Tuesday, November 29, 2005

सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी
आलोक पुराणिक
स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।
उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई कारोबारी दुकान अपने मुनाफे के लिए खोलता है ना कि कस्टमर के मुनाफे के लिए।
सेल्ससत्य का मानना था कि आखिर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी जिंदगी मुनाफे कमाये जा सकते हैं।
पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर
एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये।
एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया, और वह कस्टमर वापस चला गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सत्यसोप ने कहा-हेलो, आप कैसे हैं। ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।
कस्टमर ने कहा-मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।
सेल्ससत्य बोला-ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक आप्शन बताऊं।
कस्टमर बोला –क्या।
सेल्ससत्य बोला-देखिये स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लांच किया है, इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ्त मे दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला-पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।
सेल्ससत्य ने कहा-कोई बात नहीं। यहां पर फांसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा, बाकी की फार्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी। सो साहब जो कस्टमर सिर्फ पेपर सोप खऱीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला।
उधर फांसू बैंक के सेल्समैन ने भी करीब पांच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।
स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला-ग्रेट ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप खऱीदने वाले वीसीडी प्लेयर भी चेप दे।
इस पर सत्यसेल्स ने कहा-वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है, इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है।
ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डांटा-अबे तू मेरा इंप्लाई है। या उस कस्टमर का इंपलाई। जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ सेल्समैन बनाता हूं।
शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ सेल्स आफीसर सेल्ससत्य बोला-
हे मूरख। बेच, सिर्फ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी कीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य –ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौका-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयां बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के लिए आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच,कस्टमर की चिंता मत कर।
सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला-अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।
एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल
सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद, उसके बेटे-फेयरप्राइज को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी।
पर फेयरप्राइज भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था।
एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फेयरप्राइज की तरफ जाकर बोला-
उस वाले मोबाइल की क्या कीमत है-
दस हजार रुपये, टैक्स अलग-फेयर प्राइज ने बताया।
उस वाली मोटरसाइकिल की क्या कीमत है-कस्टमर ने पूछा।
पचपन हजार टैक्स एक्सट्रा-फेयरप्राइज ने बताया। फेयरप्राइज का कस्टमर वापस भाग गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया।
उसे मोबाइल की कीमत बतायी गयी-एक रुपया और मोटरसाइकिल की कीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत सा हुआ तो, सेल्ससत्य ने कहा पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा –ओ के।
कस्टमर ने लोन के पेपर पर मजे मजे में बिना देखे साइन कर दिये, यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फांसू बैंक के सेल्समैन ने बताया-जी आपकी महीने की किश्त चार हजार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेजों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंजूर की है कि अगर आप लोन लेने से इनकार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फीस और डिफाल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।
कस्टमर फंस चुका था, वो बोला-पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।
सेल्ससत्य इस पर बोला-महाराज मोबाइल की कीमत तो एक ही रुपया है पर 9999 रुपये उसकी एक्सेसरीज के हैं, हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ दस रुपये की है, पर बाकी की रकम हम आफ्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।
एक लाख रुपये डिफाल्ट फीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये।
यह पूरा कांड देखकर फेयरप्राइज समझ गया और सेल्ससत्य से बोला-सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा। इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएं मिलती हैं-
1- बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फालो करना चाहिए, जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2- समझदार सेल्समैन हेलीकाप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।

2 Comments:

Kanishk | कनिष्क said...

मोबाइल वाली कहानी हजम नंही हुई, यह तो सरासर बेवकूफ बनाना है। If a story is supposed to give you a moral, then then the story should be morally correct and sensible. I liked the first part, but not the second one.

P.S: It seems you have posted this same story thrice.

11:06 AM, December 04, 2005  
Nitin Bagla said...

मेरे खयाल से यह कहानी moral देने के लिये लिखी भी नही गई है...यह तो बाजार के ऊपर व्यंग्य है

6:11 AM, December 06, 2005  

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