Wednesday, November 30, 2005

प्रपंचतंत्र कथा नंबर तीन

प्रपंचतंत्र कथा-3-व्यक्तित्व विकास सीरिज
चुगली मैनेजमेंट की कथाएं
आलोक पुराणिक
जैसा कि सब जानते हैं कि किसी भी दफ्तर में कंप्यूटर काम करते हैं और इंसान भी काम करते हैं। एक हजार कंप्यूटरों को एक साथ किसी कमरे में रख दो, कोई किसी की चुगली नहीं करेगा।
पर यही बात इंसानों के बारे में नहीं कही जा सकती।
सात आदमी भी एक कमरे में हों, तो सात दिन बाद सातों एक दूसरे के बारे में सात तरह की चुगलियां करेंगे।
इस तरह की बातों से धनबटोरनगर के दो नौजवान-अपडेटे और क्लासिकज्ञान बहुत अच्छी तरह से वाकिफ थे।
दोनों को ही पता था कि काम करना नौकरी बचाये रखने के लिए जरुरी होता है, पर प्रोग्रेस के लिए चुगली प्रबंधन चकाचक होना आवश्यक है।
जैसा कि हमेशा ज्ञानी बंदे करते आये हैं, वास्तव में काम की बातों को उन्होने कभी किताबों में नहीं लिखा। चुगली, झूठ बोलना, चंपूगिरी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर तब ही तो किताबें नहीं पायी जातीं। तो साहब कथा शुरु यों होती है कि अपडेटे और क्लासिकज्ञान दोनों ही अपनी-अपनी तरह से चुगलियां किया करते थे।
क्लासिकज्ञान अपने सीनियर मैनेजर से चुगलियां कुछ इस तरह की किया करता था-
सुना, आपके कंपटीटर गुप्ताजी आपके बारे में क्या कह रहे थे, वो चेयरमैन के सेक्रेट्री से कह रहे थे कि आप दारु पीते हैं और दारु पीकर गाली-गलौज भी करते हैं। आपकी इमेज चौपट कर रहा है।
क्लासिकज्ञान की बात सुनकर सीनियर मैनेजर हूं-हां करते, फिर क्लासिकज्ञान नये सिरे से, चुगली के नये गुंताड़े भिड़ाने में जुट जाता। फिर क्लासिकज्ञान अगली बार आकर बताता-
सुना, आपके कंपटीटर गुप्ताजी आपके बारे में यह कह रहे थे कि आप दफ्तर से कागज-पेंसिल घर ले जाते हैं।
सुना, आपके कंपटीटर गुप्ताजी आपके बारे में ये अफवाह फैला रहे हैं कि आप दफ्तर में आयी नयी कन्या रीटा में बहुत इंटरेस्ट ले रहे हैं, उसका बहुत ध्यान रख रहे हैं। ऊपर तक इसकी चर्चा है।
क्लासिकज्ञान की ऐसी बातें सुनकर सीनियर मैनेजर हूं-हां करते।
क्लासिकज्ञान ने देखा कि वह चुगलीबाजी में मेहनत तो बहुत करता है, पर इसके रिजल्ट वैसे नहीं आते।
उधर अपडेटे का चुगली का अंदाज कुछ इस तरह का था-
पता है आपको दफ्तर में जो नयी लड़की आयी है-रीटा। यह कौन है।
बास पूछते-कौन है।
यह चैयरमैन के साढ़ू की साली है। पर इस बारे में वह नहीं चाहते कि किसी को कुछ बताया जाये।
अच्छा-बास की आंखे चौड़ी हो जातीं।
बास फिर रीटा का अच्छी तरह से ख्याल रखने लगते।
ख्याल रखने का मतलब, उसे बताते कि उसकी एफीशियेंसी का लेवल बहुत तेजी से बढ़ रहा है। आज उसने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ पचास गलतियां की हैं, जबकि कल ये पचहत्तर थीं।
अपडेटे कुछ इस अंदाज में चुगली करता-
चेयरमैन का साला विदेश से इस शहर में घूमने आया है। दफ्तर में किसी को पता नहीं है।
अपडेटे की इस खबर पर फौरन बास कार्रवाई करते और चेयरमैन के साले की सेवा में जुट जाते।
अपडेटे किसी दिन बास के पास आकर कहता-सर पता है मैंने ऊपर चेयरमैन के सेक्रेट्री से क्या कहा है।
क्या –बास पूछते।
यही कि आपको देश-विदेश की पचास कंपनियों से नौकरियों के आफर है। बिल गेट्स ने खुद आपको मिलने के लिए न्यूयार्क बुलाया है-अपडेटे बताता।
कुछ दिन बाद यह हुआ यह कि अपडेटे और क्लासिकज्ञान के बास को एक धांसू प्रमोशन देकर कंपनी की न्यूयार्क ब्रांच का चीफ बना दिया गया और उससे कहा गया कि वह अपडेटे या क्लासिकज्ञान किसी एक को अपने साथ आफीसर आन स्पेशल ड्यूटीज बनाकर ले जा सकता है।
बास ने अपडेटे को अपने साथ ले जाने का फैसला किया।
एक दिन मौका देखकर क्लासिकज्ञान ने बास से कहा-सर चुगलियां तो मैं भी करता था। मैं भी आपको तरह-तरह की सूचनाएं देता था, पर आपने मेरे काम की वैल्यू नहीं की। अपडेटे को ही वजन दिया।
इस पर बास ने कहा-देखो, चुगली दो तरह की होती है-एक निगेटिव चुगली और दूसरी पाजिटिव चुगली। निगेटिव चुगली बोले, तो तुम मुझे यही बताते रहे कि कौन क्या मेरे बारे में क्या निगेटिव बोल रहा है। अरे, इंसान है, तो निगेटिव बोलेगा। देखो, हर इंसान आम तौर पर दूसरे के बारे में या तो निगेटिव बोलता है, या निगेटिव बोलने की इच्छा रखता है। पीठ पीछे बोले गये निगेटिव की चिंता नहीं करनी चाहिए। चिंता तब करनी चाहिए, जब आपके पीछे कोई पाजिटिव बोलने लगे। फौरन सतर्क हो जाना चाहिए कि अगला कुछ काम लेकर आयेगा। आजकल लोग किसी के बारे में पाजिटिव दो ही मौकों पर बोलते हैं-एक या तो किसी की श्रद्धांजलि के मौके पर या फिर तब, जब उससे कोई काम निकलवाना हो। सो हे मित्र तुम जो मुझे बताते थे, वो नार्मल बातें थीं, उससे मुझे कुछ फायदा नहीं हुआ। तुमने निगेटिव चुगली की।
पाजिटिव चुगली क्या होती है-क्लासिक ज्ञान से जिज्ञासा प्रस्तुत की।
इस पर बास ने आगे कहा- अपडेटे ने जमाने की लेटेस्ट चाल को समझा और उसने पाजीटिव चुगली पर ध्यान लगाया, यानी उसने ऐसी चुगलीबाजी की, जिससे मुझे फायदा हुआ। उसने ही मुझे बताया कि रीटा चेयरमैन के साढ़ू की साली है। मैंने उसकी सैटिंग की, तो ऊपर मेरी रिपोर्ट सही पहुंची। अपडेटे ने ही हेडक्वार्टर में जाकर अफवाह फैलायी कि मुझे बिल गेट्स ने बुलाया है मीटिंग के लिए। इसके बाद मेरी वैल्यू ऊपर बढ़ गयी। देखो अब के जमाने में मामला रिजल्ट ओरियेंटेड है, यानी पाजिटिव चुगली के ही रिजल्ट मिलते हैं, निगेटिव चुगली के नहीं।
ऐसा सुनकर क्लासिकज्ञान बोला-मुझे आपकी बातों से निम्नलिखित शिक्षाएं मिली हैं-
1-अब कोई किसी के बारे में पाजिटिव दो ही मौकों पर बोलता है, एक जब या तो अगले की श्रद्धांजलि सभा में बोल रहा हो, दूसरे तब, जब अगले से कोई काम निकलवाना हो।
2-सिर्फ चुगली काफी नहीं है, ध्यान निगेटिव नहीं पाजिटिव चुगली पर लगाना चाहिए, बास को अगर आपकी चुगली से फायदा होगा, तब ही वह आपको फायदा करवायेगा।
3-दफ्तर में आने वाली हर नयी कन्या से बहुत ही सम्मान से पेश आयें, वह आपके चेयरमैन के साढ़ू की साली हो सकती है।

Tuesday, November 29, 2005

प्रपंचतंत्र कथा नंबर दो

प्रपंचतंत्र कथा नंबर टू
फोटू मैनेजमेंट और दो नंबर होने की कथाएं
आलोक पुराणिक
एक समय की बात है, जैसी कि हर समय होती है। एक दफ्तर था। दफ्तर में दो अत्यधिक ही निपुण कर्मचारी काम करते थे-कामी और सुनामी।
कामी जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि काम पर अत्यधिक ध्यान देता था। कामी का फंडा था कि काम करना चाहिए, उन्नति अपने आप हो जाती है।
सुनामी, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, बहुत अधिक नाम वाला बंदा था। सुनामी भी काम पर ध्यान देता था, पर उसका फंडा यह था कि सिर्फ काम नहीं करना चाहिए, बल्कि काम करते हुए दिखना भी चाहिए। सुनामी के फोटू तमाम जगह दिखायी देते थे, कंपनी की घरेलू पत्रिका में उसकी तमाम कविताएं-कहानियां छपती थीं, उनके साथ उसका नाम छपता था। कहानी-कविताएं सुनामी कहीं से मार दिया करता था। इस बारे में उसका पक्का मानना था कि अब कहानी-कविता कोई नहीं पढ़ता है, सो किसी की भी मारकर छाप दो। कोई पकड़ ही नहीं सकता, क्योंकि कोई पढ़ता ही नहीं।
कंपनी के किसी शो-रुम का उद्घाटन होता था, तो चैयरमैन के साथ उसी का फोटू अखबारों में छपता था। कंपनी की घरेलू पत्रिका में टीम भावना पर कोई लेख छपता था, तो उस में उसी फोटू होता था। और तो और चेयरमैन की बिटिया की शादी की एलबम में सबसे ज्यादा फोटू(वर-वधू के बाद ) उसी के थे। सुनामी वैसे काम तो ठीक-ठाक एवरेज टाइप करता था, और ऐसा काम तो दफ्तर में कई और लोग भी करते थे। पर औरों के फोटू उस तरह से नहीं छपते थे।
एक समय की बात है-जापान से एक कंपनी के चेयरमैन आये कामी की कंपनी के साथ कालोबोरेशन करने के लिए। जापानी चैयरमैन को कंपनी की तमाम पत्रिकाएं, खबरें दिखायी गयीं। और तो और इंडियन कंपनी का चेयरमैन जापानी चेयरमैन को अपने घर ले गया और उसे अपनी बिटिया की शादी की अलबम दिखायी।
सब जगह सुनामी की फोटू देखकर जापानी चेयरमैन बहुत ही इंप्रेस हुआ और इंडियन कंपनी के चेयरमैन से बोल- ये वाला इंपलाई तो बहुत ही इनर्जेटिक है। आप अपनी कंपनी की तरफ से इसे भेजिये जापान में स्पेशल ट्रेनिंग के लिए। ट्रेनिंग में पांच करोड़ रुपये साल मिलने का जुगाड़मेंट था।
सुनामी जब जापान जाने के लिए बैग-बक्सा बांध रहा था, तो कामी उसके पास आकर बोला-हे मित्र कामी तो मैं भी कम न था। मेरा काम तुमसे किसी भी मामले में कम नहीं है। मैंने भी चेयरमैन की बिटिया की शादी में कम काम नहीं किया। फिर जापान यात्रा तुम्हारे ही हिस्से कैसे आयी।
इस पर सुनामी बोला-हे कामी, काम तो इस धरा पर सब ही करते हैं। गधा भी काम करता है और चींटी भी। पर देखो, इंसानों में सबसे ज्यादा कद्र किन जानवरों की होती है, वो ही जिनका चेहरा और बाडी फोटोजेनिक होती है। देखो बंदर किस तरह से मुंह बनाकर धांसू पोज देता है, सो उसकी बहुत वैल्यू होती है। चुपचाप काम करते हुए गधे में किसी की दिलचस्पी नहीं होती। सो हे मित्र किसी कंपनी में प्रोग्रेस के लिए फोटू मैनेजमेंट बहुत जरुरी है। और फोटू मैनेजमेंट के फंडे किसी भी किताब में नहीं पढ़ाये जाते, खुद के तजुरबों से ही इन्हे सीखना पड़ता है।
देख कामी, फोटू का बहुत महत्व है। अब देखकर उस वाले शो-रुम के उद्घाटन के समय चेयरमैन के साथ वाली फोटू, दफ्तर के रिसेप्शन पर टंगी हुई है। सब खुद ब खुद पूछते हैं-किसकी फोटू है। सो हे मित्र चतुर सुजान अपनी फोटू सब तरफ जमाने के लिए बहुत ही परिश्रम करते हैं। मैंने कंपनी के फोटोग्राफर को विशेष तौर पर सैट किया है। वह हर फंक्शन में मेरी फोटू जरुर खींचकर चेयरमैन के साथ लगा देता है। अब चेयरमैन की फोटू तो छपनी ही छपनी है, साथ में अपनी भी छपती है। और चेयरमैन की बिटिया की शादी में काम तो तूने भी किया था, पर तूने ऐसे काम किये, जिनकी फोटू नहीं छपती। तू हलवाई के साथ आलू कटवाने में बिजी रहा। आलू कटवाने के सीन की फोटू नहीं छपती। मैंने कंपनी के वीआईपी मेहमानों को रिसीव करने में ध्यान लगाया। वीआईपी की फोटू खिंचती ही खिंचती है। सो अपन भी लटक लिये फोटू में। समझे। चेयरमैन की बीबी जितनी बार भी बिटिया की शादी की अलबम किसी को दिखाती है, उतनी ही बार उसे मेरी याद आती है। समझे कामी, जो बार-बार दिखता है, वही बार-बार बिकता है। तुम दिखे नहीं, तो उतने ऊंचे भावों में बिके नहीं।
ओ के मित्र, सुनामी तुम देखो कि मैं अब तुम्हारे मार्ग पर चल कर दिखाऊंगा-ऐसा कह कर कामी ने सुनामी को विदा किया।
बदले में सुनामी सिर्फ मुस्कुरा कर रह गया।
नंबर टू के लिए उपयुक्त
समय आगे बढ़ा। दफ्तर के चीफ पद पर किसी की नियुक्ति करने की बात चली। तमाम लोगों ने एप्लाई किया। सब लोग सोच रहे थे कि इस पद के लिए कामी की चयन हो जायेगा। क्योंकि कामी के पास काम था, काम में उसका नाम था।
पर नहीं, एक अत्यधिक ही चालू प्रवृत्ति के नौजवान-प्रजेंटू को दफ्तर के चीफ पद दे दिया गया। प्रजेंटू की क्षमताएं काफी कुछ सुनामी से मिलती थीं। प्रजेंटू की क्षमता यह थी कि वह किसी भी आइटम को बहुत फूं-फां अंगरेजी में पावर-पाइंट कंप्यूटर प्रजेंटेशन में पेश कर देता था। उसे पता रहता था कि कौन सी टाई आजकल फैशन में है और कौन से जूते अब आउटडेटेड हो चुके हैं।
कामी को नंबर टू की पोस्ट दी गयी, कामी सारा काम करता, पर क्रेडिट प्रजेंटू ले लेता था।
कामी ने फिर ई-मेल से सुनामी से पूछा-मित्र इधर मैंने फोटू मैनेजमेंट के जरिये तमाम अखबारों में अपने फोटू छपवाने शुरु किये हैं। दफ्तर का पूरा काम करता हूं, फिर भी मुझे नंबर एक पोजीशन के लिए उपयुक्त नहीं समझा गया।
जवाब में सुनामी ने लिखा-मित्र मैंने तुम्हारी फोटू देखीं और पाया कि तुम बेवजह मुस्कुराते दिखने की कोशिश में बहुत बेवकूफ दिख रहे हो। तुम्हारे फोटू देखकर लगता है कि उस शो रुम के उद्घाटन में मौजूद माडल की कंपनी में तुम बिलकुल कमफर्टेबल महसूस नहीं कर रहे हो। देखो, बेवकूफियों को सच्ची में इन्जाय करना सीखना पड़ता है। तुम्हारे फोटू देखकर लगता है कि तुम मजबूरी में यह सब कर रहे हो, जबकि तुम्हे ये सच्चे दिल से करना चाहिए। पर अब कुछ नहीं हो सकता, तुम्हारा व्यक्तित्व खास तरीके से गढ़ा जा चुका है, इस तरह की चीजों की तैयारी बहुत शुरु से की जानी चाहिए। यानी बेवकूफियों को इन्जाय करने क्षमताओँ का विकास अगर बचपन में नहीं हुआ, तो बड़े होकर बहुत दिक्कत होती है। सो हे मित्र कामी तुम सिर्फ काम के बूते पर सिर्फ दो नंबर की पोजीशन के लिए ही उपयुक्त हो। सिर्फ काम करने वाले दो नंबरी ही हो सकते हैं। एक नंबर के लिए कुछ दूसरे गुणों की दरकार होती है।
उस शाम को सुनामी अपने छोटे बेटे से यह कहते हुए पाये गये-
1- गधा भी काम करता है और चींटी भी। पर देखो, इंसानों में सबसे ज्यादा कद्र किन जानवरों की होती है, वो ही जिनका चेहरा और बाडी फोटोजेनिक होती है।
2- बास की बेटी की शादी में हलवाई के साथ आलू नहीं कटवाने चाहिए, बल्कि वीआईपी मेहमानों को रिसीव करना चाहिए। वरना फोटू का हिसाब-किताब बिगड़ जाता है।
3- बेवकूफियों को इन्जाय करने की क्षमताओँ का विकास अगर बचपन में नहीं हुआ, तो बड़े होकर बहुत दिक्कत होती है।
सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी
आलोक पुराणिक
स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।
उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई कारोबारी दुकान अपने मुनाफे के लिए खोलता है ना कि कस्टमर के मुनाफे के लिए।
सेल्ससत्य का मानना था कि आखिर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी जिंदगी मुनाफे कमाये जा सकते हैं।
पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर
एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये।
एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया, और वह कस्टमर वापस चला गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सत्यसोप ने कहा-हेलो, आप कैसे हैं। ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।
कस्टमर ने कहा-मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।
सेल्ससत्य बोला-ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक आप्शन बताऊं।
कस्टमर बोला –क्या।
सेल्ससत्य बोला-देखिये स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लांच किया है, इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ्त मे दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला-पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।
सेल्ससत्य ने कहा-कोई बात नहीं। यहां पर फांसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा, बाकी की फार्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी। सो साहब जो कस्टमर सिर्फ पेपर सोप खऱीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला।
उधर फांसू बैंक के सेल्समैन ने भी करीब पांच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।
स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला-ग्रेट ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप खऱीदने वाले वीसीडी प्लेयर भी चेप दे।
इस पर सत्यसेल्स ने कहा-वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है, इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है।
ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डांटा-अबे तू मेरा इंप्लाई है। या उस कस्टमर का इंपलाई। जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ सेल्समैन बनाता हूं।
शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ सेल्स आफीसर सेल्ससत्य बोला-
हे मूरख। बेच, सिर्फ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी कीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य –ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौका-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयां बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के लिए आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच,कस्टमर की चिंता मत कर।
सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला-अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।
एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल
सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद, उसके बेटे-फेयरप्राइज को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी।
पर फेयरप्राइज भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था।
एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फेयरप्राइज की तरफ जाकर बोला-
उस वाले मोबाइल की क्या कीमत है-
दस हजार रुपये, टैक्स अलग-फेयर प्राइज ने बताया।
उस वाली मोटरसाइकिल की क्या कीमत है-कस्टमर ने पूछा।
पचपन हजार टैक्स एक्सट्रा-फेयरप्राइज ने बताया। फेयरप्राइज का कस्टमर वापस भाग गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया।
उसे मोबाइल की कीमत बतायी गयी-एक रुपया और मोटरसाइकिल की कीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत सा हुआ तो, सेल्ससत्य ने कहा पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा –ओ के।
कस्टमर ने लोन के पेपर पर मजे मजे में बिना देखे साइन कर दिये, यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फांसू बैंक के सेल्समैन ने बताया-जी आपकी महीने की किश्त चार हजार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेजों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंजूर की है कि अगर आप लोन लेने से इनकार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फीस और डिफाल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।
कस्टमर फंस चुका था, वो बोला-पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।
सेल्ससत्य इस पर बोला-महाराज मोबाइल की कीमत तो एक ही रुपया है पर 9999 रुपये उसकी एक्सेसरीज के हैं, हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ दस रुपये की है, पर बाकी की रकम हम आफ्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।
एक लाख रुपये डिफाल्ट फीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये।
यह पूरा कांड देखकर फेयरप्राइज समझ गया और सेल्ससत्य से बोला-सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा। इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएं मिलती हैं-
1- बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फालो करना चाहिए, जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2- समझदार सेल्समैन हेलीकाप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।
सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी
आलोक पुराणिक
स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।
उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई कारोबारी दुकान अपने मुनाफे के लिए खोलता है ना कि कस्टमर के मुनाफे के लिए।
सेल्ससत्य का मानना था कि आखिर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी जिंदगी मुनाफे कमाये जा सकते हैं।
पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर
एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये।
एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया, और वह कस्टमर वापस चला गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सत्यसोप ने कहा-हेलो, आप कैसे हैं। ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।
कस्टमर ने कहा-मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।
सेल्ससत्य बोला-ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक आप्शन बताऊं।
कस्टमर बोला –क्या।
सेल्ससत्य बोला-देखिये स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लांच किया है, इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ्त मे दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला-पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।
सेल्ससत्य ने कहा-कोई बात नहीं। यहां पर फांसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा, बाकी की फार्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी। सो साहब जो कस्टमर सिर्फ पेपर सोप खऱीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला।
उधर फांसू बैंक के सेल्समैन ने भी करीब पांच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।
स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला-ग्रेट ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप खऱीदने वाले वीसीडी प्लेयर भी चेप दे।
इस पर सत्यसेल्स ने कहा-वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है, इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है।
ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डांटा-अबे तू मेरा इंप्लाई है। या उस कस्टमर का इंपलाई। जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ सेल्समैन बनाता हूं।
शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ सेल्स आफीसर सेल्ससत्य बोला-
हे मूरख। बेच, सिर्फ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी कीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य –ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौका-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयां बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के लिए आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच,कस्टमर की चिंता मत कर।
सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला-अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।
एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल
सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद, उसके बेटे-फेयरप्राइज को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी।
पर फेयरप्राइज भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था।
एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फेयरप्राइज की तरफ जाकर बोला-
उस वाले मोबाइल की क्या कीमत है-
दस हजार रुपये, टैक्स अलग-फेयर प्राइज ने बताया।
उस वाली मोटरसाइकिल की क्या कीमत है-कस्टमर ने पूछा।
पचपन हजार टैक्स एक्सट्रा-फेयरप्राइज ने बताया। फेयरप्राइज का कस्टमर वापस भाग गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया।
उसे मोबाइल की कीमत बतायी गयी-एक रुपया और मोटरसाइकिल की कीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत सा हुआ तो, सेल्ससत्य ने कहा पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा –ओ के।
कस्टमर ने लोन के पेपर पर मजे मजे में बिना देखे साइन कर दिये, यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फांसू बैंक के सेल्समैन ने बताया-जी आपकी महीने की किश्त चार हजार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेजों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंजूर की है कि अगर आप लोन लेने से इनकार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फीस और डिफाल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।
कस्टमर फंस चुका था, वो बोला-पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।
सेल्ससत्य इस पर बोला-महाराज मोबाइल की कीमत तो एक ही रुपया है पर 9999 रुपये उसकी एक्सेसरीज के हैं, हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ दस रुपये की है, पर बाकी की रकम हम आफ्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।
एक लाख रुपये डिफाल्ट फीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये।
यह पूरा कांड देखकर फेयरप्राइज समझ गया और सेल्ससत्य से बोला-सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा। इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएं मिलती हैं-
1- बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फालो करना चाहिए, जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2- समझदार सेल्समैन हेलीकाप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।

स्मार्ट झूठ सत्य ही होता है

सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी
आलोक पुराणिक
स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।
उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई कारोबारी दुकान अपने मुनाफे के लिए खोलता है ना कि कस्टमर के मुनाफे के लिए।
सेल्ससत्य का मानना था कि आखिर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी जिंदगी मुनाफे कमाये जा सकते हैं।
पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर
एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये।
एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया, और वह कस्टमर वापस चला गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सत्यसोप ने कहा-हेलो, आप कैसे हैं। ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।
कस्टमर ने कहा-मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।
सेल्ससत्य बोला-ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक आप्शन बताऊं।
कस्टमर बोला –क्या।
सेल्ससत्य बोला-देखिये स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लांच किया है, इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ्त मे दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला-पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।
सेल्ससत्य ने कहा-कोई बात नहीं। यहां पर फांसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा, बाकी की फार्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी। सो साहब जो कस्टमर सिर्फ पेपर सोप खऱीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला।
उधर फांसू बैंक के सेल्समैन ने भी करीब पांच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।
स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला-ग्रेट ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप खऱीदने वाले वीसीडी प्लेयर भी चेप दे।
इस पर सत्यसेल्स ने कहा-वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है, इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है।
ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डांटा-अबे तू मेरा इंप्लाई है। या उस कस्टमर का इंपलाई। जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ सेल्समैन बनाता हूं।
शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ सेल्स आफीसर सेल्ससत्य बोला-
हे मूरख। बेच, सिर्फ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी कीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य –ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौका-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयां बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के लिए आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच,कस्टमर की चिंता मत कर।
सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला-अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।
एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल
सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद, उसके बेटे-फेयरप्राइज को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी।
पर फेयरप्राइज भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था।
एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फेयरप्राइज की तरफ जाकर बोला-
उस वाले मोबाइल की क्या कीमत है-
दस हजार रुपये, टैक्स अलग-फेयर प्राइज ने बताया।
उस वाली मोटरसाइकिल की क्या कीमत है-कस्टमर ने पूछा।
पचपन हजार टैक्स एक्सट्रा-फेयरप्राइज ने बताया। फेयरप्राइज का कस्टमर वापस भाग गया।
दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया।
उसे मोबाइल की कीमत बतायी गयी-एक रुपया और मोटरसाइकिल की कीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत सा हुआ तो, सेल्ससत्य ने कहा पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा –ओ के।
कस्टमर ने लोन के पेपर पर मजे मजे में बिना देखे साइन कर दिये, यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फांसू बैंक के सेल्समैन ने बताया-जी आपकी महीने की किश्त चार हजार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेजों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंजूर की है कि अगर आप लोन लेने से इनकार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फीस और डिफाल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।
कस्टमर फंस चुका था, वो बोला-पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।
सेल्ससत्य इस पर बोला-महाराज मोबाइल की कीमत तो एक ही रुपया है पर 9999 रुपये उसकी एक्सेसरीज के हैं, हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ दस रुपये की है, पर बाकी की रकम हम आफ्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।
एक लाख रुपये डिफाल्ट फीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये।
यह पूरा कांड देखकर फेयरप्राइज समझ गया और सेल्ससत्य से बोला-सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा। इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएं मिलती हैं-
1- बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फालो करना चाहिए, जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2- समझदार सेल्समैन हेलीकाप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।

Saturday, November 26, 2005

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