये गलत बात तब होती, जब यह शऱाब होती। ना, यह तो अमृततुल्य प्रसाद है। भारत में कई देवताओं को इसे बतौर प्रसाद चढ़ाया जाता है और हमारे यहां कहा जाता है, अतिथि देवो भव। अर्थात अतिथि देवता होता है। आप हमारे देवता है, आपको अगर हमने यह प्रसाद नहीं चढ़ाया, तो हम पर पाप लगेगा। इस पाप का भागी होने से बेहतर है कि होटल की पांचवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर लूं। मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं क्योंकि मुझे आप मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं -ऐसा कहता हुआ सियारसिंह छत की सीढ़ियों की ओर लपका।

अंगरेज अफसरों ने घबराकर उसे रोका और फिर अंगरेज दारु गटक गये। तत्पश्चात सियार सिंह ने कहा अर्थ को हमारे यहां बहुत बड़ा पुरुषार्थ माना गया है, इसलिए आपको पचास हजार रुपये का अर्थ पेशगी मंजूर करना पड़ेगा, बाकी का दस परसेंट हम आपको आर्डर मिलने के बाद दे देंगे। प्लीज अर्थ को स्वीकार कर लीजिये। वरना इसका मतलब होगा कि आप मुझे मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं - सियार सिंह ने फिर कहा। इस बार एक अंगरेज अफसर अपराध भावना से भरकर बोला - बट यह तो रिश्वत है।

“नहीं यह रिश्वत नहीं है, यह तो पुरुषार्थ है जो आप कर रहे हैं। अर्थ का पुरुषार्थ। पैसा हाथ का मैल है। समझिये कि हम अपना मैल आपको दे रहे हैं। आप तो हमें कृतार्थ कर रहे है कि हम से मैल स्वीकार कर रहे हैं। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मैं समझूंगा कि आप हमे अपने धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं” - सियारसिंह ने कहा। अंगरेज धर्म का पालन करने पर विवश हो गये।

अंगरेज अफसरों ने वापस जाते ही पचास करोड़ के आर्डर दिलवाये। रुसी अफसरों ने वापस जाते ही शेर सिंह को डांटा कि आपने जो आदमी हमें मैनेज करने के लिए रखा था, वह बहुत ही बोरिंग था। सिर्फ सत्य, नैतिकता की बातें करता था।

शेर सिंह ने टाइगरप्रसाद को नौकरी से डिसमिस कर दिया और सियार सिंह का प्रमोशन हो गया। तत्पश्चात इंस्टीट्यूट आफ बिजनेस ग्रोथ में रिश्वत देने के तरीके-विषय भाषण देते हुए सियार सिंह ने कहा -

1- सवाल सत्संग या कुसंग के बीच चुनने का नहीं है। सच यह है कि सत्संग से नोट मिलें, तो सत्संग करना चाहिए और कुसंग से नोट मिलें, तो कुंसंग कर लेना चाहिए। असली सवाल नोटों के संग का है।
2- रिश्वत को रिश्वत की तरह से नहीं देना चाहिए। उसे इस तरह से देना चाहिए मानो आप अपने धर्म का पालन कर रहे हैं और लेने वाला स्वीकार करके अपने धर्म का पालन कर रहा है।
3- तमाम किस्म के ऐबों को फिलोसोफिकल जाम पहना दिया जाये, तो मामला बहुत आसान हो जाता है।
4- बदमाश किस्म के अफसर सिर्फ इंडिया में ही नहीं होते, रुस और ब्रिटेन में भी पाये जाते हैं।

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सोमवार, 25 जून, 2007

विष्णु शर्मा का व्यंग्य : हर सड़क कुछ कहती है

विष्णु शर्मा – पंचतंत्र नहीं, बॉलीवुड तंत्र की उठापटक में लगे रहे हैं। बैग टेलीफ़िल्म्स के कार्यक्रम ‘ख़बरें बॉलीवुड की’ के प्रोड्यूसर हैं। हाल तक, स्टार न्यूज़ के पोल-खोल कार्यक्रम में भी अदृश्य तौर पर योगदान देते रहते थे। लेख कई लिखे, पर व्यंग्य इक्का-दुक्का ही लिखे हैं। “मस्ती की बस्ती” के लिए फिर व्यंग्य के मैदान में।

बुझे-बुझे से रहते हो कहो ध्यान किसका है,
पुरानी सड़क पर ये नया मकान किसका है?

आपको भी यह शेर अनचाहे ही हज़ारों बार झेलना पड़ा होगा। लेकिन मेरा सॉलिड दावा है कि मेरी तरह किसी ने इतना निठल्ला-चिंतन नहीं किया होगा। बहुतों से सुना था कि दिल में भी सड़क होती है। लेकिन इस शेर में किस सड़क और किस मकान की बात हो रही है, खुद शायर को भी नहीं पता होगा। बिलकुल वैसे जैसे आपको नहीं पता कि सड़क के कितने टाइप होते हैं। अब आप किसी ग्राम प्रधान की तरह इसे खडंजा और पडजा में डिवाइड मत कीजिएगा और न ही किसी ठेकेदार की तरह चार लैन और छह लैन में। हम तो सड़क को इमोशनली डिवाइड कर रहे हैं। मसलन कुछ सड़कें पूंजीवादी होती हैं। पूंजीवादी बोले तो उस शहर की सड़कें, जहाँ या तो बहुत-सी आईटी कंपनियाँ होती हैं या फिर जो सड़कें किसी बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी के किसी प्रोजेक्ट को बाक़ी शहर से जोड़ती हैं। ढेर सारी पूंजी जो लगी होती है। पूंजी तरलता यानी चिकनाई लाती है, सो ये सड़कें भी काफ़ी चिकनी बनी होती हैं। यानी टोटली खुरदुराहट फ़्री। ऐसे ही कुछ सड़कें घोर वामपंथी भी होती हैं, हम नहीं सुधरेंगे टाइप। पूंजी पसंद ही नहीं। वैसे कोई देता भी नहीं। किसी ने पैसा लगाकर थोड़ी-बहुत डेंटिंग-पेंटिंग करवा भी दी तो ऐसा लगता है मानो सड़क को ही पसंद नहीं आता, रात को करवटें बदल-बदल कर माक्र्सवादी सिद्धांतों की तरफ़ वापस लौट आती है। शायद चाहती है उस पर चलने वाले जितने ज़्यादा कष्ट भोगेंगे, उतने ही मज़बूत बनेंगे। यहीं पहली बार लगता है कि सर्वहारा के सिद्धांत से डार्विन का भी कुछ लेना देना था शायद।

जबकि कुछ सडकें संघी टाइप की होती हैं। दूर से बहुत लुभावनी होती हैं, एकदम चिकनी चौड़ी, आदर्शवादी – लेकिन स्पीड ब्रेकर इतने ज़बरदस्त होते हैं कि तौबा-तौबा। यूँ तो कॉलेज के लड़कों को स्पीड ब्रेकर ख़ासे पसंद होते हैं, लड़की पीछे बैठी हो तो हर स्पीड ब्रेकर पर झटके लेने का कुछ और ही मज़ा है। लेकिन संघी सड़कों पर स्पीड ब्रेकर इतने ऊँचे होते हैं कि लड़कियों को गाड़ी से उतरकर चलना ही मुफ़ीद लगता है। सो इन जोड़ों को संघी सड़कों से ख़ासी ऐलर्जी होती है। वैसे कुछ सड़कें सेकुलर टाइप की भी होती हैं, बोले तो किसी के लिए कोई मनाही नहीं। रिक्शे वाले भी सड़क के बीचों-बीच चलेंगे। दिन में भी ट्रक और बसें एलाउड हैं, गाड़ी के साइज़, स्पीड और लैन का तो कोई दूर-दूर तक भेद-भाव नहीं। अब ये आपकी किस्मत है कि गुड़ लेकर जा रही कोई बैलगाड़ी या भूसा लेकर जा रहा कोई ट्रैक्टर इतनी जगह घेर कर चले कि आपको साइड ही नहीं मिले। सारे लोग इस सड़क पर एक-दूसरे को गाली तो देते हैं, लेकिन सड़क को कभी नहीं। बाइक वाला टैम्पो वाले को, टैम्पोवाला रिक्शे वाले को, रिक्शा वाला कार वाले को और कार वाला ट्रक वाले को – लेकिन सड़क के सेकुलर करेक्टर पर कोई उंगली नहीं उठाता। वैसे कुछ सड़कें बुद्धिजीवी किस्म की भी होती हैं। आप कई बार कुछ सड़कों को देखकर सोचते होंगे कि ये ऐसे क्यों बनी हैं, इसकी बजाय वैसे बनी होतीं तो बेहतर होता। इसमें मोड़ यहाँ की बजाय थोड़ा पहले दे दिया गया होता तो ज़्यादा अच्छा होता। इसमें बीच में यू-टर्न आधा किलोमीटर दूर नहीं बनाया गया होता तो और भी अच्छा होता। यानी जो सड़कें आपको सोचने पर मजबूर कर देती हैं, बुद्धि पर ज़ोर डालने पर मजबूर कर देती हैं, वो बुद्धिजीवी किस्म की सड़कें होती हैं।

सड़कें अपनी हैसियत, उम्र और जन्म-स्थान आदि के हिसाब से भी डिफ़ाइन की जाती सकती हैं। बशर्ते मल्लिका शेरावत की तरह अपने नाम, उम्र इत्यादि में हेरा-फ़ेरी न करें। लेकिन सड़कों का नामकरण तो प्रजाति के आधार पर भी होता है। जैसे ‘दगड़ा’ या ‘दगरा’। आप इसे ‘डगर’ का अपभ्रंश रूप मान सकते हैं। दगरा वैसे दर्रे के काफ़ी निकट लगता है और दल्ले के भी। जैसे नेताओं के पीए या सेकेटरी या फिर दल्ले बाईपास रास्ते से आपको सीधे नेताजी तक पहुँचा देते हैं। वैसे ही दगरे गाँव या पोखर तक पहुँचने का बाईपास होते हैं। लेकिन ‘गैल’ शब्द थोड़ा व्यापक अर्थ लिए होता है। जैसे घूंसे को डुक्का बनाने के लिए उंगलियों के बीच में से अंगूठा निकालकर थोडा सोफ़िस्टीकेटेड लेकिन ज़्यादा मारक और असरदार बना दिया जाता है, वैसे ही जब हम ‘गैल’ की बात करते हैं तो दगरा, पीए या दल्ले की बजाय व्यापक अर्थ में पीआर कंपनी जैसा हो जाता है यानी एक बड़ी सोसायटी के लिए मैक्ज़िमम स्वीकार्य रूप। ये अलग बात है कि जहाँ ‘दगरे’ में पुरूष प्रधान खुरदुरा भाव नज़र आता है, वहीं ‘गैल’ में कर्णप्रिय स्त्रीत्व कोमलता होती है। बिलकुल ‘पगडंडी’ की तरह। साहित्यकारों ने ‘पगडंडी’ और फ़िल्मकारों ने ‘सड़क’ व ‘गलियों’ जैसे शब्दों को शायद उनके स्त्रीलिंग के चलते ही अपनाया होगा। लेकिन जब भी उनको रेस्पेक्ट देने का भाव मन में आता है, नेता लोग सड़क को ‘मार्ग’ कहने लगते हैं – बाबा साहब मार्ग, महात्मा गांधी मार्ग, बहादुर शाह जफ़र मार्ग। लेकिन अंगरेज़ लोग उसे सैक्सी नज़रों से देखते आए हैं, सो उसे ‘रोड’ का नाम दिया। कर्जन रोड, अक़बर रोड आदि। अगर कभी ‘वे’ भी कहते हैं तो उसमें निहित उपेक्षा या दूरी का भाव साफ़ दिखता है, चार ख़ूबसूरत इंटर्न लड़कियों के बीच एक बेचारे लड़के इंटर्न की तरह।

फ़िगर और शील के नज़रिए से भी सड़कों को देखा जा सकता है। आप गाँव की पतली पगडंडी को देखिए, जिस पर केवल साइकिल या स्कूटर ही चल सकता हो, बिलकुल बेदाग़ नज़र आएगी। बीच में ऐसा टर्न लेगी मानो किसी हसीना की कमर में बल पड़ गए हों। उसके किनारे खड़े सरकंडे ऐसे नज़र आते हैं मानो “इस ख़ूबसूरत लड़की को कोई और न देख-छेड़ ले” की मानसिकता वाले मोहल्ले के स्वंयभू कमसिन लौंडे लपाड़े हों। लेकिन दगरे का फ़िगर हमेशा बुलट पर सवार किसी सरपंच के छोकरे की तरह नज़र आता है, स्पीड कम लेकिन रूकावट फ़्री। ‘बुलट चले तो दुनिया रास्ता दे’ के मूलमंत्र के साथ। जबकि छोटे शहरों की सड़कें तो वहाँ की लड़कियों की तरह ही होती हैं, जब तक शादी नहीं हो जाती है, बस-स्टैंड के पान वाले से लेकर मिश्रा जी और उनके नाती के गैंग तक, सबकी नज़रों में छाई रहती हैं। लेकिन बहुत ही अल्पावधि सरकार की तरह जल्द ही शहीद हो जाती हैं और मार्केट से लापता। छोड़ जाती हैं अपनी यादों के निशान। तो बड़े शहर की ज़्यादातर सड़कें मल्लिका शेरावत और राखी सावंत की तरह नज़र आती हैं – चिकनी, चौड़ी, मादक और हरदम मानो इन्वीटेशन कार्ड देती हुईं। ज़रा-सी टूट-फूट हुई नहीं कि हफ़्ते भर के अंदर डेंट-पेंट। आजकल तो वैसे भी बड़े शहरों में नाक सीधी करने से लेकर झुर्रियाँ मिटाने के बर्टोक्स इंजेक्शन तक मौजूद हैं। बस जेब में नावाँ होना चाहिए। शहर की सड़कों पर तो वैसे भी नावें की कमी नहीं। इधर मेकओवर में लोगों के कमीशन भी फ़िक्स हैं – सो टेंशन ही नहीं। एक ख़ास बात और है। सभी पार्टियों के नेता लोग बड़े शहरों में ही रहते हैं। सो महानगरीय सड़कों के मेकओवर पर क्या वामपंथी और क्या संघी, सबकी आम सहमति है। हर फ़िल्म में आइटम गर्ल या आइटम डांस वैसे भी ज़रूरी बन गए हैं। इससे किसी को भी असहमति नहीं। अब तक आप भी सहमत हो गए होंगे कि हर सड़क कुछ कहती है।

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शुक्रवार, 22 जून, 2007

राकेश कायस्थ का व्यंग्य : साधु भूखा भाव का

वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के नज़रिए और बोलने के अंदाज़ में ही व्यंग्य है - लिहाज़ा उनका व्यंग्य लिखने का अपना अलग अंदाज़ है। अमर उजाला से लेकर दैनिक ट्रिब्यून तक कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उनके १५० से ज़्यादा व्यंग्य प्रकाशित हो चुके हैं। व्यंग्य की किताब जल्द बाज़ार में आने को है।

कॉलबेल की आवाज़ इतनी कर्कश थी कि बिस्तर से उठकर सीधा दरवाज़े की तरफ भागा। दरवाज़ा खोला तो सामने धर्म साक्षात खड़ा था। दैवदीप्तिमान व्यक्तित्व, ललाट पर त्रिपुंड, एक हाथ में कमंडल, दूसरे में मोबाइल और साथ चंदे की रसीद। पल भर को लगा कि गलती से चैनल तो नहीं बदल गया और एफटीवी की जगह संस्कार लग गया। दरअसल रात को एफटीवी देखते ही आंख लगी थी। ` साधु महाराज द्वार पर खड़े हैं और तुम अभी तक शयन कर रहे हो, जागो बच्चा, अपने कर्तव्य का निर्वाह करो।`

बाबाजी के आदेश से तंद्रा टूटी, जानना चाहा, धर्म-कर्म से रहित व्यक्ति की कोठरी में आने का कष्ट कैसे किया। बाबाजी ने कहा कि कारण विशेष है,लेकिन साधु महाराज पहले जलपान करेंगे, प्रयोजन बाद में बताएंगे। मैंने कहा- इस तुच्छ प्राणी की कुटिया में कुछ भी ऐसा नहीं कि बाबाजी भोग लगा सके। बाबाजी हंसकर शुभ वचन बोले— साधु तो भाव का भूखा होता है, बच्चा प्रेम से जो दे देगा, वही भोग लगा लेंगे।

अनजाने में बाबाजी ने मुझे सूत्र वाक्य दे दिया। सचमुच सारे साधु भाव के ही भूखे होते हैं। भाव ना मिले तो दुर्वासा हो जाते हैं। आडवाणी जी ने भाव नहीं दिया विश्व हिंदू परिषद के सारे साधु कमंडल का जल छिड़कने दौड़े। संघ के महात्माओं ने भी यही कहा कि अगर साधु संतों को भाव नहीं दिया तो बेभाव की ही पड़ेगी। थके-हारे आडवाणी जी वानप्रस्थ की तैयारी करने लगे। एनडीए का राज बदला, लेकिन भाव के भूखे साधु का क्रोध कम नहीं हुआ। नई सरकार में आरजेडी के आठ-आठ मंत्री बने, लेकिन साधु इस बात पर बिलखते रहे कि उनका नंबर नहीं आया।

.. निठल्ले चिंतन में मैं यह भूल ही गया था कि द्वार पर सचमुच के साधु महाराज बैठे हैं। बियर की बोतलें करीने से हटाने के बाद मैंने पूछा—मैगी खाएंगे क्या, मैं पिछले तीन दिन से यही खा रहा हूं। बाबाजी ने स्वीकृति में सिर हिलाया और मैं दो मिनट में मैगी बना लाया। भाव के भूखे साधु महाराज सचमुच के भी भूखे थे। विजातीय भोज्य पदार्थ पर टूट पड़े। जलपान समाप्त करके प्रयोजन बताया—चौराहे पर जो नया मंदिर बना है, उसकी प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसी के लिए सहयोग चाहिए। प्राण प्रतिष्ठा क्या होती है?`देवताओं का आह्ववान किया जाएगा, देवता आएंगे और प्रतिमाओं में प्रतिष्ठित हो जाएंगे`। साधु महाराज ने प्रकाश डाला। लेकिन मैं तो मनुष्य हूं, मैं क्या सहयोग कर सकता हूं? बहुत दिमाग़ दौड़ाने के बाद लगा शायद साधु महाराज प्राणी मात्र में ईश्वर को देखते हैं, शायद इसी लिए मेरे पास आये हैं। कलयुग में ऐसे महात्मा मिलते ही कहां हैं। धन्य हो साधु महाराज।

बाबाजी की महानता पर मन ही मन मुदित हो रहा था कि उन्होने बताया- सहयोग तुम्हे भंडारे और छज्जू चौबे एंड पार्टी की भजन संध्या के लिए करना है। कुछ समझ पाता इससे पहले बाबाजी ने चंदे की रसीद निकाली और 1100 रुपये लिख डाले। ` लेकिन बाबाजी यह रकम तो मेरे कमरे के किराये जितनी है।`

` अच्छा चलो 501 ही दे दो।` भाव का भूखा साधु मोल भाव पर आ गया।

`लेकिन बाबाजी इतने पैसे अगर आपको दे दिये, तो बिजली का बिल कहां से दूंगा, मोबाइल कैसे रिचार्ज कराउंगा।`

भोग विलास के लिए धन है, लेकिन धर्म के लिए नहीं। इसलिए तो हिंदू समाज का पतन हो रहा है। ठीक है, 201 रुपये ही दे दो।

बस का किराया कहां से चुकाउंगा, आपके जैसे महात्मा आ गये उन्हें क्या खिलाउंगा। साधु द्वार से भूखा जाएगा, तो पाप का भागी मैं ही बनूंगा ना। मैंने कातर होकर कहा। फिर अत्यंत श्रद्धा से 21 रुपये निकालकर बाबाजी के कर कमलों में रखे और दोनों हाथ जोड़ दिये—बस इतना ही सामर्थ्य महाराज। बाबाजी ने आग्नेय नेत्रों से देखा और बोले- तो यही है, तुम्हारी आस्था। डेढ़ घंटे ख़राब करके 21 रुपये दे रहो हो, पहले मालूम होता कि इतने कृपण हो, तो आता ही नहीं। बाबाजी का रौद्र रूप देखकर लगा कि मुझ जैसे कड़के की भेंट कतई स्वीकार नहीं करेंगे। दुखी मन से 21 रुपये वापस लेने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन भाव के भूखे साधु ने क्रोध से मुट्ठी बंद कर ली और इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता कमंडल थामकर मेरी गली पार कर गया।

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