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सरकार की सोच में दूरदर्शिता का अभाव: दीप जोशी

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में जन्मे दीप जोशी का सपना था कि उनके हाथों में जादू की एक छड़ी आ जाए जिससे वो कुछ ऐसा करें कि विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण हो जैसा इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसे विकल्पों की तरफ होता हैं। इसी सपने को पूरा करने के लिए अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने खुद को जनसेवा में लगा दिया। पहले मैग्सेसे और अब पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए दीप अपने इस सपने को ताजा कर रहे हैं नीरज सिंह के साथ :

मैग्सेसे मिलने के बाद आपने कहा था कि यह पुरस्कार किसी व्यक्ति के लिए नहीं, ग्रामीण आबादी के विकास के लिए है। पद्मश्री का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?

हंसते हुए। देखिए, ऐसा है कि मैं कोई खिलाड़ी, कलाकार या साहित्यकार तो हूं नहीं कि इस सम्मान को केवल अपनी उपलब्धि मानूं। जिस काम में मैं लगा हूं वह कोई अकेले का काम तो है नहीं। मेरे साथ एक बड़ा जन-समुदाय जुड़ा हुआ है जो मुझे सहयोग दे रहा है। मैग्सेसे मुझे सामाजिक कार्यों के लिए ही मिला था और पद्मश्री भी इन्हीं कार्यों के लिए मिला, तो यह भी उन सभी लोगों का सम्मान है जो मेरे साथ जुड़े हुए हैं।

पद्म सम्मानों को लेकर जो विवाद उठे उससे इन पुरस्कारों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े हुए आपका क्या मानना है?

विवादों के पीछे का जो कारण मुझे नजर आता है वह है पारदर्शिता में कमी होना। ऐसा नहीं है कि देश में केवल मैं ही समाजिक कार्यो से जुड़ा हूं। और भी लोग हैं वे इस बात पर सवाल खड़ा कर सकते हैं कि मुझे ही केवल सम्मान क्यों मिला? उन्हें क्यों नहीं मिला? पद्म पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया क्या है? कैसे लोग चुने जाते हैं। इस बारे में किसी को कुछ पता नहीं। और यह समस्या केवल पद्म पुरस्कारों के संबंध में ही नहीं कई मामलों में है। जहां भी पारदर्शिता की कमी है वहां विवाद जरूर हैं। सरकार को चाहिए कि इसकी पूरी प्रक्रिया मीडिया के माध्यम से स्पष्ट करे।

आप ग्रामीण गरीबों के लिए कार्यरत स्वयं सहायता समूहों को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। ऐसे प्रयासों के बाद भी देश की ग्रामीण जनता की स्थितियों में कोई बड़ा बदलाव क्यों नहीं हो रहा है?

ऐसा नहीं है कि बदलाव नहीं आया है, बदलाव तो आया है। लेकिन समाज के कुछ वर्ग हैं जो विकास की दौड़ में पीछे रह जा रहे हैं। हाल ही में तेंदुलकर कमेटी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि गरीबी में बढ़ोत्तरी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले गरीबी 27 प्रतिशत थी अब 42 प्रतिशत है। इसी तरह आदिवासी क्षेत्रों में पहले 48 प्रतिशत लोग बीपीएल से नीच रह रहे हैं। दलितों में गरीबी का प्रतिशत 37 प्रतिशत था जो कि अब बढ़ गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि उनके लिए आवाज नहीं उठाई जा रही है। गरीबी निवारण के नाम पर पैसे खर्च करने और या 10 प्रतिशत आर्थिक विकास छू लेने से उनका कोई भला नहीं होने वाला। जो लोग कमजोर हैं उनके साथ मिलकर काम करना होगा। कई सारे एनजीओ इस दिशा में काम कर रहे हैं और इसका सकारात्म असर भी देखने को मिल रहा है।

अगर ऐसा है तो स्वयंसेवी संगठनों के जो विचार हैं, सरकार उन्हें अपनी नीतियों में क्यों शामिल नहीं करती है?

ऐसा नहीं है कि सरकारें एनजीओ की विचारधारा से प्रभावित नहीं है। सरकार आज स्वयं सहायता समूहों की बात कर रही है जिसकी शुरुआत एनजीओ ने ही की। कुछ एनजीओ द्वारा शुरू किए गए कामों को नाबार्ड ने सराहा है और ऐसी योजनाएं नाबार्ड ने भी शुरू की है। देखिए, गरीबी में कमी तब आएगी जब गरीबों के साथ मिलकर काम किया जाएगा। उन्हें मोटीवेट किया जाएगा। लेकिन यह भी सच्चाई है कि भारत ही नहीं दुनिया के सभी देशों में सरकारों की मान्यता शक्ति की भावना पर आधारित होती है। सरकार की मानसिकता ही होती है कंट्रोल, पावर, और रेगुलेशन। इसमें सरकार का कोई दोष नहीं है, यह शासन की प्रकृति होती है। गांधी जी का कहना था कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता ग्राम सुधार करें और पार्टी खत्म कर दी जाए। जो अपना सब कुछ छोड़कर गरीबों की सेवा करेगा उसमें आदर्शवादी भावना होगी। सरकारी लोगों के साथ यह भावना नहीं आ पाती।

आप सरकार को गरीबी उन्मूलन रणनीति में सलाह देते हैं। गरीबी उन्मूलन को लेकर आपके क्या दृष्टिकोण हैं?

हमारे देश में गरीबी उन्मूलन के प्रयासों में कई सारी कमियां हैं। जेसा कि मैंने पहले ही कहा कि इस दिशा में हम पूरी तरह से सरकारी प्रयासों पर ही निर्भर हैं। जबकि यह काम सरकार के तंत्र के बाहर का काम है। स्वयंसेवक संगठनों को इस काम में लगाया जाए। इसमें चोरी भी होगी, घपलेबाजी भी होगी, लेकिन इस सोच को बदला जाए कि इमानदारी की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी तंत्र की है आम लोगों की नहीं। दूसरा, देश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, उधर बड़े सुधार कार्यक्रमों की आवश्यक्ता है। आदिवासियों के पास आम लोगों से अधिक जमीनें हैं, लेकिन उनसे प्रोडक्शन कितना हो रहा है? इन जमीनों को अगर खेती करने लायक बनाया जाता तो गरीब आबादी के एक बड़ा हिस्से को इसका लाभ मिलता। नरेगा से उम्मीद थी कि ग्रामीण आबादी को इसका लाभ मिलेगा, लेकिन इसमें सारा ध्यान इस बात पर लगा दिया गया है कि इसके तहत मजदूरो को पूरा पैसा मिल पा रहा है या नहीं। इस बात पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है कि इस योजना के तहत जो निर्माण हो रहा है उसका रीप्रोडक्शन क्या हो रहा है। इससे बेहतर है कि इसे रूरल इन्वेस्टमेंट प्रोग्राम बनाया जाए। इसे इन्वेस्टमेंट माना जाए, न कि काम करने वालों की तन्ख्वाह। इससे बेहतर है कि इसे रुरल मैनेजमेंट प्रोग्राम बनाया जाए और इस पैसे को उन संसाधनों में लगाया जाए जिससे लोगों को रोजाना की जरूरतें जुड़ी हुई हैं। अभी जो हमारा लक्ष्य है वह व्यक्तिपरक है। इस सोच को बदलना होगा। खेती-बारी, प्राकृतिक संसाधनों के विकास इन सब पर पैसा लगाने से ही गरीबी दूर होगी।

गरीबी दूर करने के सरकारी प्रयासों से आप कितना सहमत हैं?

गरीबी दूर करने के जो सरकारी प्रयास अभी हैं वे केवल वर्तमान को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। देश के किसी भी सरकारी दस्तावेज में इस बात का उल्लेख नहींमिलता है कि 2050 के लिए हमारा लक्ष्य क्या हो। गांधी जी का ग्राम स्वराज का जो सपना था कि गांवों में खुशहाली लाई जाए। नेहरू जी के समय से हमारा रुझान पश्चिमी देशों की ओर हो गया। लेकिन जिस देश की इतनी बड़ी आबादी गांवों में रह रही है वहां क्या पूरी तरह नगरीकरण संभव है। अमेरिका में केवल चार करोड़ की आबादी गांवों में है तो वहां पर पूरी तरह नगरीकरण की बात की जा सकती है। मान लीजिए 2050 तक भारत की आबादी लगभग 130 होगी तब भी 60-65 करोड़ लोग गावों में ही रहेंगे। इस तरह भारत रूरल इंडिया बना ही रहेगा। इसीलिए हमें देश के विकास को गांवों के देश के हिसाब से ही सोचना ही होगा। देश के विकास को जो मौजूदा मॉडल है उसमें यह कमी है कि हम अभी तो 9-10 प्रतिशत विकास दर की बात कर रहे हैं, लेकिन भविष्य के भारत के प्रति हम अभी भी अनिश्चित हैं।

इस धारणा से आप कितना सहमत हैं कि आर्थिक उदारीकरण के चलते गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर हुआ है?

गरीब और गरीब हुआ है यह बात तो सही नहीं है, लेकिन यह बात सही है कि गरीब और अमीर के बीच की खांई बढ़ी है। और यह सिर्फ भारत में में ही नहीं हर जगह हो रहा है। अमीरों का जो शेयर है वह ज्यादा हुआ है और गरीबों में का जो शेयर है वह कम हुआ है।

आप गांधी दर्शन से प्रभावित हैं। गांधी और मा‌र्क्स के विचार निर्धनता निवारण में आज के युग में कितने प्रासंगिक हैं?

मा‌र्क्स को तो मैंने ज्यादा पढ़ा नहीं है। गांधी जी की सोच थी कि प्राकृतिक धरोहर की रक्षा की जाए और मांग को कम किया जाए। लोग एक-दूससे की मदद करें। यह हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है। लोग कहते थे कि गांधी जी पोस्ट माडर्न इंसान थे। मुझे लगता है कि यह सही भी है। औद्योगीकरण से जो नतीजे निकलकर सामने आ रहे हैं इनकी कल्पना गांधी जी साठ-सत्तर साल पहले ही कर चुके थे। इसलिए गांधी आज प्रासंगिक हैं यह मैं मानता हूं।
 
कम्युनिटी डेवेलपमेंट का विचार कैसे आया और प्रदान की स्थापना के पीछे क्या उद्देश्य रहे?
 
बचपन अभावों और गरीबी में बीता। मैं पहले यह सोचता था कि तकनीकि विकास के द्वारा ही विकास संभव है। बाद में समझ में आया कि जब लोगों में समानता का भाव नहीं आएगा, तब तक तक असली विकास को नहीं पाया जा सकता। इसीलिए मेरे दिमाग में कम्युनिटी डेवेलपमेंट का विचार आया। जिस पाठशाला में पढ़ता था वहां के आधे बच्चे कमरे में और आधे बाहर खुले में पढ़ते थे। तो बचपन से ही मन में कुछ करने की भावना थी। जब अमेरिका से लौटकर आया तो महाराष्ट्र के एक डाक्टर दंपति के समाजसेवा के काम से बहुत प्रभावित हुआ, तो कह सकते हैं कि वह एक माइलस्टोन था। उसके बाद फिर प्रदान का गठन हुआ।

 


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