Tuesday, December 06, 2005

कथा नंबर चार-साधो ज्ञान न बांटिये

प्र-पंचतंत्र
ज्ञान बांटना नहीं चाहिए
आलोक पुराणिक
चालूपुरम् दफ्तर के कर्मचारियों को जैसे ही इंटरनेट की सुविधा दी गयी, उन्होने वही किया, जो अन्य दफ्तरों के कर्मचारी करते हैं यानी इंटरनेट पर ऐसी वैबसाइटों का अवलोकन शुरु किया, जिनमें ऐसे-वैसे किस्म के फोटू होते हैं। कर्मचारियों ने जमकर इस किस्म की वैबसाइटों का भ्रमण किया। एक दिन ऊपर से आदेश आया कि इस बात की तफतीश की जायेगी कि किस कर्मचारी ने इंटरनेट का इस्तेमाल अपने ज्ञानवर्धन के लिए किस तरह से किया है।
साहब, दफ्तर में हड़कंप मच गया, क्योंकि प्रत्येक कर्मचारी के कंप्यूटर में ऐसी वैबसाइटों का पता रिकार्ड हो चुका था। हर कर्मचारी डरा हुआ था कि हाय अब क्या होगा। ऊपर वालों को क्या जवाब देंगे। दफ्तर में दो कर्मचारी ऐसे थे-जिनका कंप्यूटर ज्ञान खासा विशद माना जाता था, एक का नाम था-बांटूराम और दूसरे का नाम था-डांटूराम।
बांटूराम का फंडा था कि ज्ञान बांटो, खुलकर बांटो, क्योंकि पुरानी कहावत के हिसाब से ज्ञान बांटने से बढ़ता है।
पर डांटूराम कुछ भी पूछे जाने पर डांटता था, और कहता था कि अगर मैंने अपना ज्ञान तुम्हे दे दिया, तो मेरे पास क्या रह जायेगा।
खैर साहब दफ्तर के सारे कर्मचारी बांटू और डांटू को ढूंढने लगे। उस दिन बांटू नहीं आया था, सो सारे डांटू के पास आकर कहने लगे-बताइए, प्रभू इस विपत्ति से कैसे पार पायें। कैसे अपने कंप्यूटर में रिकार्ड हुई वैबसाइटों को हटायें। कृपया बतायें कि कंप्यूटर से ऐसी वैबसाइटों को कैसे हटायें।
डांटू ने सबको डांटा और कहा –पता है, तुम्हे ऊपर वाले बास लोगों को इनके बारे में पता लग गया, तो क्या होगा। पता लगते ही सबकी नौकरी चली जायेगी।
डांटू के ऐसे वचन सुनते ही सारे कर्मचारी और डर गये और बोले-हे सर, आप ही हैं, जो हमें इस बवाल से छुटकारा दिलवा सकते हैं। आप हमें बता दें कि कैसे कंप्यूटर में दर्ज रिकार्ड को डिलीट किया जाये।
डांटू इस पर बोला-शटअप, चुपचाप दफ्तर से बाहर हो जाओ और हरेक बंदा अपनी नौकरी बचाने के लिए सिर्फ एक हजार रुपये मुझे दे। मैं सब ठीक कर दूंगा।
ज्यादातर ने एक हजार रुपये दे दिये। कुछ की जेब में नहीं थे, सो उन्होने कल रुपये लाकर काम करवाने का वादा किया।
डांटू ने फिर चुपचाप से कंप्यूटरों में कुछ कमांड दीं और कंप्यूटरों में पुरानी वैबसाइटों का रिकार्ड उड़ गया। कर्मचारी खुश हुए।
अगले दिन दफ्तर में बांटू भी आ गया, और जो कर्मचारी पिछले दिन कार्रवाई नहीं करवा पाये थे, वो आज बांटू के पास आकर बोले, सर कल तो डांटू ने एक हजार रुपये लेकर कुछ कर्मचारियों की प्राबलम साल्व की है। आप बताइए कि आप क्या कुछ कम में राजी हो जायेंगे।
बांटू भलमनसाहत का मारा बोला, अरे मैं तो अपने साथियों को एक मिनट में बता देता हूं कि पुराना रिकार्ड कैसे उड़ाया जाये।
बांटू ने एक मिनट में कमांड सबको बता दी। बचे हुए कर्मचारियों ने अपने कंप्यूटर से पुराने रिकार्ड उड़ा दिये।
बांटू की इस हरकत पर डांटू ने उससे कहा-तेरे जैसे लोग ही ज्ञान का मर्यादा का हनन करते हैं और ज्ञान को सस्ता बनाते हैं.
इस पर बांटू ने कहा-पर मैंने तो सुना है कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है।
यह सुनकर डांटू बोला-अरे बेवकूफ, कुछ नहीं बढ़ता है, बल्कि सम्मान घटता है। ज्ञान बेचना चाहिए, इससे सम्मान भी बढ़ता है और नोट भी बढ़ते हैं। देख, तूने पूरा ज्ञान एक ही बारे में इन कर्मचारियों को दे दिया है सो अगली बार कर्मचारी न तेरे पास आयेंगे न मेरे पास। खुद ही कमांड देकर रिकार्ड उड़ा देंगे। न मैं हजारों कमा पाऊंगा न तेरे पास ये सम्मान-निवेदन के साथ आयेंगे। ज्ञान को गुप्त न रखने और उसे न बेचने वाले की दशा संत मुफ्तानंद जैसी होती है, जो अपने ही शिष्य नोटानंद से मात खा गया था।
मुफ्तानंद और नोटानंद की कहानी कौन सी है, सो कहो-ऐसा कहकर बांटू ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।
एक समय की बात है। चालूप्रस्थ नगरी में मुफ्तानंद नामक एक संत प्रवास करता था। चालूप्रस्थ में लोगों को नींद न आने की बीमारी थी। सो लोग नींद लाने के लिए तरह-तरह के उपाय खोजते थे। ऐसे में पब्लिक की परेशानियां दूर करने के लिए मुफ्तानंद ने मुफ्त योग की शिक्षाएं लगाना शुरु कर दिया। भांति-भांति के योगासन कराके वह लोगों को स्वस्थ नींद के लिए प्रेरित करता था, योग सिखाने के लिए वो कुछ भी नहीं लेता था। चूंकि वो कुछ नहीं लेता था, इसलिए पब्लिक समझती थी कि इसका कोई और उद्देश्य है। ये अभी पैसे नहीं मांग रहा है, बाद में या तो उधार मांगेगा, या फिर चुनाव में खड़े होकर वोट मांगेगा।
नोटानंद पब्लिक की ऐसी मनोवृत्ति भांप गया था, सो उसने एक पावर योग पाउडर नामक आइटम इजाद किया और वो पैकेट में भरकर इस बेचने लगा।
नोटानंद सौ रुपये का एक पैकेट बेचता था और दावा करता था कि इस पैकेट के चूर्ण को पानी में घोलकर मिठाई के साथ खाने पर नींद आ जाती है। धीरे-धीरे नोटानंद के ग्राहकों की संख्या बढ़ती गयी और मुफ्तानंद की मुफ्त योग कक्षाएं ढप हो गयीं।
पब्लिक ने उसका पाऊडर टैस्ट करना शुरु किया तो वाकई में नींद आने लगी। बहुत तेजी से नोटानंद ने नोट कमाये। वास्तव में वह पाऊडर भंग का चूर्ण था। एक बार इस तरह से नोट कमाने के बाद नोटानंद ने कहा कि अब वह सिर्फ योगासनों पर ध्यान केंद्रित करेगा-और फाइव स्टार होटलों में पावर योगा, एक्जीक्यूटिव योगा नामक कार्यक्रमों से लाखों रुपये महीने के कमाने लगा। उधर मुफ्तानंद फ्रस्टेट होकर अर्धपागलों की अवस्था में इधर-उधर भटकने लगा।
यह कहानी सुनकर बांटू बोला-हे मित्र तुम्हारी कथा सुनकर मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है, और तुम्हारी कहानी से मुझे ये शिक्षाएं मिली हैं-
1- ज्ञान मुफ्त में बांटने से वैल्यू कम हो जाती है। मुफ्त की चीज पाकर लोग समझते हैं कि जरुर इसमें कोई राज है। मुफ्त देने वाला या तो कुछ समय बाद उधार मांगेगा या चुनाव में खड़े होकर वोट मांगेगा।
2- दफ्तर में कंप्यूटर का पूरा ज्ञान किसी को नहीं देना चाहिए।
3- मुफ्त की योग कक्षाएं लगाने के बजाय पावर योगा, एक्जीक्यूटिव योगा नाम के पैकेज फाइव स्टार होटलों में चलाने चाहिए।
4- ज्ञान बांटना नहीं चाहिए, सिर्फ बेचना चाहिए, वो भी पूरा नहीं।

0 Comments:

Post a Comment

<< Home