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बुधवार, 18 जुलाई, 2007

आलोक पुराणिक का प्रपंचतंत्र : सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का एक और व्यंग्य - “सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी”।


स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।

उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफ़ा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई क़ारोबारी दुकान अपने मुनाफ़े के लिए खोलता है, ना कि कस्टमर के मुनाफ़े के लिए।

सेल्ससत्य का मानना था कि आख़िर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फ़ेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ़ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी ज़िंदगी मुनाफ़े कमाये जा सकते हैं।


पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर

एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये। एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया और वह कस्टमर वापस चला गया।

दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउण्टर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सेल्ससत्य ने कहा – “हेलो, आप कैसे हैं? ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।”
कस्टमर ने कहा – “मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।”
सेल्ससत्य बोला – “ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक ऑप्शन बताऊँ?”
कस्टमर बोला - “क्या?”
सेल्ससत्य बोला - “देखिये, स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लॉञ्च किया है। इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ़्त में दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला - “पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।”
सेल्ससत्य ने कहा - “कोई बात नहीं। यहाँ पर फाँसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा। बाक़ी की फ़ॉर्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी।”

सो साहब, जो कस्टमर सिर्फ़ पेपर सोप ख़रीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला। उधर फाँसू बैंक के सेल्समैन ने भी क़रीब पाँच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।

स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला - “ग्रेट! ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप ख़रीदने वाले को वीसीडी प्लेयर भी चेंप दे।”
इस पर सत्यसेल्स ने कहा - “वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है। इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है। ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डाँटा - “अबे तू मेरा इंप्लाई है या उस कस्टमर का इंपलाई! जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ़ सेल्समैन बनाता हूँ।

शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ़ सेल्स ऑफ़ीसर सेल्ससत्य बोला - “हे मूरख! बेच, सिर्फ़ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी क़ीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य–ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौक़ा-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयाँ बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के पास आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच, कस्टमर की चिंता मत कर।

सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला - “अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।”


एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल

सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद उसके बेटे - फ़ेयरप्राइज़ को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी। पर फ़ेयरप्राइज़ भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था। एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फ़ेयरप्राइज़ की तरफ़ जाकर बोला - “उस वाले मोबाइल की क्या क़ीमत है?”
“दस हजार रुपये, टैक्स अलग – फ़ेयरप्राइज़ ने बताया।”
“उस वाली मोटरसाइकिल की क्या क़ीमत है” - कस्टमर ने पूछा।
“पचपन हज़ार टैक्स एक्स्ट्रा” - फ़ेयरप्राइज़ ने बताया। फ़ेयरप्राइज़ का कस्टमर वापस भाग गया।

दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया। उसे मोबाइल की क़ीमत बतायी गयी - एक रुपया और मोटरसाइकिल की क़ीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत-सा हुआ, तो सेल्ससत्य ने कहा - “पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा – ओके।”

कस्टमर ने लोन के पेपर पर मज़े-मज़े में बिना देखे साइन कर दिये। यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फाँसू बैंक के सेल्समैन ने बताया - “जी आपकी महीने की किश्त चार हज़ार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेज़ों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंज़ूर की है कि अगर आप लोन लेने से इन्कार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फ़ीस और डिफ़ॉल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।”

कस्टमर फंस चुका था, वो बोला - “पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।”
सेल्ससत्य इस पर बोला - “महाराज, मोबाइल की क़ीमत तो एक ही रुपया है। पर 9,999 रुपये उसकी एक्सेसरीज़ के हैं। हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज़ मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ़ दस रुपये की है। पर बाक़ी की रकम हम आफ़्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।”

एक लाख रुपये डिफ़ॉल्ट फ़ीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये। यह पूरा कांड देखकर फ़ेयरप्राइज़ समझ गया और सेल्ससत्य से बोला - “सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा।”

इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएँ मिलती हैं -

1. बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फ़ॉलो करना चाहिए। जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2. समझदार सेल्समैन हेलीकॉप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।

सावधान - आलोक पुराणिक! प्रपंचतंत्र को प्रकाशित करने का अधिकार सिर्फ़ “मस्ती की बस्ती” को है। किसी और ब्लॉग, यहाँ तक कि अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया तो कार्रवाई हो सकती है।

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बुधवार, 11 जुलाई, 2007

मुरली मनोहर श्रीवास्तव का व्यंग्य : गुरु शिष्य दोऊ खड़े काके लागू पाय

मूलतः इलाहाबाद के रहने वाले श्री मुरली मनोहर श्रीवास्तव पेशे से इंजीनियर हैं। व्यंग्य विधा पर उनकी अच्छी पकड़ है और नियमित तौर पर कई अख़बारों में लिखते रहते हैं। श्रीवास्तवजी का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। पेश है “मस्ती की बस्ती” के पाठकों के लिए उनका मज़ेदार व्यंग्य।

यह गद्य अंश उस शोध विद्यार्थी की थीसिस का हिस्सा है, जिसने अभी-अभी आधुनिक शिक्षा मे कबीर की प्रासंगिकता विषय पर डॉक्टरेट प्राप्त की है। वह लिखता है कि कबीर को आज मात्र गुरु और गोविन्द के सन्दर्भ तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। वस्तुत: आज गुरु और गोविन्द की तुलना का कोई अर्थ नहीं रहा, क्योंकि गोविन्द को लोग मात्र एक चमत्कार करने वाले के रूप मे देख उसका मज़ाक उड़ाने लगे हैं। बच्चे भी कहते हैं कि गणेश जी के लिये शीतल पेय ट्राई करें क्या? गर्मी बहुत पड़ रही है, मिल्क का मूड न हो क्या पता? या फिर यदि समुद्र का पानी मीठा हो सकता है, तो मेरे पूजा करने से मेरा होमवर्क भी पूरा हो जायेगा।

ऐसे में गुरु के महत्व की तुलना करने के लिये शिष्य की आवश्यकता है। जैसा की सर्वविदित है, गुरु गुड़ ही रहता है और चेला शक्कर हो जाता है। फिर भी कबीर दास की प्रासंगिकता इसी में है कि वे कहते हैं - भले ही चेला शक्कर हो जाये , गुरु का महत्व कम नहीं होता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिष्य की मांग आज के समाज में गुरु से अधिक है और शिष्य गुरु से महान भी है, परन्तु गुरु के बड़प्पन को नकारा नहीं जा सकता।

जिन्हें शिष्य के महान होने के विषय मे शंका हो, उनके लिये मैं आगे लिखता हूँ कि जिस गुरुकुल मे होनहार शिष्य जाते हैं, पैसे वाले शिष्य जिस गुरु से कोचिङ्ग लेते हैं, वह गुरु अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। कहने को तो शिक्षा का दान दिया जाता है, परन्तु आज के समाज मे दान का महत्व नहीं रह गया है। लोग दान को भिक्षा की तरह समझने लगे हैं। जिसका नतीजा है कि जिन स्कूलों और विद्यालयों में अनुदान के माध्यम से नाम मात्र को फ़ीस लेकर शिक्षा प्रदान की जाती है, वहाँ के विद्यार्थी नेता बनने के अतिरिक्त अपना कोई भविष्य नही देखते और ऐसे में जब कोई गुरु शिष्य के भविष्य से खिलवाड़ करता है, तो शिष्य यह ज़रूर बता देता है कि महान और महत्वपूर्ण वही है गुरु नहीं।

वैसे गुरु को आज के ज़माने में भी कम समझना कभी-कभी भारी पड़ सकता है। जैसा कि अनेक विश्वविद्यालयों में सामने आया है कि ऐसे गुरु शिष्य के सामने अपना महत्व बनाये रखने कि लिये घर-परिवार को तिलांजलि दे कर अपनी शिष्याओं से प्रेमालाप करते हैं और एक तीर से दो शिकार करते हैं। वैसे अनचाहे ही शिकार तो कई हो जाते हैं, जैसे कि गुरु का उद्देश्य मात्र यह दिखाना होता है - हे शिष्य, मैं किसी भी मामले मे तुमसे कम नहीं हूँ और जिस शिष्या के तुम सपने देखते हो वह मेरे प्रेम में पागल है। इसके दो शिकार यह हुये कि शिष्य गुरु को उस सीमित समय के लिये अपने से बड़ा स्वीकार कर लेता है और गुरु को इस प्रसंग से प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ने का आधार मिल जाता है।

तब उसकी किसी ज़माने मे लिखी और खुद के पैसे से छपवायी हुई पुस्तक की मांग बढ़ जाती है। साथ ही लोग उसे साहित्यकार भी स्वीकार करने लगते हैं। उसके लिखे शोध पत्र अनेक सेमीनारों मे पढ़े जाने लगते हैं और अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ाने के लिये इस बखेड़े को मीडिया नये रूप से पेश करता है जैसे - शिक्षक, शिष्या और पत्नी। तब दर्शक यह देखकर रोमांचित हो उठते हैं कि किस तरह एक भारतीय नारी अपने पति के अलौकिक प्रेम में रोड़ा बनते हुये अपनी सौत के बाल खींच-खींच कर पीट रही है।

इस घटना से बहुत से शिष्य इस कलियुग में महान होकर भी गुरु की शरण में आते हैं और कहते हैं - गुरुदेव, मैं आपके अनुभवों के सामने बच्चा हूँ। मेरे लिये अभी यह दो नावों की सवारी का अनुभव अपरिचित है। अरे! दो क्या हम तो एक नाव पर भी सवारी नहीं कर पाये और आपको देख कर लग रहा है कि हमारा विद्यार्थी जीवन नष्ट हो गया । मार-पीट में अव्वल न होने के कारण न तो हम नेता बन पाये और न ही नेता बनने की चाहत रखने के कारण रोमियो। ऐसे में यदि इस वर्ष हमें कॉलेज छोड़ना पड़ा तो इस स्वर्णिम काल की कौन-सी स्मृति मैं जीवन में सहेज कर रख पाऊंगा। सो हे गुरुदेव! मैं भले ही आज साधन-सम्पन्न हूँ और महत्वपूर्ण भी, किन्तु आपकी महानता के आगे हार मानता हूँ।

इस भक्ति पूर्ण वाक्य को सुन कर गुरु का हृदय पिघले बिना नहीं रह पाता और वह अपने शिष्य को ज्ञान का दान देने को तत्पर हो जाता है।

लेकिन भारत देश मे पुराना नियम है, जब तक समस्या में बाहरी हस्तक्षेप न हो मज़ा नहीं आता। तो यह समस्या (कौन सी सम्स्या?) यही गुरु शिष्य में से कौन महान है इस बात का निर्णय करने की। हाँ, तो यह समस्या अपने असली रूप में तब आती है जब गुरु-शिष्य महानता विवाद मे पुराने विद्यार्थी जो यहाँ से कोचिंग ले कर आज स्थापित नेता हो चुके हैं, कूद पड़ते हैं। वे बताते हैं कि हे गुरुदेव, आज यदि आप क्लास मे पढ़ा पा रहे हैं तो यह मेरी बदौलत, यदि इस विद्यालय से आपके परिवार का पालन-पोषण हो रहा है तो हमारे जैसे ही पूर्व विद्यार्थियों के अनुदान की बदौलत। सो आपसे अनुरोध है कि आप अपनी महानता के झूठे आवरण को चुपचाप ओढ़े रहिये और वे जो नये विद्यार्थी कॉलेज मे चुनाव नुमा खेल खेल रहे हैं, उन्हें खेलने दीजिये।

असली घपला यही होता है, वस्तुत: गुरु अपने आपको हर क्षेत्र मे महान समझता है और वह शिष्य के इस राजनीतिक चैलेंज को समझ नहीं पाता। वह रोमांस की तरह उस राजनीति में भी चुनौती देने का प्रयास करता है और मात खा जाता है।

आगे यह विद्यार्थी लिखता है कि अभी वह यह फ़ैसला नहीं कर पाया है कि गुरु और शिष्य साथ-साथ खड़े हों तो वह किसके पांव पहले छूये और यही इस शोध-ग्रन्थ की सफलता का राज़ भी है। क्योंकि उसे लग रहा है कि इस शोध के बाद वह महान साहित्यकार की श्रेणी मे आ जायेगा और पूरे राष्ट्र में इस विषय पर नयी बहस छिड़ जायेगी, जिसके केन्द्र में वही रहने वाला है। आप तो जानते ही हैं आजकल किसी भी क्षेत्र मे विवादित बने रहना कुछ पूरा कर दिखाने से ज़्यादा फ़ायदेमन्द है। सो जब तक यह गुरु-शिष्य विवाद चलेगा, मेरा अस्तित्व बना रहेगा। मैं इस शोध विद्यार्थी को एक सफल शोधकर्ता की उपाधि देना चाहता हूँ, आगे जैसा आप चाहें।

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मंगलवार, 3 जुलाई, 2007

अरुण अरोड़ा के व्यंग्यात्मक दोहे

फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा एक बार फिर हाज़िर हैं "मस्ती की बस्ती" में। इस बार वे सुना रहे हैं गुरू पर दोहे, लेकिन ज़रा नए अन्दाज़ में। आप भी इन दोहों का मज़ा लीजिए:

१.
गुरु गोविंद दोनो खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने कुर्सी दई दिवाय॥

भावार्थ:- असमंजस मे पडा चेले के सामने सतगुरु और भगवान दोनो खडे है, चेला दुविधा में है कि मै पहले किसके पाँव पड़ूँ।
हे गुरु! मै आप पर बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे कुर्सी दिलादी।
अर्थात् जो काम आये वही बडा है

२. बलिहारी गुरु आपने दिखा दियो जो बार।
दो पगन के लगत ही दिखन लगत है चार॥

भावार्थ:- कलियुगी सतगुरु आपने चेले को बार दिखा कर जीवन सफल कर दिया है, जहाँ दो पैग लगाते ही चार दिखाई देने लगते है।
अर्थात् सच्चा गुरु वही है जो मस्त रहना सिखाए।

३. संसद मंज़िल गुंडई नाव है बाक़ी सब बेकार।
जिस दिन तुम पा जाओगे, सारे दुखडे पार॥

भावार्थ:- प्रिय चेले, नाव रूपी तेरी गुंडागिरी ही तुझे संसद रूपी मंज़िल तक ले जायेगी। बाक़ी सब कुछ मिथ्या है। जिस दिन तुम अपनी मंज़िल पर पहुँच जाओगे, सारे दुःख और पाप समाप्त हो जायेंगे।
अर्थात् मंज़िल तक पहुँचना ही मुख्य उद्देश्य होना चाहिये, चाहे मार्ग कैसा भी हो।

४. गुरु सारे माल समेटिये, चेले को बस नाम।
मन राखि संतोषिये, घूम फिरत सब गाम॥

भावार्थ:- कलयुगी सतगुरु ने मुझे अपना नाम देकर सारा माल समेट लिया है। अब मैं मन में संतोष लिये गाँव-गाँव भटकता फिर रहा हूँ।
अर्थात् गुरु माल समेटे उस से पहले आप गुरु का माल समेट कर कल्टी हो लो, यही सत्य है।

५. सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
जब तक माल बटोरो, कियो प्रेम व्यवहार॥
माया सारी निखस गई, दियो सरक पे डार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार॥

भावार्थ:- अन्त नहीं है कलयुग के सतगुरु की महिमा का, अन्त नहीं है उनके द्वारा किये गये उपकारों का। जब तक खीसे मे माल था, गुरुदेव ने अत्यंत प्रेम पूर्वक व्यवहार किया, पर जब मैं माया से मुक्त हो गया, मुझे सड़क पर डाल दिया।
गुरु के इस कार्य ने मेरे लोचन अर्थात् नेत्र खोल दिये, जिससे मैं अब निरंतर अनंत देख पा रहा हूँ।
अर्थात् मुझ निपट अज्ञानी को गुरु ने ज्ञान देकर गुरु बनाने की बहुत कोशिश की पर मेरी अज्ञानता को अब गुरु ने दूर कर दिया है।

६. अच्छा सतगुरु मिल गया अच्छी मिल गई सीख।
गुरु तो खावै माल पुये, मैं घर-घर मांगू भीख॥

भावार्थ:- मुझे अच्छा सतगुरु मिल गया, अच्छी सीख भी मिल गई। अब मैं चिंताओ से मुक्त होकर घर-घर भीख मांगता हूँ और सतगुरु माल पुये खाते हैं।
अर्थात् चेले से गुरु बनना ज़्यादा सुखदाई है।

७. जा तन विष की बेलरी, नोट है सुख की खान।
सिर फोड़े जो नोट मिले तो भी ससता जान॥

भावार्थ:- यह तन नश्वर है, संसार असार है, बस नोट ही सुख देने वाले हैं – इस मिथ्या जगत में, अगर किसी का सिर फोड़कर भी नोटों की प्राप्ति होती है तो वह सस्ती है। क्योंकि नोट होने से तू हर पाप से मुक्ती का मार्ग निकाल सकता है।
अर्थात् इस मिथ्या संसार मे नोट से बढ़कर कुछ नहीं।

८. अब तो तू अधिकारी है लूट सके जो लूट।
रिटायर्मेंट के बाद में नसीब ना होगी फूट॥

भावार्थ:- अभी तू सरकारी अधिकारी है, जो माल बना सकता हो बना। रिटायर होने के बाद तुझे फूट (खरीफ़ की फ़सल में मक्का के साथ मे होने वाला एक छोटा-सा फल) भी खाने को नहीं मिलेगी।
अर्थात् आज और अभी माल बना, कल की योजना मत सोच।

९. कबिरा बास रिझाइ ले मुख अमृत गुण गाय।
मार्च माह है सर पर, कहीं प्रमोशन ना रह जाय॥

भावार्थ:- कबीर दास कहते हैं मुख मे अमृत जैसी मीठी वाणी लेकर बॉस के गुण गाने का समय है। मार्च का महीना चल रहा है, कहीं प्रमोशन ना रह जाय।
अर्थात् काम चाहे मत करो, पर बॉस को मक्खन लगाना मत भूलो

१०. कबिरा नोट ख़र्च करो, गिफ़्ट लो एक मंगाय।
वापे बोस को नाय लिखो, उसे घर पे दे के आय॥

भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कुछ पैसा ख़र्च कर एक अच्छा सा गिफ़्ट मंगा कर बास के घर जाकर खुद देकर आओ।
अर्थात् बॉस को ख़ुश करने का कोई मौक़ा मार्च माह में हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।

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रविवार, 1 जुलाई, 2007

प्रियरंजन झा का व्यंग्य : भगवान के बूते से बाहर

बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है - लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन बता रहे हैं क्या है भगवान के बूते से भी बाहर।

मैंने ख़बर पढ़ी कि हूजी के आतंकी साधु के भेष में देश में गड़बड़ी फैलाने आए हैं। ऐसे में आजकल हमारी हालत ख़राब रहती है। साधु के भेष में अब मुझे सब असाधु ही नज़र आते हैं। एक साधु जैसे दिखने वाले आदमी से मैंने पूछा, 'आप साधु के भेष में हूजीके आतंकी तो नहीं?' उसने कहा, 'लगता है बच्चा, तुम मृग मरीचिका के शिकार हो, इसलिए साधुको असाधु समझ रहे हो। वैसे, ग़लती तुम्हारी भी नहीं है। इस देश की हवा में ही भांग घुली हुई है, इसलिए सब कुछ उल्टा हो रहा है। लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि तुम परेशान क्यों हो रहे हो? जा करके जनता से पूछो, सब आनंद से हैं। बस एक तुम्हारे ही पेट में दर्द हो रहा है! हूजी...हूँ...।'

हमने सोचा, चलो जनता के आनंद का पता लगाया जाए। हम यूपी गए। वहाँ एक आदमी से पूछा, 'बहनजी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता रहा है, आप लोगों ने बावजूद इसके उनको मुख्यमंत्री बना दिया?' वह बिगड़ गया। उल्टे मुझसे से पूछने लगा, 'आप ऊँची जाति के हैं क्या? ... तभी यह आरोप लगा रहे हैं। पचास साल तक ऊँची जाति ने देश को खाया, तब तो आप लोगों के पेट में कभी दर्द नहीं हुआ, अब बहनजी की संपत्ति देखकर क्यों हो रहा है?'

उसे उलझते देख मेरे एक दोस्त ने मुझे समझाया, 'कहाँ परेशान हो रहे हो? नेताजी को कोसने की बजाय उनसे सीख लो। शेयर में पैसा इन्वेस्ट करने की बजाय नेतागिरी में इन्वेस्ट करो। जन्म सफल हो जाएगा!'

ख़ैर, अरबपति नेता से प्रभावित हुए बिना हम बहुचर्चित डिफॉल्टर नेता के बारे में जानने के लिए एक दूसरे नेता के पास पहुंचे। मैंने पूछा, 'आप लोगों ने एक डिफॉल्टर को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना दिया है?' वह कुछ ज़्यादा ही गर्म हो गया, 'डिफॉल्टर तो हर कोई है। जो नेता बन गया, समझो डिफॉल्टर हो गया या फिर यह भी कह सकते हो कि डिफॉल्टर ही इस देश में नेता बन सकता है। अगर इतना क़ानूनची बनोगे, तो विदेश से नेता आयात करना पड़ेगा!'

लेकिन मुझे तो देसी नेता ही चाहिए, इसलिए मैं पहुँचा शिवसेना के ऑफ़िस। मैंने वहाँ बैठे एक कार्यकर्ता से पूछा, 'आप लोग हिंदुत्व की पॉलिटिक्स करते हैं, लेकिन अब मराठी के नाम पर पाटिल का समर्थन...? राजस्थानी हिंदू में क्या खोट है? आख़िर आप लोग कितने छोटे-छोटे टुकड़ों में लोगों को बांटकर राजनीति कर सकते हैं?' जवाब मिला, 'हमारे पार्टी प्रमुख इतने मंझे हुए नेता हैं कि एक आदमी पर भी राजनीति कर सकते हैं, यहाँ तो मामला अरब की जनसंख्या को करोड़ में ही बांटने का है! वैसे, आपको दिक़्क़त क्या है? कोई मराठा राष्ट्रपति बने, ये तो हमारा गौरव होगा।'

हिंदुत्व की बात चलते ही हमको फिर से हूजी याद आ गया। हमने फिर से एक दाढ़ी वाले व्यक्ति से पूछा, 'कहा जा रहा है कि आपके ही स्कूल में आतंकी सब आकर रुकते हैं।' वह कहने लगा, 'तो इसमें गड़बड़ क्या है? आप हिंदू हैं क्या? ...इसीलिए ऐसे कह रहे हैं। इस देश में जितना गड़बड़ होता है, सब के लिए हम ही तो दोषी होते हैं। नक्सली इतना कुछ करते हैं, उस पर तो आप लोग किसीको कुछ नहीं कहते, उनके समर्थक तो आपके देश में सत्ता में साझीदार हैं... उनका वर्ग संघर्ष है, तो हमारी भी धर्म की लड़ाई है। आप ख़ामख़ा परेशान हो रहे हैं। जाइए, आराम से घर में सोइए। चिंता से चतुराई घटती है और चतुराई घट गई, तो चतुर सुजानों के इस देश में आप चिंता करने लायक़ भी नहीं बचेंगे। अरबपति नेता, डिफॉल्टर नेता, साम्प्रदायिक नेता या हूजीको यहाँ आने से रोकना तो ख़ैर भगवान के बूते से भी बाहर की बात है!'

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