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रविवार, 30 सितंबर, 2007

राजेंद्र त्यागी का व्यंग्य : अर्थ मार्ग धर्म मार्ग

राजेन्द्र त्यागी पेशे से क़लम के सिपाही हैं। नुक्ताचीनी में माहिर हैं, सो व्यंग्य लिखने की मौलिक प्रतिभा उनमें होनी ही थी। नए प्रतीकों और रुपकों के ज़रिए अपनी बात कहने का उनका अलग अंदाज़ है। त्यागी जी के तीन व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। "मस्ती की बस्ती" पर इस बार पढ़िए उनका व्यंग्य - "अर्थ-मार्ग धर्म-मार्ग"।

उसने कहाँ-कहाँ धक्के नहीं खाए। कौन-कौन से ब्राण्ड के पापड़ नहीं बेले, मगर अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग प्राप्त करने में वह असफल ही रहा। दरअसल वह कोई सस्ता, सुंदर और टिकाऊ रास्ता चाहता था। ऐसा रास्ता जिसमें अर्थ तो बरसे मगर छप्पर सुरक्षित रहे। काजल की कोठरी से काजल तो समेटे, मगर कुर्ता चमकता रहे। इसके लिए उसने सत्यनारायण की कथा भी नियमित रूप से कराई। लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से उल्लुओं को भी खूब चबेना चबाया। अर्थ प्राप्ति हुई भी हुई, मगर दाग़ ने पीछा नहीं छोड़ा।

अर्थ प्राप्ति के सुगम व सुरक्षित रास्ते के रूप में उसने पत्रकारिता के पेशे में भाग्य आज़माया। नेताओं की परिक्रमा की, उनके लिए दलाली की। अर्थ भी खूब बटोरा, मगर संतोष की प्राप्ति नहीं हुई। एक अज्ञात भय से भयभीत रहा। दलाली करते-करते पत्रकारिता का त्याग कर समाज सेवकी का पेशा अख़्तियार किया। वहाँ भी सेवा की मेवा खूब बटोरी, मगर अज्ञात भय ने वहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा। समाज सेवकी से उसने राजनीति के बाज़ार में प्रवेश किया और नेता बन बैठा। अर्थ की धारा उसकी तरफ़ और भी तीव्र गति से प्रवाहित होने लगी। मगर कभी पक्ष तो कभी विपक्ष और कभी स्टिंग ऑपरेशन तो, कभी सीबीआई उसे पीछा करते दिखलाई देते रहे।

दाग़ से कैसे पीछा छुड़ाए, यह प्रश्न बराबर उसे विचलित करता रहा। एक के बाद एक असफलता से हताश कभी-कभी वह सोचता, 'पता नहीं अंधे के हाथ बटेर कैसे लग जाती है? लगती भी है या बिना लगे ही मार्केटिंग कर दी जाती है। मार्केटिंग का फ़ण्डा है ही कुछ ऐसा अपने-अपने अंधों के हाथ बटेर थमा कर उपलब्धि रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी जाती हैं।'

हैरान-परेशान, परेशान मुन्नालाल ने एक दिन एक ही झटके में कुर्ता-पयजामा उतार खूंटी पर टांग दिया और राजनीति के बाज़ार से अपना कारोबार समेट सुरक्षित किसी नए व्यवसाय की तलाश में लेफ़्ट-राइट शुरू कर दी। दोस्तों के सामने अपनी पीड़ा रखी, जन-परिवारजनों के साथ सलाह-मश्विरा किया और अंतत: स्वामी अभेदानंद की शरण में जाने का निश्चय किया। अध्यात्म में उसकी रुचि बालकाल से ही थी, इसलिए उसने सोचा अर्थ प्राप्ति का न सही धर्म मार्ग ही सही। उसका ऐसा फ़ैसला करना स्वाभाविक भी था, क्योंकि एक सीमा तक चूहों का भक्षण करने के बाद परलोक सुधारने के मंशा से बिल्लियां अक्सर तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़ती हैं।

स्वामी अभेदानंद के समक्ष वह चरणागत हुआ और उद्देश्य निवेदन किया। राजनीति को धर्ममय बनाए रखने के लिए धर्मगुरु व राजनीतिज्ञों के बीच सांठगांठ आवश्यक है। इसी धर्म का निर्वाह करते हुए स्वामीजी ने मुन्नालाल को शिष्य के रूप में ग्रहण कर अपने पवित्र आशीर्वाद से धन्य किया। मुन्नालाल भी पूर्ण समर्पण भाव से उनकी सेवा में लग गया। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर एक दिन स्वामीजी बोले, 'पुत्र मुन्नालाल! तुम्हारे प्रश्न, तुम्हारी शंकाएँ ऐसे छद्म ज्ञानियों के समान हैं, जो ज्ञान विहीन होते हुए भी ज्ञानी कहलाए जाते हैं। परंतु तुम्हारे अंतर्मन में धर्म व अर्थ दोनों के बीज सुषुप्त अवस्था में विद्यमान हैं और मैं तुम्हारे बुद्धि-चातुर्य और सेवा दोनों से प्रसन्न हूँ अत: तुम्हें अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग बतलाता हूँ। पुत्र! अर्थ प्राप्ति का केवल मात्र एक ही सुगम व सुरक्षित मार्ग है और वह है, धर्म-मार्ग। धर्म-मार्ग ही बिना किसी अवरोध के सीधा कुबेर के आश्रम की ओर जाता है।'

स्वामीजी के ऐसे वचन सुन मुन्नालाल हैरान था, उसे लगा कि वह आसमान से गिरकर खजूर पर लटक गया है और स्वामीजी उसे खजूर के पत्ते पर ही दंड-बैठक करने की सलाह दे रहें हैं। वह आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला, 'स्वामीजी, धर्म-मार्ग और अर्थ! धर्म मार्ग तो मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाता है। अर्थ तो धर्म-मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है। पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत भी कुछ ऐसा ही कहता है।'

मुन्नालाल के वचन सुन स्वामीजी मुस्करा दिए और बोले, 'वत्स! अभी तक तुम किसी योग्य गुरु के पल्ले नहीं पड़े हो, तभी ऐसे तुच्छ विचार रखते हो। मोक्ष की ओर नहीं पुत्र! धर्म-मार्ग अर्थ की ही ओर जाता है। पुरुषार्थ चतुष्टय का सिद्धांत भी यही प्रतिपादित करता है। अपने मस्तिष्क के सॉफ़्टवेयर को तनिक एक्टिवेट करो और सोचो पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में धर्म के बाद क्या अर्थ नहीं आता? अरे, मूर्ख मोक्ष तो उपरांत में आता है। पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत भी यही कहता है, धर्म मार्ग अपना कर अर्थ प्राप्त करो और अर्थ तुम्हें काम व मोक्ष प्रदान करेगा।'

मुन्नालाल बोला, 'मगर गुरुजी! धर्म मार्ग अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग कैसे है?'
स्वामीजी बोले, 'आभामंडल! पुत्र आभामंडल, इसी आभामंडल के कारण कुबेर हमारे यहाँ पानी भरता है और उसी के प्रभाव से समूचा जनतंत्र हमारे समक्ष नतमस्तक है। बड़े-बड़े पूर्व, भूतपूर्व व अभूतपूर्व मंत्रियों से लेकर संतरी तक हमारे समक्ष चरणागत हैं। फिर असुरक्षा का प्रश्न कहाँ? आभामंडल लक्ष्मण रेखा है, कोई भी दाग़ उसे लांघ नहीं पाएगा। न आयकर, न सेवाकर, न व्यवसाय कर। बस धर्ममार्ग पर चल और दोनों कर से अर्थ एकत्रित कर। जाओ पुत्र धर्म मार्ग का अनुसरण करो, उसे ही अपना व्यवसाय बनाओ और इस व्यवसाय में 'कॉर्परेट कल्चर' का समावेश करते हुए कुबेर के खज़ाने का निर्भय पूर्वक उपभोग करो।'

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बुधवार, 18 जुलाई, 2007

आलोक पुराणिक का प्रपंचतंत्र : सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का एक और व्यंग्य - “सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी”।


स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।

उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफ़ा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई क़ारोबारी दुकान अपने मुनाफ़े के लिए खोलता है, ना कि कस्टमर के मुनाफ़े के लिए।

सेल्ससत्य का मानना था कि आख़िर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फ़ेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ़ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी ज़िंदगी मुनाफ़े कमाये जा सकते हैं।


पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर

एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये। एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया और वह कस्टमर वापस चला गया।

दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउण्टर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सेल्ससत्य ने कहा – “हेलो, आप कैसे हैं? ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।”
कस्टमर ने कहा – “मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।”
सेल्ससत्य बोला – “ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक ऑप्शन बताऊँ?”
कस्टमर बोला - “क्या?”
सेल्ससत्य बोला - “देखिये, स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लॉञ्च किया है। इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ़्त में दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला - “पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।”
सेल्ससत्य ने कहा - “कोई बात नहीं। यहाँ पर फाँसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा। बाक़ी की फ़ॉर्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी।”

सो साहब, जो कस्टमर सिर्फ़ पेपर सोप ख़रीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला। उधर फाँसू बैंक के सेल्समैन ने भी क़रीब पाँच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।

स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला - “ग्रेट! ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप ख़रीदने वाले को वीसीडी प्लेयर भी चेंप दे।”
इस पर सत्यसेल्स ने कहा - “वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है। इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है। ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डाँटा - “अबे तू मेरा इंप्लाई है या उस कस्टमर का इंपलाई! जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ़ सेल्समैन बनाता हूँ।

शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ़ सेल्स ऑफ़ीसर सेल्ससत्य बोला - “हे मूरख! बेच, सिर्फ़ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी क़ीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य–ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौक़ा-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयाँ बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के पास आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच, कस्टमर की चिंता मत कर।

सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला - “अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।”


एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल

सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद उसके बेटे - फ़ेयरप्राइज़ को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी। पर फ़ेयरप्राइज़ भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था। एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फ़ेयरप्राइज़ की तरफ़ जाकर बोला - “उस वाले मोबाइल की क्या क़ीमत है?”
“दस हजार रुपये, टैक्स अलग – फ़ेयरप्राइज़ ने बताया।”
“उस वाली मोटरसाइकिल की क्या क़ीमत है” - कस्टमर ने पूछा।
“पचपन हज़ार टैक्स एक्स्ट्रा” - फ़ेयरप्राइज़ ने बताया। फ़ेयरप्राइज़ का कस्टमर वापस भाग गया।

दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया। उसे मोबाइल की क़ीमत बतायी गयी - एक रुपया और मोटरसाइकिल की क़ीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत-सा हुआ, तो सेल्ससत्य ने कहा - “पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा – ओके।”

कस्टमर ने लोन के पेपर पर मज़े-मज़े में बिना देखे साइन कर दिये। यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फाँसू बैंक के सेल्समैन ने बताया - “जी आपकी महीने की किश्त चार हज़ार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेज़ों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंज़ूर की है कि अगर आप लोन लेने से इन्कार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फ़ीस और डिफ़ॉल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।”

कस्टमर फंस चुका था, वो बोला - “पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।”
सेल्ससत्य इस पर बोला - “महाराज, मोबाइल की क़ीमत तो एक ही रुपया है। पर 9,999 रुपये उसकी एक्सेसरीज़ के हैं। हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज़ मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ़ दस रुपये की है। पर बाक़ी की रकम हम आफ़्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।”

एक लाख रुपये डिफ़ॉल्ट फ़ीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये। यह पूरा कांड देखकर फ़ेयरप्राइज़ समझ गया और सेल्ससत्य से बोला - “सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा।”

इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएँ मिलती हैं -

1. बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फ़ॉलो करना चाहिए। जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2. समझदार सेल्समैन हेलीकॉप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।

सावधान - आलोक पुराणिक! प्रपंचतंत्र को प्रकाशित करने का अधिकार सिर्फ़ “मस्ती की बस्ती” को है। किसी और ब्लॉग, यहाँ तक कि अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया तो कार्रवाई हो सकती है।

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बुधवार, 11 जुलाई, 2007

मुरली मनोहर श्रीवास्तव का व्यंग्य : गुरु शिष्य दोऊ खड़े काके लागू पाय

मूलतः इलाहाबाद के रहने वाले श्री मुरली मनोहर श्रीवास्तव पेशे से इंजीनियर हैं। व्यंग्य विधा पर उनकी अच्छी पकड़ है और नियमित तौर पर कई अख़बारों में लिखते रहते हैं। श्रीवास्तवजी का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। पेश है “मस्ती की बस्ती” के पाठकों के लिए उनका मज़ेदार व्यंग्य।

यह गद्य अंश उस शोध विद्यार्थी की थीसिस का हिस्सा है, जिसने अभी-अभी आधुनिक शिक्षा मे कबीर की प्रासंगिकता विषय पर डॉक्टरेट प्राप्त की है। वह लिखता है कि कबीर को आज मात्र गुरु और गोविन्द के सन्दर्भ तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। वस्तुत: आज गुरु और गोविन्द की तुलना का कोई अर्थ नहीं रहा, क्योंकि गोविन्द को लोग मात्र एक चमत्कार करने वाले के रूप मे देख उसका मज़ाक उड़ाने लगे हैं। बच्चे भी कहते हैं कि गणेश जी के लिये शीतल पेय ट्राई करें क्या? गर्मी बहुत पड़ रही है, मिल्क का मूड न हो क्या पता? या फिर यदि समुद्र का पानी मीठा हो सकता है, तो मेरे पूजा करने से मेरा होमवर्क भी पूरा हो जायेगा।

ऐसे में गुरु के महत्व की तुलना करने के लिये शिष्य की आवश्यकता है। जैसा की सर्वविदित है, गुरु गुड़ ही रहता है और चेला शक्कर हो जाता है। फिर भी कबीर दास की प्रासंगिकता इसी में है कि वे कहते हैं - भले ही चेला शक्कर हो जाये , गुरु का महत्व कम नहीं होता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिष्य की मांग आज के समाज में गुरु से अधिक है और शिष्य गुरु से महान भी है, परन्तु गुरु के बड़प्पन को नकारा नहीं जा सकता।

जिन्हें शिष्य के महान होने के विषय मे शंका हो, उनके लिये मैं आगे लिखता हूँ कि जिस गुरुकुल मे होनहार शिष्य जाते हैं, पैसे वाले शिष्य जिस गुरु से कोचिङ्ग लेते हैं, वह गुरु अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। कहने को तो शिक्षा का दान दिया जाता है, परन्तु आज के समाज मे दान का महत्व नहीं रह गया है। लोग दान को भिक्षा की तरह समझने लगे हैं। जिसका नतीजा है कि जिन स्कूलों और विद्यालयों में अनुदान के माध्यम से नाम मात्र को फ़ीस लेकर शिक्षा प्रदान की जाती है, वहाँ के विद्यार्थी नेता बनने के अतिरिक्त अपना कोई भविष्य नही देखते और ऐसे में जब कोई गुरु शिष्य के भविष्य से खिलवाड़ करता है, तो शिष्य यह ज़रूर बता देता है कि महान और महत्वपूर्ण वही है गुरु नहीं।

वैसे गुरु को आज के ज़माने में भी कम समझना कभी-कभी भारी पड़ सकता है। जैसा कि अनेक विश्वविद्यालयों में सामने आया है कि ऐसे गुरु शिष्य के सामने अपना महत्व बनाये रखने कि लिये घर-परिवार को तिलांजलि दे कर अपनी शिष्याओं से प्रेमालाप करते हैं और एक तीर से दो शिकार करते हैं। वैसे अनचाहे ही शिकार तो कई हो जाते हैं, जैसे कि गुरु का उद्देश्य मात्र यह दिखाना होता है - हे शिष्य, मैं किसी भी मामले मे तुमसे कम नहीं हूँ और जिस शिष्या के तुम सपने देखते हो वह मेरे प्रेम में पागल है। इसके दो शिकार यह हुये कि शिष्य गुरु को उस सीमित समय के लिये अपने से बड़ा स्वीकार कर लेता है और गुरु को इस प्रसंग से प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ने का आधार मिल जाता है।

तब उसकी किसी ज़माने मे लिखी और खुद के पैसे से छपवायी हुई पुस्तक की मांग बढ़ जाती है। साथ ही लोग उसे साहित्यकार भी स्वीकार करने लगते हैं। उसके लिखे शोध पत्र अनेक सेमीनारों मे पढ़े जाने लगते हैं और अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ाने के लिये इस बखेड़े को मीडिया नये रूप से पेश करता है जैसे - शिक्षक, शिष्या और पत्नी। तब दर्शक यह देखकर रोमांचित हो उठते हैं कि किस तरह एक भारतीय नारी अपने पति के अलौकिक प्रेम में रोड़ा बनते हुये अपनी सौत के बाल खींच-खींच कर पीट रही है।

इस घटना से बहुत से शिष्य इस कलियुग में महान होकर भी गुरु की शरण में आते हैं और कहते हैं - गुरुदेव, मैं आपके अनुभवों के सामने बच्चा हूँ। मेरे लिये अभी यह दो नावों की सवारी का अनुभव अपरिचित है। अरे! दो क्या हम तो एक नाव पर भी सवारी नहीं कर पाये और आपको देख कर लग रहा है कि हमारा विद्यार्थी जीवन नष्ट हो गया । मार-पीट में अव्वल न होने के कारण न तो हम नेता बन पाये और न ही नेता बनने की चाहत रखने के कारण रोमियो। ऐसे में यदि इस वर्ष हमें कॉलेज छोड़ना पड़ा तो इस स्वर्णिम काल की कौन-सी स्मृति मैं जीवन में सहेज कर रख पाऊंगा। सो हे गुरुदेव! मैं भले ही आज साधन-सम्पन्न हूँ और महत्वपूर्ण भी, किन्तु आपकी महानता के आगे हार मानता हूँ।

इस भक्ति पूर्ण वाक्य को सुन कर गुरु का हृदय पिघले बिना नहीं रह पाता और वह अपने शिष्य को ज्ञान का दान देने को तत्पर हो जाता है।

लेकिन भारत देश मे पुराना नियम है, जब तक समस्या में बाहरी हस्तक्षेप न हो मज़ा नहीं आता। तो यह समस्या (कौन सी सम्स्या?) यही गुरु शिष्य में से कौन महान है इस बात का निर्णय करने की। हाँ, तो यह समस्या अपने असली रूप में तब आती है जब गुरु-शिष्य महानता विवाद मे पुराने विद्यार्थी जो यहाँ से कोचिंग ले कर आज स्थापित नेता हो चुके हैं, कूद पड़ते हैं। वे बताते हैं कि हे गुरुदेव, आज यदि आप क्लास मे पढ़ा पा रहे हैं तो यह मेरी बदौलत, यदि इस विद्यालय से आपके परिवार का पालन-पोषण हो रहा है तो हमारे जैसे ही पूर्व विद्यार्थियों के अनुदान की बदौलत। सो आपसे अनुरोध है कि आप अपनी महानता के झूठे आवरण को चुपचाप ओढ़े रहिये और वे जो नये विद्यार्थी कॉलेज मे चुनाव नुमा खेल खेल रहे हैं, उन्हें खेलने दीजिये।

असली घपला यही होता है, वस्तुत: गुरु अपने आपको हर क्षेत्र मे महान समझता है और वह शिष्य के इस राजनीतिक चैलेंज को समझ नहीं पाता। वह रोमांस की तरह उस राजनीति में भी चुनौती देने का प्रयास करता है और मात खा जाता है।

आगे यह विद्यार्थी लिखता है कि अभी वह यह फ़ैसला नहीं कर पाया है कि गुरु और शिष्य साथ-साथ खड़े हों तो वह किसके पांव पहले छूये और यही इस शोध-ग्रन्थ की सफलता का राज़ भी है। क्योंकि उसे लग रहा है कि इस शोध के बाद वह महान साहित्यकार की श्रेणी मे आ जायेगा और पूरे राष्ट्र में इस विषय पर नयी बहस छिड़ जायेगी, जिसके केन्द्र में वही रहने वाला है। आप तो जानते ही हैं आजकल किसी भी क्षेत्र मे विवादित बने रहना कुछ पूरा कर दिखाने से ज़्यादा फ़ायदेमन्द है। सो जब तक यह गुरु-शिष्य विवाद चलेगा, मेरा अस्तित्व बना रहेगा। मैं इस शोध विद्यार्थी को एक सफल शोधकर्ता की उपाधि देना चाहता हूँ, आगे जैसा आप चाहें।

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मंगलवार, 3 जुलाई, 2007

अरुण अरोड़ा के व्यंग्यात्मक दोहे

फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा एक बार फिर हाज़िर हैं "मस्ती की बस्ती" में। इस बार वे सुना रहे हैं गुरू पर दोहे, लेकिन ज़रा नए अन्दाज़ में। आप भी इन दोहों का मज़ा लीजिए:

१.
गुरु गोविंद दोनो खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने कुर्सी दई दिवाय॥

भावार्थ:- असमंजस मे पडा चेले के सामने सतगुरु और भगवान दोनो खडे है, चेला दुविधा में है कि मै पहले किसके पाँव पड़ूँ।
हे गुरु! मै आप पर बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे कुर्सी दिलादी।
अर्थात् जो काम आये वही बडा है

२. बलिहारी गुरु आपने दिखा दियो जो बार।
दो पगन के लगत ही दिखन लगत है चार॥

भावार्थ:- कलियुगी सतगुरु आपने चेले को बार दिखा कर जीवन सफल कर दिया है, जहाँ दो पैग लगाते ही चार दिखाई देने लगते है।
अर्थात् सच्चा गुरु वही है जो मस्त रहना सिखाए।

३. संसद मंज़िल गुंडई नाव है बाक़ी सब बेकार।
जिस दिन तुम पा जाओगे, सारे दुखडे पार॥

भावार्थ:- प्रिय चेले, नाव रूपी तेरी गुंडागिरी ही तुझे संसद रूपी मंज़िल तक ले जायेगी। बाक़ी सब कुछ मिथ्या है। जिस दिन तुम अपनी मंज़िल पर पहुँच जाओगे, सारे दुःख और पाप समाप्त हो जायेंगे।
अर्थात् मंज़िल तक पहुँचना ही मुख्य उद्देश्य होना चाहिये, चाहे मार्ग कैसा भी हो।

४. गुरु सारे माल समेटिये, चेले को बस नाम।
मन राखि संतोषिये, घूम फिरत सब गाम॥

भावार्थ:- कलयुगी सतगुरु ने मुझे अपना नाम देकर सारा माल समेट लिया है। अब मैं मन में संतोष लिये गाँव-गाँव भटकता फिर रहा हूँ।
अर्थात् गुरु माल समेटे उस से पहले आप गुरु का माल समेट कर कल्टी हो लो, यही सत्य है।

५. सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
जब तक माल बटोरो, कियो प्रेम व्यवहार॥
माया सारी निखस गई, दियो सरक पे डार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार॥

भावार्थ:- अन्त नहीं है कलयुग के सतगुरु की महिमा का, अन्त नहीं है उनके द्वारा किये गये उपकारों का। जब तक खीसे मे माल था, गुरुदेव ने अत्यंत प्रेम पूर्वक व्यवहार किया, पर जब मैं माया से मुक्त हो गया, मुझे सड़क पर डाल दिया।
गुरु के इस कार्य ने मेरे लोचन अर्थात् नेत्र खोल दिये, जिससे मैं अब निरंतर अनंत देख पा रहा हूँ।
अर्थात् मुझ निपट अज्ञानी को गुरु ने ज्ञान देकर गुरु बनाने की बहुत कोशिश की पर मेरी अज्ञानता को अब गुरु ने दूर कर दिया है।

६. अच्छा सतगुरु मिल गया अच्छी मिल गई सीख।
गुरु तो खावै माल पुये, मैं घर-घर मांगू भीख॥

भावार्थ:- मुझे अच्छा सतगुरु मिल गया, अच्छी सीख भी मिल गई। अब मैं चिंताओ से मुक्त होकर घर-घर भीख मांगता हूँ और सतगुरु माल पुये खाते हैं।
अर्थात् चेले से गुरु बनना ज़्यादा सुखदाई है।

७. जा तन विष की बेलरी, नोट है सुख की खान।
सिर फोड़े जो नोट मिले तो भी ससता जान॥

भावार्थ:- यह तन नश्वर है, संसार असार है, बस नोट ही सुख देने वाले हैं – इस मिथ्या जगत में, अगर किसी का सिर फोड़कर भी नोटों की प्राप्ति होती है तो वह सस्ती है। क्योंकि नोट होने से तू हर पाप से मुक्ती का मार्ग निकाल सकता है।
अर्थात् इस मिथ्या संसार मे नोट से बढ़कर कुछ नहीं।

८. अब तो तू अधिकारी है लूट सके जो लूट।
रिटायर्मेंट के बाद में नसीब ना होगी फूट॥

भावार्थ:- अभी तू सरकारी अधिकारी है, जो माल बना सकता हो बना। रिटायर होने के बाद तुझे फूट (खरीफ़ की फ़सल में मक्का के साथ मे होने वाला एक छोटा-सा फल) भी खाने को नहीं मिलेगी।
अर्थात् आज और अभी माल बना, कल की योजना मत सोच।

९. कबिरा बास रिझाइ ले मुख अमृत गुण गाय।
मार्च माह है सर पर, कहीं प्रमोशन ना रह जाय॥

भावार्थ:- कबीर दास कहते हैं मुख मे अमृत जैसी मीठी वाणी लेकर बॉस के गुण गाने का समय है। मार्च का महीना चल रहा है, कहीं प्रमोशन ना रह जाय।
अर्थात् काम चाहे मत करो, पर बॉस को मक्खन लगाना मत भूलो

१०. कबिरा नोट ख़र्च करो, गिफ़्ट लो एक मंगाय।
वापे बोस को नाय लिखो, उसे घर पे दे के आय॥

भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कुछ पैसा ख़र्च कर एक अच्छा सा गिफ़्ट मंगा कर बास के घर जाकर खुद देकर आओ।
अर्थात् बॉस को ख़ुश करने का कोई मौक़ा मार्च माह में हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।

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रविवार, 1 जुलाई, 2007

प्रियरंजन झा का व्यंग्य : भगवान के बूते से बाहर

बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है - लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन बता रहे हैं क्या है भगवान के बूते से भी बाहर।

मैंने ख़बर पढ़ी कि हूजी के आतंकी साधु के भेष में देश में गड़बड़ी फैलाने आए हैं। ऐसे में आजकल हमारी हालत ख़राब रहती है। साधु के भेष में अब मुझे सब असाधु ही नज़र आते हैं। एक साधु जैसे दिखने वाले आदमी से मैंने पूछा, 'आप साधु के भेष में हूजीके आतंकी तो नहीं?' उसने कहा, 'लगता है बच्चा, तुम मृग मरीचिका के शिकार हो, इसलिए साधुको असाधु समझ रहे हो। वैसे, ग़लती तुम्हारी भी नहीं है। इस देश की हवा में ही भांग घुली हुई है, इसलिए सब कुछ उल्टा हो रहा है। लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि तुम परेशान क्यों हो रहे हो? जा करके जनता से पूछो, सब आनंद से हैं। बस एक तुम्हारे ही पेट में दर्द हो रहा है! हूजी...हूँ...।'

हमने सोचा, चलो जनता के आनंद का पता लगाया जाए। हम यूपी गए। वहाँ एक आदमी से पूछा, 'बहनजी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता रहा है, आप लोगों ने बावजूद इसके उनको मुख्यमंत्री बना दिया?' वह बिगड़ गया। उल्टे मुझसे से पूछने लगा, 'आप ऊँची जाति के हैं क्या? ... तभी यह आरोप लगा रहे हैं। पचास साल तक ऊँची जाति ने देश को खाया, तब तो आप लोगों के पेट में कभी दर्द नहीं हुआ, अब बहनजी की संपत्ति देखकर क्यों हो रहा है?'

उसे उलझते देख मेरे एक दोस्त ने मुझे समझाया, 'कहाँ परेशान हो रहे हो? नेताजी को कोसने की बजाय उनसे सीख लो। शेयर में पैसा इन्वेस्ट करने की बजाय नेतागिरी में इन्वेस्ट करो। जन्म सफल हो जाएगा!'

ख़ैर, अरबपति नेता से प्रभावित हुए बिना हम बहुचर्चित डिफॉल्टर नेता के बारे में जानने के लिए एक दूसरे नेता के पास पहुंचे। मैंने पूछा, 'आप लोगों ने एक डिफॉल्टर को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना दिया है?' वह कुछ ज़्यादा ही गर्म हो गया, 'डिफॉल्टर तो हर कोई है। जो नेता बन गया, समझो डिफॉल्टर हो गया या फिर यह भी कह सकते हो कि डिफॉल्टर ही इस देश में नेता बन सकता है। अगर इतना क़ानूनची बनोगे, तो विदेश से नेता आयात करना पड़ेगा!'

लेकिन मुझे तो देसी नेता ही चाहिए, इसलिए मैं पहुँचा शिवसेना के ऑफ़िस। मैंने वहाँ बैठे एक कार्यकर्ता से पूछा, 'आप लोग हिंदुत्व की पॉलिटिक्स करते हैं, लेकिन अब मराठी के नाम पर पाटिल का समर्थन...? राजस्थानी हिंदू में क्या खोट है? आख़िर आप लोग कितने छोटे-छोटे टुकड़ों में लोगों को बांटकर राजनीति कर सकते हैं?' जवाब मिला, 'हमारे पार्टी प्रमुख इतने मंझे हुए नेता हैं कि एक आदमी पर भी राजनीति कर सकते हैं, यहाँ तो मामला अरब की जनसंख्या को करोड़ में ही बांटने का है! वैसे, आपको दिक़्क़त क्या है? कोई मराठा राष्ट्रपति बने, ये तो हमारा गौरव होगा।'

हिंदुत्व की बात चलते ही हमको फिर से हूजी याद आ गया। हमने फिर से एक दाढ़ी वाले व्यक्ति से पूछा, 'कहा जा रहा है कि आपके ही स्कूल में आतंकी सब आकर रुकते हैं।' वह कहने लगा, 'तो इसमें गड़बड़ क्या है? आप हिंदू हैं क्या? ...इसीलिए ऐसे कह रहे हैं। इस देश में जितना गड़बड़ होता है, सब के लिए हम ही तो दोषी होते हैं। नक्सली इतना कुछ करते हैं, उस पर तो आप लोग किसीको कुछ नहीं कहते, उनके समर्थक तो आपके देश में सत्ता में साझीदार हैं... उनका वर्ग संघर्ष है, तो हमारी भी धर्म की लड़ाई है। आप ख़ामख़ा परेशान हो रहे हैं। जाइए, आराम से घर में सोइए। चिंता से चतुराई घटती है और चतुराई घट गई, तो चतुर सुजानों के इस देश में आप चिंता करने लायक़ भी नहीं बचेंगे। अरबपति नेता, डिफॉल्टर नेता, साम्प्रदायिक नेता या हूजीको यहाँ आने से रोकना तो ख़ैर भगवान के बूते से भी बाहर की बात है!'

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गुरुवार, 28 जून, 2007

प्रपंचतंत्र : ऐबों के सुपरिणाम की कहानी

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का व्यंग्य - "ऐबों के सुपरिणाम की कहानी"।



जंगलपुरम् नाम शहर में तमाम कंपनियों के हेडक्वार्टर थे। हेडक्वार्टर में होता यह था जो कि भी अपने बास को क्वार्टर पहुंचाया करता था, वह हेड हो जाया करता था। इस तरह से कई बंदे प्रोग्रेस की राह पर आगे बढ़ रहे थे।

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में शेर सिंह नाम का बास था, उसके दो जूनियर थे। एक का नाम था सियार सिंह और दूसरे का नाम था टाइगरप्रसाद। टाइगरप्रसाद दूर के रिश्ते के हिसाब से शेर सिंह का रिश्तेदार लगता था। टाइगरप्रसाद अपने नाम के अनुरुप गुणों से युक्त था। वह हमेशा सच बोलता था। वह सिगरेट, शऱाब से परहेज करता था। कैबरे-डिस्को से दूर रहता था। और तो और, वह झूठ तक नहीं बोलता था।

सियार सिंह मौके की नजाकत समझता था और तदनुरुप आचरण करता था। दो अक्तूबर यानी गांधी जयंती वाले दिन वह सत्य और नैतिकता पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार पाया करता था। पर इस पुरस्कार से प्राप्त राशि से वह निर्णायकों को क्वार्टर या अद्धा पिलाया करता था। इस तरह से जब सत्य में फायदा होता था, तो वह सत्य–सत्य करने लगता था। जब उसे लगता था कि फायदा अन्य गतिविधियों में है, तो वह अन्य गतिविधियों पर उतर जाता था।

उसका मानना था कि गतिशीलता में ही जीवन है। सवाल सत्संग का नहीं है, सवाल कुसंग का नहीं है। सवाल फायदे के संग का है। सियार सिंह ने तमाम संतों के प्रवचन स्थलों पर कैसेटों-किताबों के स्टाल लगाकर भी कमाया था और दारु की ब्लेक करके भी कमाया था। सियार सिंह कैबरे के ठिकानों को भी जानता था और यह भी जानता था कि शहर के श्रेष्ठ मंदिर कहां पर है। इस तरह से चौतरफा कार्रवाई करके वह प्रसन्न रहा करता था।

टाइगरप्रसाद का मामला एकतरफा था। वह सिर्फ और सिर्फ सत्य नैतिकता की बात करता था और अपने बास शेर सिंह को भी इसी तरह की बातें बताया करता था। शेर सिंह टाइगरप्रसाद से थोड़ा खुटका वैसे भी खाया करते थे क्योंकि वह जानते थे कि रिश्तेदारों से भले की उम्मीद कुछ इस तरह की है, जैसे गंजों के मुहल्ले में कोई कंघे की दुकान से मुनाफा कमाने की उम्मीद करे।

खैर, साहब कंपनी बहुराष्ट्रीय थी। रुस और ब्रिटेन नामक देशों से दो प्रतिनिधिमंडल आये। दोनों के हाथों में करोड़ों के आर्डर थे। शेर सिंह ने एक डेलीगेशन को मैनेज करने का जिम्मा टाइगर प्रसाद को सौंपा और दूसरे को मैनेज करने का जिम्मा सियार सिंह को सौंपा।

रुस वाले प्रतिनिधिमंडल को भारतीयता से परिचित कराने के उद्देश्य से टाइगरप्रसाद ने दिन में उन्हे तमाम मंदिरों का दौरा कराया और शाम को उन्हे वो कीर्तन में ले गया।
अगले दिन रुस वालों को टाइगरप्रसाद एक लोकल बाबा के प्रवचन सुनवाने ले गया। रुस वाले बोर हो गये और तीन दिन में टाइगर प्रसाद की कंपनी से फूट लिये और फिर कभी नहीं पलटे।

उधर सियार सिंह ने किया यह कि दिन में तो उसने ब्रिटेन वालों को मंदिर दिखाये। पर शाम होते होते सियार सिंह ने विदेशी अफसरों से कहा - भारतीय संस्कृति समग्रता की संस्कृति है। इसमें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की बात हमारी संस्कृति करती है। इसलिए धर्म के बाद काम और अर्थ की बात करनी भी जरुरी है। अंगरेज समझ नहीं पाये। सियार सिंह फिर अंगरेज अफसरों को एक डिस्को में ले गया, जहां बहुत ही शानदार कैबरे नृत्य हो रहे थे। अंगरेज बम बम हो गये। फिर अति ही सुंदर सुरा अंगरेज अफसरों को पेश की गयी। अंगरेज अफसर घबराये, बोले, इट इज रांग।

सियार सिंह बोले - देखिये गलत बात तब होती, जब यह शऱाब होती। ना, यह तो अमृततुल्य प्रसाद है। भारत में कई देवताओं को इसे बतौर प्रसाद चढ़ाया जाता है और हमारे यहां कहा जाता है, अतिथि देवो भव। अर्थात अतिथि देवता होता है। आप हमारे देवता है, आपको अगर हमने यह प्रसाद नहीं चढ़ाया, तो हम पर पाप लगेगा। इस पाप का भागी होने से बेहतर है कि होटल की पांचवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर लूं। मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं क्योंकि मुझे आप मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं -ऐसा कहता हुआ सियारसिंह छत की सीढ़ियों की ओर लपका।

अंगरेज अफसरों ने घबराकर उसे रोका और फिर अंगरेज दारु गटक गये। तत्पश्चात सियार सिंह ने कहा अर्थ को हमारे यहां बहुत बड़ा पुरुषार्थ माना गया है, इसलिए आपको पचास हजार रुपये का अर्थ पेशगी मंजूर करना पड़ेगा, बाकी का दस परसेंट हम आपको आर्डर मिलने के बाद दे देंगे। प्लीज अर्थ को स्वीकार कर लीजिये। वरना इसका मतलब होगा कि आप मुझे मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं - सियार सिंह ने फिर कहा। इस बार एक अंगरेज अफसर अपराध भावना से भरकर बोला - बट यह तो रिश्वत है।

“नहीं यह रिश्वत नहीं है, यह तो पुरुषार्थ है जो आप कर रहे हैं। अर्थ का पुरुषार्थ। पैसा हाथ का मैल है। समझिये कि हम अपना मैल आपको दे रहे हैं। आप तो हमें कृतार्थ कर रहे है कि हम से मैल स्वीकार कर रहे हैं। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मैं समझूंगा कि आप हमे अपने धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं” - सियारसिंह ने कहा। अंगरेज धर्म का पालन करने पर विवश हो गये।

अंगरेज अफसरों ने वापस जाते ही पचास करोड़ के आर्डर दिलवाये। रुसी अफसरों ने वापस जाते ही शेर सिंह को डांटा कि आपने जो आदमी हमें मैनेज करने के लिए रखा था, वह बहुत ही बोरिंग था। सिर्फ सत्य, नैतिकता की बातें करता था।

शेर सिंह ने टाइगरप्रसाद को नौकरी से डिसमिस कर दिया और सियार सिंह का प्रमोशन हो गया। तत्पश्चात इंस्टीट्यूट आफ बिजनेस ग्रोथ में रिश्वत देने के तरीके-विषय भाषण देते हुए सियार सिंह ने कहा -

1- सवाल सत्संग या कुसंग के बीच चुनने का नहीं है। सच यह है कि सत्संग से नोट मिलें, तो सत्संग करना चाहिए और कुसंग से नोट मिलें, तो कुंसंग कर लेना चाहिए। असली सवाल नोटों के संग का है।
2- रिश्वत को रिश्वत की तरह से नहीं देना चाहिए। उसे इस तरह से देना चाहिए मानो आप अपने धर्म का पालन कर रहे हैं और लेने वाला स्वीकार करके अपने धर्म का पालन कर रहा है।
3- तमाम किस्म के ऐबों को फिलोसोफिकल जाम पहना दिया जाये, तो मामला बहुत आसान हो जाता है।
4- बदमाश किस्म के अफसर सिर्फ इंडिया में ही नहीं होते, रुस और ब्रिटेन में भी पाये जाते हैं।

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सोमवार, 25 जून, 2007

विष्णु शर्मा का व्यंग्य : हर सड़क कुछ कहती है

विष्णु शर्मा – पंचतंत्र नहीं, बॉलीवुड तंत्र की उठापटक में लगे रहे हैं। बैग टेलीफ़िल्म्स के कार्यक्रम ‘ख़बरें बॉलीवुड की’ के प्रोड्यूसर हैं। हाल तक, स्टार न्यूज़ के पोल-खोल कार्यक्रम में भी अदृश्य तौर पर योगदान देते रहते थे। लेख कई लिखे, पर व्यंग्य इक्का-दुक्का ही लिखे हैं। “मस्ती की बस्ती” के लिए फिर व्यंग्य के मैदान में।

बुझे-बुझे से रहते हो कहो ध्यान किसका है,
पुरानी सड़क पर ये नया मकान किसका है?

आपको भी यह शेर अनचाहे ही हज़ारों बार झेलना पड़ा होगा। लेकिन मेरा सॉलिड दावा है कि मेरी तरह किसी ने इतना निठल्ला-चिंतन नहीं किया होगा। बहुतों से सुना था कि दिल में भी सड़क होती है। लेकिन इस शेर में किस सड़क और किस मकान की बात हो रही है, खुद शायर को भी नहीं पता होगा। बिलकुल वैसे जैसे आपको नहीं पता कि सड़क के कितने टाइप होते हैं। अब आप किसी ग्राम प्रधान की तरह इसे खडंजा और पडजा में डिवाइड मत कीजिएगा और न ही किसी ठेकेदार की तरह चार लैन और छह लैन में। हम तो सड़क को इमोशनली डिवाइड कर रहे हैं। मसलन कुछ सड़कें पूंजीवादी होती हैं। पूंजीवादी बोले तो उस शहर की सड़कें, जहाँ या तो बहुत-सी आईटी कंपनियाँ होती हैं या फिर जो सड़कें किसी बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी के किसी प्रोजेक्ट को बाक़ी शहर से जोड़ती हैं। ढेर सारी पूंजी जो लगी होती है। पूंजी तरलता यानी चिकनाई लाती है, सो ये सड़कें भी काफ़ी चिकनी बनी होती हैं। यानी टोटली खुरदुराहट फ़्री। ऐसे ही कुछ सड़कें घोर वामपंथी भी होती हैं, हम नहीं सुधरेंगे टाइप। पूंजी पसंद ही नहीं। वैसे कोई देता भी नहीं। किसी ने पैसा लगाकर थोड़ी-बहुत डेंटिंग-पेंटिंग करवा भी दी तो ऐसा लगता है मानो सड़क को ही पसंद नहीं आता, रात को करवटें बदल-बदल कर माक्र्सवादी सिद्धांतों की तरफ़ वापस लौट आती है। शायद चाहती है उस पर चलने वाले जितने ज़्यादा कष्ट भोगेंगे, उतने ही मज़बूत बनेंगे। यहीं पहली बार लगता है कि सर्वहारा के सिद्धांत से डार्विन का भी कुछ लेना देना था शायद।

जबकि कुछ सडकें संघी टाइप की होती हैं। दूर से बहुत लुभावनी होती हैं, एकदम चिकनी चौड़ी, आदर्शवादी – लेकिन स्पीड ब्रेकर इतने ज़बरदस्त होते हैं कि तौबा-तौबा। यूँ तो कॉलेज के लड़कों को स्पीड ब्रेकर ख़ासे पसंद होते हैं, लड़की पीछे बैठी हो तो हर स्पीड ब्रेकर पर झटके लेने का कुछ और ही मज़ा है। लेकिन संघी सड़कों पर स्पीड ब्रेकर इतने ऊँचे होते हैं कि लड़कियों को गाड़ी से उतरकर चलना ही मुफ़ीद लगता है। सो इन जोड़ों को संघी सड़कों से ख़ासी ऐलर्जी होती है। वैसे कुछ सड़कें सेकुलर टाइप की भी होती हैं, बोले तो किसी के लिए कोई मनाही नहीं। रिक्शे वाले भी सड़क के बीचों-बीच चलेंगे। दिन में भी ट्रक और बसें एलाउड हैं, गाड़ी के साइज़, स्पीड और लैन का तो कोई दूर-दूर तक भेद-भाव नहीं। अब ये आपकी किस्मत है कि गुड़ लेकर जा रही कोई बैलगाड़ी या भूसा लेकर जा रहा कोई ट्रैक्टर इतनी जगह घेर कर चले कि आपको साइड ही नहीं मिले। सारे लोग इस सड़क पर एक-दूसरे को गाली तो देते हैं, लेकिन सड़क को कभी नहीं। बाइक वाला टैम्पो वाले को, टैम्पोवाला रिक्शे वाले को, रिक्शा वाला कार वाले को और कार वाला ट्रक वाले को – लेकिन सड़क के सेकुलर करेक्टर पर कोई उंगली नहीं उठाता। वैसे कुछ सड़कें बुद्धिजीवी किस्म की भी होती हैं। आप कई बार कुछ सड़कों को देखकर सोचते होंगे कि ये ऐसे क्यों बनी हैं, इसकी बजाय वैसे बनी होतीं तो बेहतर होता। इसमें मोड़ यहाँ की बजाय थोड़ा पहले दे दिया गया होता तो ज़्यादा अच्छा होता। इसमें बीच में यू-टर्न आधा किलोमीटर दूर नहीं बनाया गया होता तो और भी अच्छा होता। यानी जो सड़कें आपको सोचने पर मजबूर कर देती हैं, बुद्धि पर ज़ोर डालने पर मजबूर कर देती हैं, वो बुद्धिजीवी किस्म की सड़कें होती हैं।

सड़कें अपनी हैसियत, उम्र और जन्म-स्थान आदि के हिसाब से भी डिफ़ाइन की जाती सकती हैं। बशर्ते मल्लिका शेरावत की तरह अपने नाम, उम्र इत्यादि में हेरा-फ़ेरी न करें। लेकिन सड़कों का नामकरण तो प्रजाति के आधार पर भी होता है। जैसे ‘दगड़ा’ या ‘दगरा’। आप इसे ‘डगर’ का अपभ्रंश रूप मान सकते हैं। दगरा वैसे दर्रे के काफ़ी निकट लगता है और दल्ले के भी। जैसे नेताओं के पीए या सेकेटरी या फिर दल्ले बाईपास रास्ते से आपको सीधे नेताजी तक पहुँचा देते हैं। वैसे ही दगरे गाँव या पोखर तक पहुँचने का बाईपास होते हैं। लेकिन ‘गैल’ शब्द थोड़ा व्यापक अर्थ लिए होता है। जैसे घूंसे को डुक्का बनाने के लिए उंगलियों के बीच में से अंगूठा निकालकर थोडा सोफ़िस्टीकेटेड लेकिन ज़्यादा मारक और असरदार बना दिया जाता है, वैसे ही जब हम ‘गैल’ की बात करते हैं तो दगरा, पीए या दल्ले की बजाय व्यापक अर्थ में पीआर कंपनी जैसा हो जाता है यानी एक बड़ी सोसायटी के लिए मैक्ज़िमम स्वीकार्य रूप। ये अलग बात है कि जहाँ ‘दगरे’ में पुरूष प्रधान खुरदुरा भाव नज़र आता है, वहीं ‘गैल’ में कर्णप्रिय स्त्रीत्व कोमलता होती है। बिलकुल ‘पगडंडी’ की तरह। साहित्यकारों ने ‘पगडंडी’ और फ़िल्मकारों ने ‘सड़क’ व ‘गलियों’ जैसे शब्दों को शायद उनके स्त्रीलिंग के चलते ही अपनाया होगा। लेकिन जब भी उनको रेस्पेक्ट देने का भाव मन में आता है, नेता लोग सड़क को ‘मार्ग’ कहने लगते हैं – बाबा साहब मार्ग, महात्मा गांधी मार्ग, बहादुर शाह जफ़र मार्ग। लेकिन अंगरेज़ लोग उसे सैक्सी नज़रों से देखते आए हैं, सो उसे ‘रोड’ का नाम दिया। कर्जन रोड, अक़बर रोड आदि। अगर कभी ‘वे’ भी कहते हैं तो उसमें निहित उपेक्षा या दूरी का भाव साफ़ दिखता है, चार ख़ूबसूरत इंटर्न लड़कियों के बीच एक बेचारे लड़के इंटर्न की तरह।

फ़िगर और शील के नज़रिए से भी सड़कों को देखा जा सकता है। आप गाँव की पतली पगडंडी को देखिए, जिस पर केवल साइकिल या स्कूटर ही चल सकता हो, बिलकुल बेदाग़ नज़र आएगी। बीच में ऐसा टर्न लेगी मानो किसी हसीना की कमर में बल पड़ गए हों। उसके किनारे खड़े सरकंडे ऐसे नज़र आते हैं मानो “इस ख़ूबसूरत लड़की को कोई और न देख-छेड़ ले” की मानसिकता वाले मोहल्ले के स्वंयभू कमसिन लौंडे लपाड़े हों। लेकिन दगरे का फ़िगर हमेशा बुलट पर सवार किसी सरपंच के छोकरे की तरह नज़र आता है, स्पीड कम लेकिन रूकावट फ़्री। ‘बुलट चले तो दुनिया रास्ता दे’ के मूलमंत्र के साथ। जबकि छोटे शहरों की सड़कें तो वहाँ की लड़कियों की तरह ही होती हैं, जब तक शादी नहीं हो जाती है, बस-स्टैंड के पान वाले से लेकर मिश्रा जी और उनके नाती के गैंग तक, सबकी नज़रों में छाई रहती हैं। लेकिन बहुत ही अल्पावधि सरकार की तरह जल्द ही शहीद हो जाती हैं और मार्केट से लापता। छोड़ जाती हैं अपनी यादों के निशान। तो बड़े शहर की ज़्यादातर सड़कें मल्लिका शेरावत और राखी सावंत की तरह नज़र आती हैं – चिकनी, चौड़ी, मादक और हरदम मानो इन्वीटेशन कार्ड देती हुईं। ज़रा-सी टूट-फूट हुई नहीं कि हफ़्ते भर के अंदर डेंट-पेंट। आजकल तो वैसे भी बड़े शहरों में नाक सीधी करने से लेकर झुर्रियाँ मिटाने के बर्टोक्स इंजेक्शन तक मौजूद हैं। बस जेब में नावाँ होना चाहिए। शहर की सड़कों पर तो वैसे भी नावें की कमी नहीं। इधर मेकओवर में लोगों के कमीशन भी फ़िक्स हैं – सो टेंशन ही नहीं। एक ख़ास बात और है। सभी पार्टियों के नेता लोग बड़े शहरों में ही रहते हैं। सो महानगरीय सड़कों के मेकओवर पर क्या वामपंथी और क्या संघी, सबकी आम सहमति है। हर फ़िल्म में आइटम गर्ल या आइटम डांस वैसे भी ज़रूरी बन गए हैं। इससे किसी को भी असहमति नहीं। अब तक आप भी सहमत हो गए होंगे कि हर सड़क कुछ कहती है।

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शुक्रवार, 22 जून, 2007

राकेश कायस्थ का व्यंग्य : साधु भूखा भाव का

वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के नज़रिए और बोलने के अंदाज़ में ही व्यंग्य है - लिहाज़ा उनका व्यंग्य लिखने का अपना अलग अंदाज़ है। अमर उजाला से लेकर दैनिक ट्रिब्यून तक कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उनके १५० से ज़्यादा व्यंग्य प्रकाशित हो चुके हैं। व्यंग्य की किताब जल्द बाज़ार में आने को है।

कॉलबेल की आवाज़ इतनी कर्कश थी कि बिस्तर से उठकर सीधा दरवाज़े की तरफ भागा। दरवाज़ा खोला तो सामने धर्म साक्षात खड़ा था। दैवदीप्तिमान व्यक्तित्व, ललाट पर त्रिपुंड, एक हाथ में कमंडल, दूसरे में मोबाइल और साथ चंदे की रसीद। पल भर को लगा कि गलती से चैनल तो नहीं बदल गया और एफटीवी की जगह संस्कार लग गया। दरअसल रात को एफटीवी देखते ही आंख लगी थी। ` साधु महाराज द्वार पर खड़े हैं और तुम अभी तक शयन कर रहे हो, जागो बच्चा, अपने कर्तव्य का निर्वाह करो।`

बाबाजी के आदेश से तंद्रा टूटी, जानना चाहा, धर्म-कर्म से रहित व्यक्ति की कोठरी में आने का कष्ट कैसे किया। बाबाजी ने कहा कि कारण विशेष है,लेकिन साधु महाराज पहले जलपान करेंगे, प्रयोजन बाद में बताएंगे। मैंने कहा- इस तुच्छ प्राणी की कुटिया में कुछ भी ऐसा नहीं कि बाबाजी भोग लगा सके। बाबाजी हंसकर शुभ वचन बोले— साधु तो भाव का भूखा होता है, बच्चा प्रेम से जो दे देगा, वही भोग लगा लेंगे।

अनजाने में बाबाजी ने मुझे सूत्र वाक्य दे दिया। सचमुच सारे साधु भाव के ही भूखे होते हैं। भाव ना मिले तो दुर्वासा हो जाते हैं। आडवाणी जी ने भाव नहीं दिया विश्व हिंदू परिषद के सारे साधु कमंडल का जल छिड़कने दौड़े। संघ के महात्माओं ने भी यही कहा कि अगर साधु संतों को भाव नहीं दिया तो बेभाव की ही पड़ेगी। थके-हारे आडवाणी जी वानप्रस्थ की तैयारी करने लगे। एनडीए का राज बदला, लेकिन भाव के भूखे साधु का क्रोध कम नहीं हुआ। नई सरकार में आरजेडी के आठ-आठ मंत्री बने, लेकिन साधु इस बात पर बिलखते रहे कि उनका नंबर नहीं आया।

.. निठल्ले चिंतन में मैं यह भूल ही गया था कि द्वार पर सचमुच के साधु महाराज बैठे हैं। बियर की बोतलें करीने से हटाने के बाद मैंने पूछा—मैगी खाएंगे क्या, मैं पिछले तीन दिन से यही खा रहा हूं। बाबाजी ने स्वीकृति में सिर हिलाया और मैं दो मिनट में मैगी बना लाया। भाव के भूखे साधु महाराज सचमुच के भी भूखे थे। विजातीय भोज्य पदार्थ पर टूट पड़े। जलपान समाप्त करके प्रयोजन बताया—चौराहे पर जो नया मंदिर बना है, उसकी प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसी के लिए सहयोग चाहिए। प्राण प्रतिष्ठा क्या होती है?`देवताओं का आह्ववान किया जाएगा, देवता आएंगे और प्रतिमाओं में प्रतिष्ठित हो जाएंगे`। साधु महाराज ने प्रकाश डाला। लेकिन मैं तो मनुष्य हूं, मैं क्या सहयोग कर सकता हूं? बहुत दिमाग़ दौड़ाने के बाद लगा शायद साधु महाराज प्राणी मात्र में ईश्वर को देखते हैं, शायद इसी लिए मेरे पास आये हैं। कलयुग में ऐसे महात्मा मिलते ही कहां हैं। धन्य हो साधु महाराज।

बाबाजी की महानता पर मन ही मन मुदित हो रहा था कि उन्होने बताया- सहयोग तुम्हे भंडारे और छज्जू चौबे एंड पार्टी की भजन संध्या के लिए करना है। कुछ समझ पाता इससे पहले बाबाजी ने चंदे की रसीद निकाली और 1100 रुपये लिख डाले। ` लेकिन बाबाजी यह रकम तो मेरे कमरे के किराये जितनी है।`

` अच्छा चलो 501 ही दे दो।` भाव का भूखा साधु मोल भाव पर आ गया।

`लेकिन बाबाजी इतने पैसे अगर आपको दे दिये, तो बिजली का बिल कहां से दूंगा, मोबाइल कैसे रिचार्ज कराउंगा।`

भोग विलास के लिए धन है, लेकिन धर्म के लिए नहीं। इसलिए तो हिंदू समाज का पतन हो रहा है। ठीक है, 201 रुपये ही दे दो।

बस का किराया कहां से चुकाउंगा, आपके जैसे महात्मा आ गये उन्हें क्या खिलाउंगा। साधु द्वार से भूखा जाएगा, तो पाप का भागी मैं ही बनूंगा ना। मैंने कातर होकर कहा। फिर अत्यंत श्रद्धा से 21 रुपये निकालकर बाबाजी के कर कमलों में रखे और दोनों हाथ जोड़ दिये—बस इतना ही सामर्थ्य महाराज। बाबाजी ने आग्नेय नेत्रों से देखा और बोले- तो यही है, तुम्हारी आस्था। डेढ़ घंटे ख़राब करके 21 रुपये दे रहो हो, पहले मालूम होता कि इतने कृपण हो, तो आता ही नहीं। बाबाजी का रौद्र रूप देखकर लगा कि मुझ जैसे कड़के की भेंट कतई स्वीकार नहीं करेंगे। दुखी मन से 21 रुपये वापस लेने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन भाव के भूखे साधु ने क्रोध से मुट्ठी बंद कर ली और इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता कमंडल थामकर मेरी गली पार कर गया।

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